भारत की बदलती व्यापार नीति

मुक्त व्यापार और हमारी बदलती कूटनीति

भारत और ब्रिटेन के बीच हाल ही में हुआ मुक्त व्यापार समझौता भारत की बदलती आर्थिक नीति और वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में उसके उभार को दर्शाता है।

By : स्वदेश डेस्क
मुक्त व्यापार और हमारी बदलती कूटनीति

प्रतिभा झा

इक्कीसवीं सदी का विश्व केवल सैन्य शक्ति से संचालित नहीं होता, बल्कि आर्थिक सामर्थ्य, व्यापारिक नेटवर्क और कूटनीतिक प्रभाव उसकी दिशा तय करते हैं। आज किसी राष्ट्र की वैश्विक प्रतिष्ठा इस बात से भी निर्धारित होती है कि वह विश्व अर्थव्यवस्था के साथ किस प्रकार जुड़ा है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था में उसकी भूमिका कितनी प्रभावशाली है। भारत ने पिछले एक दशक में जिस प्रकार अपनी विदेश नीति और आर्थिक नीति के बीच एक सशक्त समन्वय स्थापित किया है, वह इसी परिवर्तन का संकेत है। यह वह भारत नहीं है, जो कभी वैश्विक व्यापारिक व्यवस्थाओं को संदेह की दृष्टि से देखता था, बल्कि यह वह भारत है, जो अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता अर्जित कर रहा है।

भारत और ब्रिटेन के बीच संपन्न मुक्त व्यापार समझौता इसी बदलती भारतीय आर्थिक कूटनीति का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यह केवल दो देशों के बीच व्यापार बढ़ाने का समझौता नहीं, बल्कि उस व्यापक दृष्टि का प्रतीक है, जिसके माध्यम से भारत स्वयं को वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह समझौता दर्शाता है कि भारत अब विश्व अर्थव्यवस्था में एक निष्क्रिय सहभागी नहीं, बल्कि नियमों और अवसरों को आकार देने वाला सक्रिय पक्ष बनना चाहता है।

स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक भारत की आर्थिक सोच आत्मनिर्भरता की ऐसी व्याख्या से प्रभावित रही, जिसमें बाहरी व्यापार और वैश्विक आर्थिक साझेदारियों को सीमित दृष्टि से देखा जाता था। परिणामस्वरूप, भारत अपनी विशाल जनसंख्या और संसाधनों के बावजूद विश्व व्यापार में वह स्थान प्राप्त नहीं कर सका, जिसका वह स्वाभाविक रूप से अधिकारी था। 1991 के आर्थिक सुधारों ने एक नई दिशा अवश्य प्रदान की, किंतु पिछले दशक में आर्थिक कूटनीति को राष्ट्रीय शक्ति के एक प्रमुख साधन के रूप में जिस गंभीरता से अपनाया गया है, उसने भारत की भूमिका को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है।

आज भारत एक साथ अनेक देशों और क्षेत्रों के साथ व्यापारिक समझौतों की दिशा में कार्य कर रहा है। संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन तथा यूरोप के साथ बढ़ते आर्थिक संबंध यह संकेत देते हैं कि भारत अपनी विकास यात्रा को वैश्विक अवसरों से जोड़ना चाहता है। इस प्रक्रिया की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि भारत अब किसी भी समझौते में केवल बाजार उपलब्ध कराने वाले देश की भूमिका तक सीमित नहीं रहना चाहता। वह अपने उद्योग, कृषि, सेवा क्षेत्र और श्रमशक्ति के हितों को केंद्र में रखकर संतुलित समझौतों की ओर बढ़ रहा है।

भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौते का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि यह ऐसे समय में सामने आया है, जब विश्व अर्थव्यवस्था अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है। कोविड महामारी, रूस-यूक्रेन संघर्ष, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान और बढ़ते संरक्षणवाद ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित किया है। ऐसे समय में भारत और ब्रिटेन का यह समझौता वैश्विक अर्थव्यवस्था में विश्वास और सहयोग का नया संदेश देता है। यह संकेत है कि आर्थिक विकास का मार्ग बंद सीमाओं से नहीं, बल्कि संतुलित और न्यायसंगत साझेदारियों से होकर जाता है।

इस समझौते से भारतीय निर्यातकों को व्यापक अवसर प्राप्त होंगे। वस्त्र उद्योग, चमड़ा उद्योग, इंजीनियरिंग उत्पाद, समुद्री उत्पाद, कृषि प्रसंस्करण और सेवा क्षेत्र को ब्रिटिश बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मिलेगी। इससे न केवल निर्यात बढ़ेगा, बल्कि रोजगार सृजन और औद्योगिक विकास को भी नई गति मिलेगी। भारत के युवा उद्यमियों और स्टार्टअप क्षेत्र के लिए भी यह अवसरों का नया द्वार खोल सकता है।

