डॉ.भागवत के बयान से मीडिया विमर्श पर सवाल

अराजकता के पाप में आप भी शामिल हैं...

लेख में डॉ. मोहन भागवत के विजयादशमी संबोधन का हवाला देते हुए कहा गया है कि संघ अराजकता और सत्ता परिवर्तन के लिए उत्पात का विरोध करता है। भारत के हित में समाज के हर वर्ग को अपनी जिम्मेदारी निभाना होगी।

By : नरेंद्र कुमार
अराजकता के पाप में आप भी शामिल हैं...

डॉक्टर भागवत के संबोधन से बदहवास है एक समूह

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत ने एक बार फिर देश के सर्वज्ञ (?) मीडिया की नींद उड़ा दी है। उनके हर वाक्य में मोदी-विरोध ढूँढ़ने की असफल कोशिश करने और उसकी मनमाफिक व्याख्या करने का आदी मीडिया कल विजयादशमी पर नागपुर में सरसंघचालक का उद्बोधन कान लगाकर सुन रहा था। उसकी व्यग्रता एक स्वयंसेवक से भी अधिक ही थी।

कारण यह था कि जब डॉक्टर भागवत उद्बोधन दे रहे थे, तब भारत के हर शहर से स्वयंसेवक कदम से कदम मिलाकर चल रहे थे। ये बाल स्वयंसेवक भी थे, युवा भी, प्रौढ़ भी और बुजुर्ग भी। ये स्वयंसेवक विद्यार्थी, उच्च शिक्षा संस्थानों के प्राध्यापक, सामान्य दुकानदार, कॉर्पोरेट कर्मी, सरकारी कर्मचारी भी थे और उच्च अधिकारी भी। जम्मू से चेन्नई तक (जहाँ उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से संचलन निकला) और द्वारका से मिजोरम तक निकले संचलनों में स्वर, शब्द और लय अलग-अलग हो सकती है, पर घोष की ताल पर निकले स्वयंसेवकों का जयघोष एक ही था 'देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें।'

इसलिए स्वयंसेवक निश्चित थे कि जो वे कहेंगे, वह वे 1925 से कर ही रहे हैं। बाद में उसे फिर सुनकर अपना ज्ञान अवश्य बढ़ा लेंगे। लेकिन इस बीच, डॉ. भागवत के वक्तव्य में ब्रेकिंग और विकृत विमर्श की संभावनाओं पर गिद्ध-दृष्टि लगाए बैठे अति बुद्धिजीवियों को बड़ी निराशा और हताशा हुई। बेचारे सैकड़ों यू-ट्यूबर्स को चक्कर आ गए। पूरी स्क्रिप्ट लगभग लिखकर बैठे थे। आलेख तैयार थे। कारण यह कि ये सभी लंबे समय से एक अभियान चला रहे थे कि नागपुर ने दिल्ली को हिला दिया है। मोदी और भागवत में घमासान है। मोदी की उल्टी गिनती शुरू हो गई है और पता नहीं क्या-क्या! ऐसा लग रहा था कि पीएमओ और महाल स्थित संघ मुख्यालय इनके ही दफ्तर में सिमट गए हैं। डॉ. भागवत क्या कहने वाले हैं, यह भी स्क्रिप्ट इनके पास थी। अब जब डॉ. भागवत बोले, तो गुलाबी सर्दी में इन सबके पसीने छूट गए। पूरे भाषण में मोदी क्या, केंद्र सरकार जैसा शब्द भी नहीं था।

'पश्चिम की हवा चली है...' इसका जिक्र करते हुए जब डॉ. भागवत ने कहा कि अराजकता से रिजीम चेंज का सपना मंजूर भी नहीं है और यह समाधान भी नहीं है, तो उन्होंने विस्तार से अपनी बात कही और साफ-साफ कही, जो उनकी शैली भी है। वे लच्छेदार बातें नहीं करते। सीधे-सीधे वहीं चोट करते हैं, जहाँ आवश्यक हो। और आज अगर संघ यह कह रहा है, तो क्यों न कहे? संघ अपनी दृष्टि इन कथित बुद्धिजीवियों से पूछकर तय करेगा?

