गणतंत्र दिवस परेड में असम की आत्मनिर्भर मिट्टी की कहानी

गणतंत्र दिवस परेड में असम की आत्मनिर्भर मिट्टी की कहानी

गणतंत्र दिवस पर असम की झांकी, धुबरी के अशारिकांडी की मिट्टी कला व आत्मनिर्भरता को प्रदर्शित करेगी।

By : स्वदेश डेस्क
गणतंत्र दिवस परेड में असम की आत्मनिर्भर मिट्टी की कहानी

नई दिल्ली। आगामी गणतंत्र दिवस परेड में कर्तव्य पथ पर असम की झांकी राज्य की सदियों पुरानी टेराकोटा परंपरा और आत्मनिर्भर शिल्प संस्कृति की जीवंत तस्वीर पेश करेगी। इस वर्ष असम की झांकी का केंद्र पश्चिमी असम के धुबरी जिले का प्रसिद्ध शिल्प गांव अशारिकांडी है, जो अपनी विशिष्ट मिट्टी कला और सांस्कृतिक उद्यमिता के लिए राष्ट्रीय पहचान बना चुका है।

राष्ट्रीय राजधानी स्थित राष्ट्रीय रंगशाला कैंप में गुरुवार को मीडिया के लिए प्रदर्शित झांकी में असम की मिट्टी, नदी और कारीगरों के जीवन को एक सशक्त सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में दर्शाया गया। इस अवसर पर नोडल अधिकारी बिक्रम नेवार और असम सरकार के सांस्कृतिक मामलों के विभाग के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

टेराकोटा गुड़िया बनी झांकी का केंद्र

झांकी के अग्रभाग में एक विशाल टेराकोटा गुड़िया को गोलाकार क्रम में सजे मिट्टी के दीपकों के साथ दर्शाया गया है। यह दृश्य प्रकाश, निरंतरता और परंपरा का प्रतीक है। ट्रैक्टर पर आधारित ढांचे के दोनों ओर बांस की बाड़ के साथ मिट्टी के सराई प्रदर्शित किए गए हैं, जो असम के प्रचुर बांस संसाधनों और ग्रामीण आजीविका में उनकी भूमिका को रेखांकित करते हैं।



मयूरपंखी नाव में झलकी असम की नदी संस्कृति

झांकी का ट्रेलर हिस्सा पारंपरिक मयूरपंखी नाव के रूप में डिजाइन किया गया है, जो असम की गहरी नदी संस्कृति का प्रतीक है। इसमें कारीगरों को हीरामाटी (स्थानीय मिट्टी) से गणेश, कार्तिक, दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी देवी-देवताओं की प्रतिमाएं गढ़ते हुए दिखाया गया है। पीछे लगा पारंपरिक पाल असम के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में नदियों की केंद्रीय भूमिका को और मजबूत करता है।

आत्मनिर्भर भारत की भावना से जुड़ी झांकी

‘आत्मनिर्भर भारत’ की थीम पर आधारित यह झांकी अशारिकांडी को एक ऐसे शिल्प गांव के रूप में प्रस्तुत करती है, जिसने पारंपरिक कौशल को संरक्षित रखते हुए आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल की है। यह झांकी दर्शाती है कि कैसे पीढ़ियों से चली आ रही मिट्टी कला आज भी स्थानीय रोजगार, पहचान और आत्मसम्मान का आधार बनी हुई है।

अशारिकांडी की ऐतिहासिक पहचान

अशारिकांडी को भारत के सबसे बड़े असमिया टेराकोटा और मिट्टी के बर्तन शिल्प क्लस्टरों में गिना जाता है। यहां के कारीगर परिवार पिछले सौ वर्षों से अधिक समय से टेराकोटा खिलौने और मूर्तियां, जिन्हें स्थानीय रूप से पुत्तोला कहा जाता है, बनाते आ रहे हैं। इनमें हातिमा गुड़िया और देवी-देवताओं की पारंपरिक आकृतियां विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।

गांव की पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने में स्वर्गीय सरला बाला देवी का महत्वपूर्ण योगदान रहा, जिन्हें 1982 में अपनी प्रसिद्ध हातिमा गुड़िया के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

GI टैग से मिली नई पहचान

मार्च 2024 में धुबरी जिले के टेराकोटा शिल्प को जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग मिलने के बाद अशारिकांडी की पहचान और मजबूत हुई है। यह असम का छठा पारंपरिक शिल्प है जिसे यह प्रतिष्ठित दर्जा प्राप्त हुआ।

गणतंत्र दिवस की झांकी के माध्यम से असम न केवल अपनी टेराकोटा कला को राष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत कर रहा है, बल्कि कारीगरों की आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक विरासत के सम्मान का संदेश भी दे रहा है।

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