इंदौर। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि भारत में 40 से अधिक प्रजातियां जामुन की पाई जाती हैं। हमारे आसपास और परिवेश में 3-4 ही दिखती हैं। जामुन की अनेक प्रजातियां ऐसी हैं जो नदी किनारे, पहाड़ों, ढलान वाले क्षेत्रों और घने जंगलों में पाई जाती हैं। इसलिए नैसर्गिक वनस्पतियों (फ्लोरा) को बचाने, उनका संरक्षण-संवर्धन करने का हमारा नैतिक दायित्व है। जिनकी हमें जरूरत है, उन्हीं वनस्पतियों तक स्वयं को सीमित रखना अनेक खतरों को आमंत्रण देने जैसा है।
यह कहना है वनस्पति प्रेमी विन्या आचार्य का, जिन्होंने 90 के दशक में इंदौर के होलकर कॉलेज से वनस्पति शास्त्र में एमएससी करने के बाद अनेक उतार-चढ़ाव के बावजूद जैव संपदा, विशेष रूप से फ्लोरा से एकाकार होने का कोई अवसर नहीं गंवाया। वनस्पतियों और विशेष रूप से जैव विविधता के लिए स्वयं का समय-श्रम और धन खर्च कर उन विलुप्त होती वनस्पतियों (फ्लोरा) को समीप से देखकर उनके पर्यावरणीय गुण-धर्म को समझने की निरंतर उत्कंठा ने विन्या आचार्य को 60 की उम्र में भी प्रशिक्षु शोधार्थी बना रखा है।
विन्या आचार्य बताती हैं कि कुछ वनस्पति प्रजातियां बहुत दुर्लभ होती हैं, उन्हें बचाना बहुत मुश्किल होता है। यह चुनौतीपूर्ण कार्य तभी संभव हो सकता है जब हम पौधे का मूल्य समझना सीख लें, क्योंकि हमारी यह पर्यावरणीय नैसर्गिक संपदा मानवीय जीवन का सबसे बड़ा आधार है। हम इन फ्लोरा से घनिष्ठता से तभी जुड़ते हैं, जब वे हमारे काम आते हैं, जैसे कि सूरजमुखी से हमें तेल मिलता है, कपास से हमें रूई प्राप्त होती है, इसलिए दिन-प्रतिदिन हम उनके संपर्क में आ जाते हैं, लेकिन नेचर में ऐसे अनेक कम्पोनेंट होते हैं जो इन फ्लोरा को अपने तरीके से मनुष्य जीवन और पर्यावरण संतुलन के लिए नैसर्गिक संपदा की भांति व्यवहार करते देखा जा सकता है। इनके अस्तित्व से ही हमारा अस्तित्व है। जिस तरह से मनुष्य समाज और सामुदायिक तंत्र के रूप में अपनी विकास यात्रा आगे बढ़ाता है, ठीक उसी तरह से अनेक वनस्पतियां अर्थात पादप और पौधे एक-दूसरे की संयुक्त सहभागिता और समन्वय से प्रकृति में अपना अस्तित्व बनाए रखने में सफल होते हैं।
ऐसे हुई अध्ययन की शुरुआत : विन्या आचार्य (मोड़ख) मूलत: मंडलेश्वर से हैं। होलकर कॉलेज से अध्ययन के बाद जितेन्द्र आचार्य से विवाह किया। आईआईटी चेन्नई से निकले जितेन्द्र आर्मी, नेवी में सेवा देते हुए कमांडर पद से सेवानिृत्त हुए। इस दौरान देशभर के दूरस्थ क्षेत्रों में उनकी पोस्टिंग होती रही। ऐसे में नेचर को समझने, विशेष रूप से फ्लोरा (वनस्पति) व फौना (जीव-जंतुओं) दोनों से जुड़े संयुक्त पारिस्थिति तंत्र की जैव विविधता को समझकर इस नैसर्गिक संपदा का डाक्यूमेंटेंशन करने की विन्या की रुचि बढ़ती चली गई।
6 माही पाठ्यक्रम और अध्ययन
विन्या आचार्य ने नार्थ इंडिया, सेंट्रल इंडिया, हिमालयीन रीजन और सदन इंडिया के भ्रमण के दौरान कुल 1 हजार से अधिक फ्लोरा का अध्ययन किया। उनकी वृद्धि और प्रकृति समझने के लिए इन स्थलों पर अलग-अलग मौसम में जाकर इन वनस्पतियों को निहारा। फील्ड बॉटनी का 6 माह का पाठ्यक्रम करने के बाद उन्हें इन वनस्पतियों के अध्ययन में और अधिक सहायता मिली। अनेक समूहों से जुड़कर इनके गुण-धर्म को साझा किया।
पुणे में फ्लोरा पर पुस्तक में सहभागिता
विन्या आचार्य ने महाराष्ट्र के सभी घने जंगल, परिक्षेत्र और पहाड़ी क्षेत्र की वनस्पतियों को विशेष रूप से जाना-समझा। देशभर में भ्रमण कर इन फ्लोरा पर किए गए अध्ययन को लेकर पुणे में गाइड के रूप में कार्य करते हुए एक पुस्तक में भी अपने संयुक्त अनुभव साझा किए, जिसका प्रकाशन हो चुका। इसमें बताया गया है कि फ्लोरा किस तरह से अस्तित्व बनाए रखते हैं। इसको स्वयं ने कच्चे डाक्यूमेंट के रूप में दर्ज करते हुए भविष्य में पुस्तक रूप की योजना है।
ओडिशा के कालाहांडी से असम के तेजपुर तक
विन्या आचार्य ने 90 के दशक में एमएससी करने के बाद करीब 25 वर्षों तक नेचर को समझने के लिए प्रकृति भ्रमण किया। इसके लिए उन्होंने -सह्याद्री, कामदागिरि पर्वत से लेेकर सिक्किम के लाचुंग, असम के तेजपुर, ओडिशा के कालाहांडी, अरुणाचल के तवांग, देरिंग, उरगेलिंग, महानंदा हिल्स में पश्चिम बंगाल के कुर्सियांग, पगलाझोरा, उत्तराखंड में देहरादून के घने जंगलों में विभिन्न वनस्पति प्रजातियों,पौधों, पादपों का अध्ययन करने के लिए अलग-अलग मौसम में दुर्गम स्थानों का सतत प्रवास किया।
नेचर से जुड़े अलग-अलग समूह बनते चले गए
विन्या आचार्य बताती हैं कि नैसर्गिक वन संपदा से जुड़े इन फ्लोरा को लेकर देश में अलग-अलग समूह हैं। कोई फ्लोरा लवर, कोई अध्ययनकर्ता, कोई फ्लोरा पर शोधकर्ता, कोई फ्लोरा पर पुस्तक, छायाचित्र व डाक्यूमेंट्री के उद्देश्य से इन तक पहुंचता है, लेकिन सबका एक ही उद्देश्य होता है कि इन विलुप्त होती वनस्पतियों को संरक्षित-संवर्धित किया जाए, ताकि भूसंपदा का संतुलन बना रहे, क्योंकि फ्लोरा किसी विशेष स्थान, मौसम या विशिष्ट ऋतु चक्र में पाई जाने वाली सभी प्रकार की वनस्पतियों का प्रतिनिधित्व करती है।