हालाँकि, इस समझौते का महत्व केवल आर्थिक आँकड़ों तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक व्यापक रणनीतिक दृष्टि भी कार्य कर रही है। ब्रेक्जिट के बाद ब्रिटेन नई व्यापारिक साझेदारियों की तलाश में है, जबकि भारत वैश्विक आर्थिक मानचित्र पर अपनी उपस्थिति को और मजबूत करना चाहता है। ऐसे में दोनों देशों के हितों का यह मेल केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक महत्व भी रखता है। यह भारत की उस क्षमता का प्रमाण है, जिसके माध्यम से वह बदलती वैश्विक परिस्थितियों में अपने लिए नए अवसर निर्मित कर रहा है।

भारतीय आर्थिक कूटनीति की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने आर्थिक हितों और राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया है। लंबे समय तक यह धारणा रही कि वैश्वीकरण और राष्ट्रीय हित परस्पर विरोधी अवधारणाएँ हैं, किंतु भारत ने यह दिखाने का प्रयास किया है कि यदि नीति स्पष्ट हो और राष्ट्रीय प्राथमिकताएँ केंद्र में हों, तो वैश्विक सहभागिता राष्ट्रीय शक्ति को कमजोर नहीं, बल्कि सुदृढ़ कर सकती है। यही कारण है कि आत्मनिर्भर भारत और वैश्विक व्यापारिक विस्तार एक-दूसरे के पूरक के रूप में प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

भारत की वर्तमान आर्थिक कूटनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि वह केवल पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं है। एक ओर भारत अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के साथ आर्थिक संबंधों को सुदृढ़ कर रहा है, तो दूसरी ओर वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ भी अपने संबंधों का विस्तार कर रहा है। इससे भारत को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में देखा जा रहा है, जो विभिन्न आर्थिक और राजनीतिक ध्रुवों के बीच संवाद स्थापित करने की क्षमता रखता है। यही संतुलन भविष्य में भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक शक्ति बन सकता है।

विश्व व्यवस्था वर्तमान समय में परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। आर्थिक शक्ति का केंद्र धीरे-धीरे एशिया की ओर स्थानांतरित हो रहा है और भारत इस परिवर्तन का एक प्रमुख घटक बनकर उभर रहा है। विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ भारत को केवल एक विशाल बाजार के रूप में नहीं, बल्कि एक विश्वसनीय साझेदार, उत्पादन केंद्र और निवेश गंतव्य के रूप में देख रही हैं। यह स्थिति स्वतः नहीं बनी है, बल्कि इसके पीछे दीर्घकालिक नीति, आधारभूत संरचना के विस्तार, डिजिटल क्रांति और आर्थिक सुधारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

मुक्त व्यापार समझौते इसी व्यापक परिवर्तन की अभिव्यक्ति हैं। वे केवल शुल्क घटाने के दस्तावेज नहीं, बल्कि विश्वास, साझेदारी और साझा विकास की नई संभावनाओं के प्रतीक हैं। भारत यदि आने वाले वर्षों में इसी संतुलित और आत्मविश्वासपूर्ण दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ता है, तो वह न केवल अपनी आर्थिक शक्ति को सुदृढ़ करेगा, बल्कि वैश्विक नीति-निर्माण में भी अधिक प्रभावशाली भूमिका निभाने में सक्षम होगा। आज आवश्यकता केवल अधिक व्यापार करने की नहीं है, बल्कि ऐसी आर्थिक व्यवस्था निर्मित करने की है, जो भारत के विकास, रोजगार, नवाचार और राष्ट्रीय हितों को सशक्त बनाए। भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौता इसी दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है। यह उस नए भारत का परिचायक है, जो अवसरों से भयभीत नहीं होता, बल्कि उन्हें अपनी शक्ति में परिवर्तित करने का सामर्थ्य रखता है।

आर्थिक इतिहास के निर्णायक मोड़ों पर कुछ निर्णय केवल तत्काल लाभ के लिए नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा निर्धारित करने के लिए लिए जाते हैं। भारत की वर्तमान आर्थिक कूटनीति भी ऐसे ही एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। यदि बीती शताब्दी राजनीतिक स्वतंत्रता की थी, तो यह शताब्दी आर्थिक नेतृत्व की हो सकती है। प्रश्न केवल इतना है कि क्या भारत इस अवसर को पहचानकर उसे स्थायी राष्ट्रीय शक्ति में बदल पाता है। अब तक की यात्रा यह संकेत देती है कि भारत केवल वैश्विक व्यवस्था का सहभागी बनने से संतुष्ट नहीं है; वह उसे प्रभावित करने और नई दिशा देने की तैयारी में है।

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