MP E-Waste Surges 17x, Health Risks Rise

ई-कचरे के डंपिंग ग्राउंड बने महानगर, स्वास्थ्य पर डाल रहे घातक असर

मध्यप्रदेश में ई-कचरा 6 साल में 17 गुना बढ़कर 5000 टन सालाना पहुंच गया। जहरीले तत्वों से स्वास्थ्य और पर्यावरण पर गंभीर खतरा, इंदौर सबसे आगे।

By : स्वदेश डेस्क
ई-कचरे के डंपिंग ग्राउंड बने महानगर, स्वास्थ्य पर डाल रहे घातक असर

राज्य में जमा हो रहा सालाना पांच हजार टन ई-कचरा, छह साल में 17 गुना बढ़ा

मध्यप्रदेश तेजी से इलेक्ट्रॉनिक कचरे (ई-वेस्ट) के डंपिंग ग्राउंड में तब्दील होता जा रहा है। अंधाधुंध इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के बढ़ते उपयोग और उनके अनुपयोगी होने की दर इतनी तेज है कि पिछले करीब छह सालों में इलेक्ट्रॉनिक कचरे में 17 गुना का इजाफा हुआ है। इलेक्ट्रॉनिक कचरा उठाने वाली एजेंसियों के मुताबिक, इन दिनों सालाना 5 हजार मीट्रिक टन ई-कचरा निकल रहा है। 2019 तक यह आंकड़ा सिर्फ 500 मीट्रिक टन सालाना तक सिमटा हुआ था।

15 कंपनियां सहित 52 संग्राहक

लैपटॉप, स्मार्टफोन और इलेक्ट्रिक कार बैटरी के लिए कोबाल्ट धातु की काफी मांग है। ई-कचरे से सोना, चांदी, कोबाल्ट और प्लेटिनम के साथ-साथ दुर्लभ पृथ्वी धातुएं प्राप्त की जा सकती हैं। ई-कचरा प्रबंधन नियमों के तहत प्रदेश में 15 कंपनियों के साथ 52 संग्राहक कचरे के उत्पादन, निर्माण, निस्तारण और संग्रह में सहयोगी हैं।

ई-कचरा इकट्ठा करने में प्रदेश का देश में नौवां नंबर

वृद्धि दिखाते हैं आंकड़े 

वर्ष

कुल उत्पादन (टन)

औसत उत्पादन (टन)

2024-25

5000

415

2022-23

3598.06

299.6

2018-19

534.43

29.17

नोट: वर्ष 2022-23 और 2018-19 के आंकड़े पीसीबी की रिपोर्ट पर आधारित हैं, जबकि 2024-25 के आंकड़े आधिकारिक विशेषज्ञों से चर्चा के बाद अनुमानित हैं।

ई-कचरा बेहद घातक

एक कंप्यूटर और मोबाइल के निर्माण में 51 प्रकार के ऐसे तत्व पाए जाते हैं, जिन्हें जहरीला माना जा सकता है। इनमें मुख्य रूप से कैडमियम, निकेल, क्रोमियम, एंटीमोनी, आर्सेनिक, बेरिलियम और पारे का इस्तेमाल किया जाता है। ये पर्यावरण तथा मानव स्वास्थ्य के लिए घातक होते हैं। इनमें सबसे अधिक खतरनाक सीसा, पारा और कैडमियम जैसे जहरीले पदार्थ होते हैं, जो सांस, त्वचा, गुर्दा, फेफड़े और मस्तिष्क को गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं।

सबसे ज्यादा ई-कचरा इंदौर में

सबसे ज्यादा ई-कचरा इंदौर में इकट्ठा किया जाता है। यहां सालाना 800 टन कचरा निकलता है। इसके बाद भोपाल में 415 टन, ग्वालियर में 400 टन और उज्जैन में 315 टन प्रति वर्ष ई-कचरा निकलता है।प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक अधिकारी ने बताया कि 2022 के बाद कचरे में लगातार तेजी से वृद्धि हो रही है। वहीं, राज्य में ई-कचरे से जुड़ा एक तकनीकी पहलू यह भी है कि ई-कचरे के निर्धारण का फार्मूला तय नहीं हो सका है। इसकी वजह से पिछले दो सालों से विभाग को इस कचरे के सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं।

जानकारों के मुताबिक, इस समय सबसे बड़ी चुनौती ई-कचरे के सुरक्षित निस्तारण की है। इलेक्ट्रॉनिक कचरे से निकलने वाले रसायन बेहद जहरीले होते हैं। इससे न केवल मनुष्य, बल्कि पशु-पक्षियों पर भी जानलेवा असर पड़ता है।प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों के अनुसार, मध्यप्रदेश देश का नौवां सबसे बड़ा ई-कचरा उत्पादक राज्य बन गया है। एजेंसियों के मुताबिक, उत्पादकों, रिसाइक्लरों और संग्रह केंद्रों तक पहुंचने वाले कचरे से कहीं अधिक मात्रा घरों में ही जमा है।

तीन शहरों में ई-कचरा (प्रति वर्ष)

भोपाल- 415 टन
ग्वालियर- 400 टन
उज्जैन- 315 टन

व्यवहार में परिवर्तन की आवश्यकता

प्रदेश के करीब 15 शहरों से ऑनलाइन ई-वेस्ट सामग्री खरीदने वाली एजेंसी से जुड़े अनुराग असाटी के मुताबिक, उन्हें वही ई-वेस्ट मिलता है जिसे लोग स्वेच्छा से देते हैं। फैक्ट्रियां और बड़े संस्थान इसमें अग्रणी हैं, लेकिन लोगों के घरों में यह अभी भी बड़ी मात्रा में जमा है।

उन्होंने बताया कि जब तक लोग अपने व्यवहार में परिवर्तन नहीं लाते, यह स्थिति बनी रहेगी। उनकी कंपनी प्रति माह लगभग 2 टन ई-कचरा जुटाती है। इसके अलावा, करीब 200-300 छोटे-बड़े कबाड़ कारोबारी पूरे शहर से कचरा इकट्ठा करते हैं, जिससे यह आंकड़ा बढ़कर 34 टन प्रति माह तक पहुंच जाता है।