प्रसंग- राम मंदिर
एक्सक्लूसिव

अयोध्या एक बार फिर निर्णायक परीक्षा की घड़ी में

अतुल तारे

By : स्वदेश डेस्क
अयोध्या एक बार फिर निर्णायक परीक्षा की घड़ी में

अयोध्या एक बार फिर निर्णायक परीक्षा की घड़ी में है। एक ओर भारत में भारतीय दृष्टि की स्थापना हो रही है। देश, अपने जीवन मूल्यों की ओर लौट रहा है। निकट के इतिहास में इसका एक बड़ा कारण 1989 में राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन था जिसने देश में एकात्मता का भाव जागृत किया और प्राण प्रतिष्ठा के समय यह अनुभूति भी हुई कि सम्पूर्ण देश मानस की चौपाई “सिया राम मय सब जग जानी” को सार्थक कर रहा है। दूसरी ओर यही समय है जब अपनी पराजय देख रही आसुरी शक्तियां भी एक कुचक्र का अवसर आए, इसकी प्रतीक्षा में हैं।

अयोध्या का राम मंदिर, सिर्फ एक राम मंदिर नहीं है। इसका महत्व सिर्फ इसलिए भी नहीं है कि यह राम जन्मभूमि है। राम, भारतीय संस्कृति के मेरुदंड हैं। राम मंदिर आंदोलन, भारतीय सांस्कृतिक चेतना के जागरण का अधिष्ठान है। यह यज्ञ चार शताब्दियों का है, जिसमें लाखों राम भक्तों ने अपने प्राणों का उत्सर्ग किया है। स्वाधीन भारत में आज से लगभग चार दशक पहले इस आंदोलन का नेतृत्व देश की सज्जन शक्तियों को साथ लेकर विश्व हिंदू परिषद ने किया और देश में भारतीय मान बिंदुओं के प्रति एक जागरण का भाव पैदा हुआ, जिसका आज विस्तार हम अनुभव कर रहे हैं। यही परिदृश्य आज देश में रह कर देश के खिलाफ ही कार्य कर रही शक्तियों को बेचैन कर रहा है।

राम मंदिर में आ रहे दान के हिसाब-किताब में गड़बड़ी और उसमें चोरी एक जघन्य और अक्षम्य अपराध है, यह सच है। निश्चित ही यह आस्था के साथ छल है। कानून को अपना काम करना चाहिए और जो भी दोषी हो, चाहे वह कितना भी वरिष्ठ हो, उसे सलाखों के पीछे होना ही चाहिए। स्वयं ट्रस्ट ने सरकार के पास जाकर जांच की मांग की और विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने भी स्पष्ट कर दिया कि जो राम का नहीं वह हमारे काम का नहीं। ऐसी स्थिति में क्या सम्पूर्ण जांच की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए?

उन्माद इस कदर हावी है कि जो स्वर पहले अयोध्या में राम मंदिर के स्थान पर कभी विश्वविद्यालय या शौचालय की मांग कर रहे थे, आज आस्था पर आँसू बहाने का नाटक कर रहे हैं। जिन शक्तियों ने राम के अस्तित्व को ही काल्पनिक बताया, जिन्होंने प्राण प्रतिष्ठा के आयोजन में निमंत्रण के बावजूद जाना उचित नहीं समझा, आज वे धर्म ध्वज रक्षक बनने का स्वांग रच रहे हैं। देश में अचानक कालनेमियों का एक समूह खड़ा हुआ है।

पीड़ादायक यह भी है कि जो आंदोलन से जुड़े रहे हैं, वह भी अपनी कुंठा का दिशाहीन प्रदर्शन कर रहे हैं। वहीं जो आस्थावान हैं, वह भी हर प्रश्न को षड्यंत्र कहने की भूल कर दिग्भ्रमित हो रहे हैं।