यह 100 वर्षों की संघ की साधना ही है कि सरसंघचालक के वक्तव्य का विश्लेषण आज संघ के विचार से असहमत लोग भी अपनी दृष्टि से कर रहे हैं, जबकि अपने प्रारंभकाल से लेकर निकट के इतिहास तक उसे उपेक्षा और उपहास का ही सामना करना पड़ा है। संघ ने अपनी गति में इसे कभी रोड़ा भी नहीं माना।

डॉ. भागवत या उनसे पहले भी सरसंघचालकों ने जब-जब विजयादशमी पर उद्बोधन दिया है, देश-काल की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर अपना दृष्टिकोण ही दिया है। अपने उद्बोधन में उन्होंने सामाजिक समरसता के प्रेरणापुंज संत रविदास जी का भी पुण्य स्मरण किया और उत्कल के वन प्रदेश में सेवा के लिए संपूर्ण जीवन देने वाले स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जी का भी। किस मीडिया घराने ने इसकी चर्चा की? संघ जातिगत आधार पर नहीं सोचता? पर मनुस्मृति को पढ़े बिना बौद्धिक उल्टियाँ करने वाले यह बताएँ कि संघ अगर उनके अनुसार कथित रूप से उच्च जातियों का ही है, तो इनका संपूर्ण श्रद्धा से उल्लेख क्यों? यहाँ बात आपने इसलिए नहीं की, क्योंकि यह आपके विमर्श से मेल नहीं खाती।

एक पत्रकार के नाते भी और एक स्वयंसेवक के नाते भी मेरा देश के मीडिया से आग्रह है कि संघ ने तो यह सार्वजनिक घोषणा कर दी है कि देशभर में शताब्दी वर्ष में कितने हिंदू सम्मेलन हुए, कितनी प्रबुद्धजन गोष्ठियाँ हुईं और कितने युवा संवाद हुए। इनकी तिथियाँ भी उपलब्ध हैं। आप अपने स्टूडियो से बाहर क्यों नहीं निकलते? निकलेंगे, तो पाएँगे कि अभिजीत दीपके हों या नेहा बोरा, राहुल गांधी हों या अखिलेश, बरखा दत्त हों या जेएनयू की पूर्व प्रोफेसर निवेदिता ये लोग जहाँ-जहाँ बकवास कर रहे हैं, उन्हें उनकी ही भाषा में उत्तर मिल रहा है। जवाब देने वाले संघ के प्रशिक्षित स्वयंसेवक नहीं हैं और न ही संघ इसका श्रेय लेता है। संघ तो चाहता ही यह है कि देशवासी स्वयं सजग हों।

डॉक्टर भागवत ने कल भी यह कहा और यही बात डॉक्टर हेडगेवार ने संघ की स्थापना के समय कही थी कि समाज में परिवर्तन समाज की शक्ति ही लाएगी, कोई सरकार नहीं। समस्या है, तो आंदोलन कीजिए, पर समाधान के लिए, उत्पात के लिए नहीं। विदेशी ताकतों का हौव्वा नहीं है, यह एक कठोर वास्तविकता है। भारत का उदय विदेशी शक्तियाँ नहीं चाहतीं और देश में जयचंद सदा से रहे हैं। अतः एक जिम्मेदार संगठन प्रमुख के नाते वे यह कहते हैं कि अराजकता से रिजीम चेंज असंभव है, तो असंभव ही है। आप इसे मोदी का बचाव कहना चाहते हैं, तो शौक से कीजिए। आपके विवेक पर तरस ही आता है। संघ ने आपातकाल में कांग्रेस सरकार को भी आवश्यक नैतिक समर्थन दिया ही है।

आज सीमा पर नहीं, पूरे देश को युद्धस्थल में बदलने की नापाक कोशिश है। और याद रखिए, इस पाप में आप भी शामिल हैं। इतिहास इसे याद रखेगा।

 

अतुल तारे
(लेखक स्वदेश के समूह संपादक हैं) 

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