संघ कार्य के 100 वर्ष

संघ कार्य के 100 वर्ष: शाखा से शिखर तक यशस्वी जीवन का मौन तपस्वी

संघ कार्य के 100 वर्ष पूरे होने पर उत्तमचंद इसराणी के जीवन और समर्पण का विस्तृत वर्णन। उनकी राष्ट्रीय समर्पण और संगठनात्मक योगदान पर प्रकाश डाला गया है।

By : स्वदेश डेस्क
संघ कार्य के 100 वर्ष: शाखा से शिखर तक यशस्वी जीवन का मौन तपस्वी

भोर की पहली किरण पूूर तरह धरती पर उतरी नहीं थी. भोपाल की गलियों में हल्की शीतल हवा बह रही थी। उम्र शरीर पर अपना प्रभाव छोड़ चुकी थी, हृदय भी पहले जैसा सबल नहीं रहा था, किन्तु एक वृद्ध स्वयंसेवक अपनी नियत गति से शाखा की ओर बढ़ रहा था। किसी ने स्नेहपूर्वक कहा- 'अब स्वास्थ्य का भी ध्यान रखिए, कभी-कभी विश्राम कर लिया कीजिए।' वे मंद मुस्कुराए और सहज स्वर में बोले-'जिसने जीवन भर मुझे शक्ति दी, उससे दूर रहकर स्वास्थ्य कैसे ठीक रह सकता है?' यह उत्तर केवल शब्द नहीं था, बल्कि सात दशकों से अधिक लंबे संघ जीवन का सार था। वह वृद्ध थे- उत्तमचंद इसराणी

संघ संस्कारों में ढला बालक उत्तमचंद इसराणी का जीवन किसी पद, प्रतिष्ठा या प्रसिद्धि की कहानी नहीं, बल्कि निष्ठा, कर्तव्य और राष्ट्रसमर्पण की अखंड साधना का इतिहास है। 10 नवम्बर 1923 को सिंध प्रांत के सक्खर जिले की लाड़काणा तहसील के 'मियां जो गोठ ग्राम में जन्मे इसराणी जी किशोरावस्था में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े। जैकोबाबाद में अध्ययन के दौरान मित्र फतहचंद गुरसहाणी के माध्यम से वे शाखा पहुँचे और फिर जीवन भर उसी पथ के पथिक बने रहे। संघ शिक्षा वर्गों ने उनके व्यक्तित्व को अनुशासन, संगठन और राष्ट्रभाव से परिपूर्ण कर दिया।

विपरीत परिस्थितियों में साहस का संबलः उन दिनों सिंध की धरती सांप्रदायिक उन्माद की आहट से विचलित थी। पाकिस्तान की मांग के साथ हिंसा का वातावरण गहराता जा रहा था। ऐसे समय में संघ की शाखाएँ भयभीत हिन्दू समाज के आत्मविश्वास का केन्द्र बनीं। युवा उत्तमचंद नगर कार्यवाह के रूप में समाज को संगठित करने में जुटे रहे। संकट के उन दिनों में उनका धैर्य और नेतृत्व अनेक परिवारों के लिए आश्वासन का आधार बना।

विभाजन की वेदना, पर मन में नहीं विषः सन् 1947 का विभाजन उनके जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा था। 27 सितम्बर 1947 को उन्होंने अपनी जन्मभूमि को अंतिम प्रणाम किया और विस्थापित बनकर भारत आए। घर, खेत, स्मृतियाँ और पूर्वजों की धरोहर सब पीछे छूट गई; किन्तु उन्होंने कभी कटुता को अपने जीवन का अंग नहीं बनने दिया। वे मानते थे कि मनुष्य का वास्तविक घर उसके संस्कारों में बसता है। यही सकारात्मक दृष्टि उन्हें अन्य लोगों से अलग बनाती है। 

