रायपुर। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद और धमतरी जिले की सीमा से लगे उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व में इन दिनों माहौल गर्म है। विस्थापन की आशंका से परेशान ग्रामीण और आदिवासी अब खुलकर सामने आ गए हैं। राजापड़ाव क्षेत्र के गांव मोंगराडीह में जल जंगल जमीन बचाओ संघर्ष समिति सीतानदी उदंती क्षेत्र के बैनर तले जनसभा हुई। इसमें 128 गांवों और पारा टोलों से हजारों लोग पहुंचे। सबका एक ही सुर था कि पुरखों की जमीन छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे। उन्हें विस्थापन नहीं, सड़क, पानी और बिजली जैसी सुविधाएं चाहिए।
पांचवीं अनुसूची का हवाला और शांतिपूर्ण लड़ाई का ऐलान
संघर्ष समिति के अध्यक्ष सिरधन सोम ने कहा कि यह पूरा इलाका संविधान की पांचवीं अनुसूची में आता है। इसलिए जल, जंगल और जमीन पर सबसे पहला हक यहां के मूल निवासियों का है। उन्होंने साफ कहा कि आदिवासियों को उनके संवैधानिक अधिकारों से दूर करने की कोई भी कोशिश बर्दाश्त नहीं होगी। सोम के अनुसार, आंदोलन शांतिपूर्ण रहेगा और संवैधानिक दायरे में ही चलेगा। इसके लिए गांव गांव में समिति की इकाइयां खड़ी की जा रही हैं।
नाइट कर्फ्यू हटाने और जमीन का हक देने की मांग
जिला पंचायत सदस्य लोकेश्वरी नेताम ने कहा कि 128 गांवों और पारा टोलों के भविष्य पर विस्थापन का खतरा मंडरा रहा है। उनका कहना था कि लोगों को उजाड़ने की जगह उनके गांव में ही बुनियादी विकास पहुंचाया जाए। उन्होंने समिति से जाति, वर्ग और राजनीति से ऊपर उठकर एकजुट रहने की अपील की। संरक्षक दैनिक राम मंडावी ने बताया कि हर गांव से एक युवा, एक बुजुर्ग और एक पढ़ी लिखी महिला को संगठन से जोड़ा जाएगा, ताकि समिति की जड़ें जमीनी स्तर तक मजबूत हों। बैठक में ग्रामीणों ने इलाके में लागू नाइट कर्फ्यू तुरंत हटाने और वन ग्रामों के किसानों को जमीन का स्थायी मालिकाना हक देने की मांग रखी।
17 अक्टूबर को कोकड़ी में महा ग्राम सभा
बैठक में सर्वसम्मति से तय हुआ कि 17 अक्टूबर को राजापड़ाव क्षेत्र के कोकड़ी गांव में महा ग्राम सभा होगी। इसमें कांकेर और महासमुंद के सांसदों, सिहावा और बिंद्रानवागढ़ के विधायकों, जिला पंचायत अध्यक्ष समेत सभी जनप्रतिनिधियों को बुलाया जाएगा, ताकि ग्रामीण अपनी बात सीधे उनके सामने रख सकें। तैयारी के लिए समिति के प्रमुख प्रतिनिधि 12 अक्टूबर से घर घर जाकर लोगों से मिल रहे हैं और जनप्रतिनिधियों के निवास पर भी दस्तक देंगे। हजारों लोगों की इस जुटान से इतना तो साफ है कि ग्रामीण अपनी जमीन और पहचान के सवाल पर पीछे हटने के मूड में नहीं हैं।