भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल 2026छ 'संवाद' नहीं, सभ्यतागत अपमान का मंच

भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल 2026छ 'संवाद' नहीं, सभ्यतागत अपमान का मंच

डॉ. विश्वास चौहान

By : Swadesh Bhopal
भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल 2026छ 'संवाद' नहीं, सभ्यतागत अपमान का मंच

बीएलएफ (भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल) का इतिहास बताता है कि विवाद अपवाद नहीं, बल्कि निरंतरता रहे हैं। 2023 में फिल्मकार ओनिर को 'Making Literature LGBTQ Neutral' सत्र से अंतिम क्षण में हटाया गया। आयोजकों ने सुरक्षा कारणों का हवाला दिया, जबकि पुलिस प्रशासन ने किसी अनुरोध से इनकार किया।

इससे पहले 2022 में 'I Am Gay, I Am Orin' पुस्तक पर चर्चा को लेकर तत्कालीन संस्कृति मंत्री उषा ठाकुर ने आपत्ति जताई और इसे भारत भवन की गरिमा के विपरीत बताया। ये घटनाएँ दर्शाती हैं कि BLF विविधता का दावा तो करता है, लेकिन असहमति आने पर या तो पीछे हटता है या विरोध को दबा देता है। यही पैटर्न 2026 में फिर सामने आया।

भारत की सभ्यतागत स्मृति केवल अकादमिक पाठ नहीं है, बल्कि जीवित सामाजिक अनुभव है। वी.एस. नायपॉल की 'ज़ख्मी सभ्यता' इसी ऐतिहासिक अनुभव की अभिव्यक्ति है। जिस प्रकार पश्चिम में हिटलर को रोमांटिक नायक बनाना असंभव है, उसी प्रकार भारत में बाबर को 'कवि और मानवीय' बताना भी सभ्यतागत अपमान है। फ्रांसीसी फिल्मकार रॉबेर बेसां की 'मॉडल' अवधारणा यह बताती है कि किसी पात्र की प्रस्तुति स्वयं एक राजनीतिक वक्तव्य होती है, जो समाज और संस्कृति को प्रभावित करती है। इस दृष्टि से यह विमर्श भारतीय दंड संहिता की धारा 153B के अंतर्गत जांच योग्य प्रतीत होता है।

न्यासियों की आपत्ति और मीडिया की भूमिका

भारत भवन के न्यासियों द्वारा उठाई गई आपत्तियाँ इस विवाद को संस्थागत स्तर पर भी ले गई हैं। पूर्व न्यासी प्रो. रामेश्वर मिश्र 'पंकज' ने बाबर विषयक सत्र को BLF के उद्देश्य से असंबद्ध बताया। वर्तमान न्यासी डॉ. विजय मनोहर तिवारी ने संस्कृति मंत्री को पत्र लिखकर BLF जैसे आयोजनों की नीति में पारदर्शिता की मांग की। ये दोनों तथ्य विषय की गंभीरता को इंगित करते हैं।

मीडिया ने इस पूरे घटनाक्रम को सामने रखा। समाचार पत्रों की रिपोर्टिंग जनहित में की गई आलोचना है, जो अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत संरक्षित है।

शासन की भूमिका, मौन भी उत्तरदायित्व है

सबसे चिंताजनक पक्ष शासन का मौन है। अनुमति, स्थान और संरक्षण देने के बाद जब न्यासी, मीडिया और समाज प्रश्न उठा रहे हों, तब चुप्पी तटस्थता नहीं रह जाती। यह उत्तरदायित्व से पलायन बन जाती है। मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक नीति सार्वजनिक मंचों पर संवेदनशील विषयों की समीक्षा का दायित्व शासन पर डालती है, जिसे अनदेखा किया गया। हाल ही में एक विदेशी नाटक के मंचन में भी शासन की यही भूमिका देखी गई।

निष्कर्ष

इस पूरे एपीसोड का सुखद पक्ष यह है कि हिंदू समाज की जागृति प्रदर्शित होती है। BLF 2026 का विवाद स्पष्ट संकेत है कि वैचारिक एकाधिकार को अब चुनौती मिल रही है। हिंदू समाज अपनी स्मृति, इतिहास और सभ्यतागत आत्मसम्मान के प्रति सजग हो चुका है। आवश्यकता पारदर्शिता, संतुलन और स्पष्ट सांस्कृतिक नीति की है। अन्यथा 'संवाद' का यह मंच साहित्य नहीं, बल्कि वैचारिक संघर्ष का प्रतीक बन जाएगा, और इसकी जिम्मेदारी शासन की होगी, जिसने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया।

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