संघर्षों के बीच आत्मनिर्माणः अजमेर के शरणार्थी शिविर से आरम्भ हुई उनकी नई यात्रा कठिनाइयों से भरी थी। अल्प वेतन की नौकरी करते हुए उन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखी, फिर अध्यापन किया और अंततः भोपाल में वकालत प्रारम्भ की। स्वयं शिक्षक बनना चाहते थे, पर पिता की इच्छा का सम्मान करते हुए अधिवक्ता बने। उनके जीवन का यह प्रसंग सिखाता है कि कर्तव्य और पारिवारिक सम्मान भी व्यक्तित्व निर्माण की महत्वपूर्ण आधारशिलाएँ हैं। 

भोपाल में सेवा का नया अध्यायः भोपाल पहुँचते ही उन्होंने सबसे पहले शाखा का पता लगाया। बाबासाहब आप्टे के आग्रह पर उन्होंने प्रभात शाखा प्रारम्भ करने का संकल्प श्री उत्तमचंद इसराणी लिया और उसी दिन से भोपाल की पहली प्रभात शाखा का सूत्रपात हुआ। धीरे-धीरे उनका घर स्वयं संघ कार्य का केन्द्र बन गया। वर्षों तक उनका निवास प्रांतीय कार्यालय के रूप में कार्य करता रहा। उनके लिए घर और संगठन में कोई भेद नहीं था।

पद बढ़ते गए, विनम्रता और गहराती गईः नगर कार्यवाह से लेकर विभाग कार्यवाह, प्रांत कार्यवाह, प्रांत संघचालक और आगे चलकर मध्यक्षेत्र के क्षेत्र संघचालक तक की यात्रा उन्होंने पूरी की। किन्तु इन दायित्वों ने उनके व्यवहार में कभी अहंकार का स्पर्श नहीं आने दिया। वे स्वयं को सदैव एक सामान्य स्वयंसेवक ही मानते रहे। शाखा में उनका परिचय पद से नहीं, बल्कि नियमित उपस्थिति और सहज आत्मीयता से होता था।

विधि के क्षेत्र में भी राष्ट्रसेवाः एक सफल अधिवक्ता और आगे चलकर अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उन्होंने विधि व्यवसाय को भी समाजसेवा का माध्यम बनाया। न्यायालय में उनकी विद्वत्ता का सम्मान न्यायाधीश भी करते थे। फिर भी वे स्वयं को पहले स्वयंसेवक और बाद में अधिवक्ता मानते थे। सादगी, शुचिता और मर्यादा उनके व्यक्तित्व की सहज पहचान थीं।

आपातकाल की अग्नि परीक्षा

1975 में आपातकाल लगा। संघ पर प्रतिबंध लगा और उत्तमचंद इसराणी पूरे आपातकाल में जेल में रहे। वकालत बंद हो गई, परिवार आर्थिक कठिनाइयों से घिर गया, पर उनके धैर्य में कभी विचलन नहीं आया। जेल में निराश स्वयंसेवकों का उत्साह बढ़ाना ही उन्होंने अपना दैनिक कार्य बना लिया। उनका विश्वास था कि सत्य को अधिक समय तक दबाया नहीं जा सकता। यह अटूट आस्था उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी शक्ति थी।

अंतिम समय तक शाखा का आग्रह

जीवन के अंतिम वर्षों में स्वास्थ्य लगातार गिरता गया। जबलपुर प्रवास के दौरान उन्हें भीषण हृदयाघात हुआ। इसके बाद उन्होंने संगठनात्मक दायित्वों से मुक्त होने का आग्रह अवश्य किया, पर शाखा और स्वयंसेवकों से उनका आत्मिक संबंध कभी नहीं टूटा 15 दिसम्बर 2007 को उनका पार्थिव शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया, किन्तु उनका जीवन आज भी हजारों स्वयंसेवकों के लिए प्रेरणा का दीपस्तंभ बना हुआ है। उनके व्यक्तित्व का तेज आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का अक्षय स्रोत बना रहेगा।



 

 

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