यह स्वीकार करना ही होगा और कर ही लेना चाहिए कि भूल तो हुई है और अक्षम्य भूल हुई है। यह भूल प्रशासनिक भी है और अति विश्वास की भी। यह भूल एक सक्षम तंत्र की अनुपस्थिति का भी परिणाम है। यह भूल सिर्फ भूल ही नहीं, नैतिक मूल्य कितने क्षरण की ओर हैं, इसका भी एक पीड़ादायक उदाहरण है। हिंदू समाज के समक्ष आज यह एक बड़ी चुनौती है। इसलिए इसमें अब माफी की तो कोई संभावना होनी ही नहीं चाहिए।

सुखद है और अपेक्षित भी था कि आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं ने भी यही मांग मुखरता से रखी है। इसलिए आवश्यकता अभी धैर्य की है। जांच में जो भी दोषी पाया जाएगा उसको कठोर से कठोर सजा मिलनी ही चाहिए। और स्वयं राम भक्त वीर हनुमान उसका विनाश करेंगे ही, पर प्रतीक्षा तो करनी ही होगी।

यह आस्था की परीक्षा की घड़ी है। सिर्फ राम मंदिर ही नहीं, देश के अन्य बड़े मंदिर भी हैं, कई देवालय हैं, कई लोक हैं और कई अन्य सम्प्रदायों के भी आस्था केंद्र हैं। अपनी-अपनी श्रद्धा से श्रद्धालु अपनी भेंट यहां देते हैं तो उसमें एक सम्पूर्ण पारदर्शिता आवश्यक ही है। इसके लिए कई मंदिर, मठों, आश्रमों ने आदर्श व्यवस्थाएं कायम की हैं, उसका भी अध्ययन होना चाहिए। इस प्रसंग ने इसकी प्रासंगिकता को और अधिक स्पष्ट रूप से रखा है।

पर, इसकी आड़ में जो खेल चल रहा है, वह खतरनाक है। राम मंदिर के दान में हुई गड़बड़ी को अधिष्ठान से ही जोड़ना किसी एक-दो व्यक्ति या समूह या संगठन का अपमान नहीं है, भारत की चेतना के साथ यह छल है और यह पूरी योजना से चल रहा है। आवश्यकता इसे समझने की है। और यह सुखद है कि देश इसे समझ रहा है। वह समझ रहा है कि कॉकरोच सिर्फ दिल्ली के जंतर-मंतर पर ही नहीं है, वह अयोध्या सहित पूरे देश में है और इन दिनों टेलीविजन डिबेट में भी है, रील्स में भी है और यूट्यूब में भी।

एक पीड़ादायक प्रसंग को वह एक हथियार की तरह प्रयोग कर एक ऐसा मायावी रण तैयार करने में लगे हैं कि राम से जुड़ी शक्तियां ही एक दूसरे के खिलाफ सज्ज हो जाएं। इतिहास बताता है कि चाहे वह हल्दीघाटी का युद्ध हो या प्लासी का, देश की सज्जन शक्ति के बड़े भाग ने सिर्फ दर्शक की भूमिका निभाई और देश विरोधी ताकतें अपने षड्यंत्र में सफल हुईं। आज यह भी एक युद्धकाल ही है। फिर एक बार जब भारतीय चेतना का प्रकाश अखिल विश्व में अनुभव किया जा रहा है तब एक दुर्भाग्यपूर्ण प्रसंग को आधार बनाकर सम्पूर्ण अधिष्ठान को ही कठघरे में खड़ा करने का षड्यंत्र जारी है।

हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत ने कहा था कि अंत में स्वयं को पराजित होते देख अब यह शक्तियाँ झूठे नैरेटिव गढ़ेंगी, चरित्र पर आक्षेप लगेंगे। हमको खुद को भी बेहद सतर्क रहना है और तत्काल स्वयं के प्रति अविश्वास से भी बचना है।

युद्ध, अब सिर्फ मिसाइल और बम से नहीं लड़ा जाता। झूठे प्रचार और सूचनाओं से भी लड़ा जाता है। नीर-क्षीर विवेक की परीक्षा इसी समय होती है।

लेखक अतुल तारे, स्वदेश के समूह संपादक हैं। 


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