मनोज कुमार जब भी दिल्ली आते, एक अजीब-सी बेचैनी उनके अंदर उठती। सिविल लाइंस के उन दो स्थानों से गुजरना उनके लिए सिर्फ रास्ता तय करना नहीं होता था यह एक चुपचाप अदा की जाने वाली नज़र थी। दिल्ली ब्रदरहुड हाउस और सेंट स्टीफंस अस्पताल। दोनों जगहें उनके जीवन की उस अंधेरी रात की याद दिलाती थीं, जब सब कुछ छूट गया था और कुछ भी बाकी नहीं बचा था।
अगस्त 1947। देश दो टुकड़ों में बंट चुका था। सरहद के उस पार से आते हुए मनोज कुमार का परिवार दिल्ली पहुँचा। छोटा भाई बीमार था। उसका इलाज सेंट स्टीफंस अस्पताल में हुआ। और सैकड़ों अन्य शरणार्थियों की तरह पूरा परिवार दिल्ली ब्रदरहुड हाउस के परिसर में ठहरा। इन दोनों स्थानों के प्रति कृतज्ञता का भाव उनके मन में जीवन भर बना रहा।
शरणार्थियों का सैलाब
उस समय दिल्ली की हालत भयावह थी। एक ओर सांप्रदायिक दंगों की लपटें उठ रही थीं, दूसरी ओर हिंदू-सिख शरणार्थियों का सैलाब शहर में घुस रहा था। लगभग नौ लाख की आबादी वाले इस शहर से करीब तीन लाख मुसलमान पाकिस्तान चले गए और लगभग पाँच लाख हिंदू-सिख शरणार्थी यहाँ आज के पाकिस्तान से आकर बसने लगे।पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर रेलगाड़ियाँ खून से सनी, घायल और आतंकित यात्रियों से भरी उतर रही थीं। हर तरफ चीखें, चीख-पुकार और असमंजस।
किनकी देखरेख में इलाज
सरकारी मशीनरी के अलावा कई स्वयंसेवी संगठन मैदान में उतरे। इनमें दिल्ली ब्रदरहुड सोसायटी (डीबीएस) भी शामिल थी। इसी मिशन ने 1881 में सेंट स्टीफंस कॉलेज और 1885 में सेंट स्टीफंस अस्पताल की नींव रखी। विभाजन की हिंसा के दौरान इनके कार्यकर्ता पुरानी दिल्ली स्टेशन पर पहुँच रहे घायलों और शरणार्थियों को अस्पताल ले जाते। कई घायलों का इलाज डॉ. रूथ रोजवियर जैसी चिकित्सकों की देखरेख में हुआ।
अकेले डीबीएस सक्रिय नहीं था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, सनातन धर्म और आर्य समाज के कार्यकर्ता सरहद पार से आ रहे शरणार्थियों की सुरक्षा, राहत शिविर और खाद्य वितरण में लगे थे। जत्थेदार संतोख सिंह के नेतृत्व में सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समितियों और अन्य सिख संगठनों ने भोजन, चिकित्सा सहायता और सुरक्षा का काम संभाला। आगे चलकर इन्हीं प्रयासों से दिल्ली में माता सुंदरी कॉलेज और हरकिशन पब्लिक स्कूल की स्थापना हुई।
किसने मारा उस फरिश्ते को
रेड क्रॉस दवाइयाँ और स्वास्थ्य सेवाएँ दे रहा था। लेडी माउंटबेटन के नेतृत्व में यूनाइटेड काउंसिल फॉर रिलीफ एंड वेलफेयर ने कई गैर-सरकारी संगठनों को समन्वित किया। डॉ. एन.सी. जोशी करोल बाग समेत कई इलाकों में घायलों की सेवा कर रहे थे। उन्हें भी दंगों में मार दिया गया। आज करोल बाग के जोशी रोड पर उनके नाम का अस्पताल चल रहा है।
इरविन अस्पताल (अब लोक नायक अस्पताल) और लेडी हार्डिंग अस्पताल में भी घायलों का इलाज हो रहा था। लेडी हार्डिंग कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ. के.जे. मैक्डरमेट और उनकी सहयोगी डॉ. ओ.पी. बाली रोज अठारह-अठारह घंटे मरीजों के साथ रहती थीं। गांधी जी की निजी चिकित्सक डॉ. सुशीला नैयर भी शरणार्थियों और घायलों के साथ थीं। वे गांधी जी के साथ दंगा-प्रभावित इलाकों में जाकर शांति की अपील करतीं। आगे चलकर वे दिल्ली की पहली स्वास्थ्य मंत्री बनीं।डीबीएस के प्रभारी बताते हैं कि मनोज कुमार जीवन के अंत तक संस्था का आदर करते रहे। इन स्वयंसेवी प्रयासों ने हजारों जिंदगियों को राहत दी।
विभाजन ने दिल्ली को गहरे घाव दिए। लाखों लोग विस्थापित हुए, हजारों मारे गए। लेकिन उसी अंधेरे में स्वयंसेवकों की रोशनी भी चमकती रही। बिना किसी राजनीतिक स्वार्थ के, धर्म और जाति की दीवारों को पार कर जो लोग घायलों को उठाकर ले जा रहे थे, वे मानवता के सच्चे प्रतिनिधि थे। आज भी कुछ बुजुर्ग मिल जाएँगे, जिन्होंने उस कठिन दौर में फरिश्तों को दिन-रात लूटे-पिटे लोगों की सेवा करते देखा था।

विवेक शुक्ला