बी एल एफ: लोग इसे अपनाएं यह संस्कृति को नुकसान नहीं पहुंचाता है

बी एल एफ: लोग इसे अपनाएं यह संस्कृति को नुकसान नहीं पहुंचाता है

भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल पर उठे आरोपों के बीच जानिए क्यों संवाद, बहस और विचार-विमर्श भारतीय संस्कृति की असली ताकत हैं।

By : स्वदेश डेस्क
बी एल एफ: लोग इसे अपनाएं यह संस्कृति को नुकसान नहीं पहुंचाता है

सतीश झा

भोपाल। भोपाल लिटफेस्ट को लेकर चल रहे विवाद के बीच आयोजकों ने इस मुद्दे पर अपना पक्ष सामने रखा है। एक जिम्मेदार समाचार पत्र होने के नाते स्वदेश हमेशा संवाद और समावेशी सोच का समर्थन करता रहा है। हमारा मानना है कि असहमति भी सम्मान के साथ सुनी जानी चाहिए।

स्वदेश ने इस आयोजन को लेकर जो बुनियादी सवाल उठाए थे, उन पर आयोजकों की राय भी पाठकों तक पहुंचाना हमारी जिम्मेदारी है। इसलिए बीएलएफ की ओर से श्री सतीश झा द्वारा प्रस्तुत लिखित पक्ष को हम यहां बिना किसी बदलाव के प्रकाशित कर रहे हैं।

एक स्थानीय अखबार ने भोपाल के साहित्य कला पर्व ( BLF) पर एक लेख छपा जिसमें इसे संवाद नहीं, सभ्यतागत अपमान का मंच कहा गया। इसमें भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल 2026 पर तीखी टिप्पणीयां की गई है।

समझदार स्तंभकार कहते हैं कि यह फेस्टिवल संवाद का नाम लेकर हमारी संस्कृति और सभ्यता पर हमला करता है। विदेशी पैसे से चलता है, वामपंथी विचार फैलाता है, हिंदू विरोधी बातें करता है। सब कुछ बिना जांचे-परखे।

मैं कहता हूं, बात थोड़ी गलत लगती है।

साहित्य का उत्सव तो बहस का मैदान होता है। जैसे पुराने समय में उपनिषदों में ऋषि आपस में सवाल-जवाब करते थे। विवाद से ही सत्य निकलता है। कश्मीर हो, जाति हो या अंग्रेजों का जमाना हो - इन पर खुलकर बात करना अपमान नहीं, समझने की कोशिश है।

अरुंधति रॉय जैसी लेखिका समाज की पीड़ा लिखती हैं। यह आंबेडकर या फुले की तरह ही है - सुधार की बात, अपमान की नहीं।

फेस्टिवल पर विदेशी पैसे का आरोप है, जो पूरी तरह गलत है, एक पैसा भी बाहर से नहीं आया। लेकिन हमारी संस्कृति तो कभी बंद नहीं रही। गांधार की मूर्तियां यूनानी प्रभाव से बनीं। भक्ति कवियों ने फारसी शब्द लिए। कालिदास ने, टैगोर ने दुनिया से लिया और अपना बनाया। आज भी वैसा ही हो रहा है।

फेस्टिवल में दुनिया भर के लोग आते हैं तो विचारों का आदान-प्रदान होता है। इससे हमारी संस्कृति कमजोर नहीं, मजबूत होती है।

पत्रकार कहते हैं कि यह अभिजात वर्ग का खेल है, आम आदमी से दूर। लेकिन सच यह है कि फेस्टिवल में प्रवेश मुफ्त है। बहुभाषा में बात होती है। ऑनलाइन भी देख सकते हैं। गोंड, बैगा, भील जैसी आदिवासी कला दिखाई जाती है, उन्हें सम्मानित किया जाता है। इससे हाशिए पर पड़े लोग आगे आते हैं।

हम भारतीय तो तर्क करने वाले लोग हैं। बहस हमारी परंपरा है। इसे दबाना ठीक नहीं।

लिंग, पर्यावरण, अल्पसंख्यक अधिकारों पर बात को विदेशी साजिश कहना भी गलत है। कामसूत्र में खुलकर लिखा है। चिपको आंदोलन हमारी जड़ों से निकला। अशोक के शिलालेख सहिष्णुता सिखाते हैं। आज की बातें पुरानी जड़ों पर ही टिकी हैं। इन्हें विधर्मी कहना संस्कृति को स्थिर मानना है, जबकि संस्कृति हमेशा बदलती रही है।

हाल में बाबर पर एक सत्र रद्द हुआ। दुःखद है। विरोध हुआ, पुलिस ने कहा। यह दिखाता है कि संवेदनशील मुद्दों पर बात मुश्किल है। लेकिन फेस्टिवल का काम यही है - इतिहास को फिर देखना, घावों को समझना, मिलने-जुलने की राह ढूंढना।

अंत में इतना कहूंगा - स्तंभकार की चिंता सच्ची है, लेकिन आरोप ज्यादा कड़े हैं। भोपाल शहर को इस फेस्टिवल के लिए शुक्रिया अदा करना चाहिए। यहां प्राचीन महाकाव्य से लेकर आज की सोच तक सब पर बात होती है। बिना किसी पूर्वाग्रह के।

सारे देश के लोग आते हैं, बाहर के भी। इससे विचार फैलते हैं, भारत मजबूत होता है। वसुधैव कुटुम्बकम् का मतलब यही है - दुनिया परिवार है। संवाद से ही परिवार मजबूत होता है, अलगाव से नहीं।

भोपाल वाले, इस उत्सव को अपनाये। यह हमारी संस्कृति की रक्षा करता है, नुकसान नहीं पहुंचाता।

लेखक सतीश झा ने इंडियन एक्सप्रेस के लिए जनसत्ता की स्थापना की और टाइम्स ऑफ़ इंडिया के साप्ताहिक दिनमान के संपादक थे।

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