भारत–अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते को लेकर देश में बहस तेज है। विशेष रूप से सेब और अन्य ताज़ा फलों के आयात को लेकर यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि इससे जम्मू–कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और पूर्वोत्तर के बागवानों को गंभीर नुकसान हो सकता है। “विदेशी सेबों की बाढ़” और “स्थानीय किसानों की तबाही” जैसे शब्द चर्चा में हैं। लेकिन जब इस मुद्दे को भावनाओं के बजाय आंकड़ों और नीति संरचना के आधार पर परखा जाता है, तो तस्वीर अलग दिखाई देती है।
सबसे पहले तथ्य यह है कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा सेब आयातक देश है। हर वर्ष लगभग 5.57 लाख मीट्रिक टन सेब आयात किए जाते हैं। यह कोई नई प्रवृत्ति नहीं है। पिछले कई वर्षों से आयात और घरेलू उत्पादन साथ-साथ बढ़ते रहे हैं। इस अवधि में भारत का सेब उत्पादन भी बढ़ा है। इसका अर्थ यह है कि आयात ने अपने आप में घरेलू बागवानी को ध्वस्त नहीं किया है।
इस स्थिति का कारण संरचनात्मक है। भारत में सेब का उत्पादन मौसमी है, जबकि मांग साल भर बनी रहती है। विशेषकर प्रीमियम और ऑफ-सीजन खंड में घरेलू आपूर्ति पूरी नहीं पड़ती। बड़े शहरों में उपभोक्ताओं का एक वर्ग विशेष किस्मों और बेहतर ग्रेडिंग वाले सेबों की मांग करता है। आयात इस मांग को पूरा करते हैं, न कि सीधे तौर पर स्थानीय उत्पादन का स्थान लेते हैं। यह समझना महत्वपूर्ण है कि भारत-अमेरिका समझौता बिना सीमा के आयात की अनुमति नहीं देता। इसके अंतर्गत चरणबद्ध कोटा प्रणाली लागू की गई है:
- पहला वर्ष: 1 लाख मीट्रिक टन
- दूसरा वर्ष: 1.25 लाख मीट्रिक टन
- तीसरे वर्ष से आगे: 1.5 लाख मीट्रिक टन
यह मात्रा कुल आयात और कुल खपत की तुलना में सीमित है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि कोटा से अधिक आयात पर 50 प्रतिशत शुल्क यथावत लागू रहेगा। अर्थात बाजार को पूरी तरह नहीं खोला गया है, बल्कि नियंत्रित ढांचा अपनाया गया है।
इसके अतिरिक्त सेबों के लिए न्यूनतम आयात मूल्य ₹80 प्रति किलोग्राम निर्धारित किया गया है। 35 प्रतिशत शुल्क रियायत के बावजूद प्रभावी लैंडिंग मूल्य लगभग ₹106 प्रति किलोग्राम बैठता है। यह मूल्य आमतौर पर प्रीमियम बाजार खंड में आता है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि आयातित सेब स्थानीय फसल के साथ मूल्य के स्तर पर हानिकारक प्रतिस्पर्धा न करें।
भारत में सेब की तुड़ाई मुख्यतः अगस्त से नवंबर के बीच होती है। आयात आमतौर पर उस अवधि में अधिक होते हैं जब घरेलू स्टॉक कम होता है। इस प्रकार साल भर बाजार में आपूर्ति बनी रहती है और कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोका जा सकता है। अत्यधिक मूल्य अस्थिरता किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए हानिकारक होती है। नियंत्रित आयात इस अस्थिरता को संतुलित कर सकते हैं।
केवल सेब ही नहीं, अंगूर, आम, केला और नारियल जैसे अन्य फलों को लेकर भी आशंकाएं व्यक्त की गई हैं। किंतु प्रत्येक क्षेत्र की बाजार संरचना भिन्न है। महाराष्ट्र के अंगूर और उत्तर प्रदेश तथा आंध्र प्रदेश के आम बड़े पैमाने पर निर्यात-उन्मुख हैं। उनकी किस्में, बाजार संरचना और मौसमी चक्र अमेरिकी आपूर्ति से अलग हैं। इसलिए सीधी प्रतिस्पर्धा का दावा प्रायः अतिशयोक्तिपूर्ण है।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कई संवेदनशील कृषि उत्पाद इस समझौते से बाहर रखे गए हैं। चावल, गेहूं, डेयरी, पोल्ट्री, आनुवंशिक रूप से परिवर्तित खाद्य पदार्थ, इथेनॉल और अन्य महत्वपूर्ण उत्पादों पर कोई रियायत नहीं दी गई है। जहां आवश्यक था, वहां टैरिफ रेट कोटा और अन्य सुरक्षा उपाय लागू किए गए हैं। इससे स्पष्ट है कि कृषि क्षेत्र की संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर संतुलित नीति बनाई गई है।
भारत पहले ही जापान, दक्षिण कोरिया और आसियान देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते कर चुका है। पिछले अनुभव बताते हैं कि चरणबद्ध और नियंत्रित व्यवस्था के माध्यम से घरेलू क्षेत्रों को झटका दिए बिना अनुकूलन संभव है। आयात अपने आप में समस्या नहीं होते; समस्या तब होती है जब नीति ढांचा असंतुलित हो। इस मामले में ऐसा नहीं है।
वास्तविक चुनौती सेब क्षेत्र की आंतरिक कमियों में है। उत्पादकता की सीमाएं, कोल्ड चेन की कमी, ग्रेडिंग और भंडारण अवसंरचना की अपर्याप्तता तथा विपणन ढांचे की कमजोरियां प्रमुख मुद्दे हैं। यदि इन क्षेत्रों में सुधार किया जाए तो भारतीय बागवानी अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकती है। सीमित और नियंत्रित आयात को मुख्य खतरे के रूप में प्रस्तुत करना मूल समस्याओं से ध्यान हटाता है।
व्यापार समझौते द्विपक्षीय होते हैं। जहां एक ओर फलों के आयात के लिए नियंत्रित ढांचा है, वहीं दूसरी ओर भारत को वस्त्र, औषधि, मशीनरी और अन्य क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलता है। बढ़ते निर्यात से अवसंरचना, लॉजिस्टिक्स और कोल्ड स्टोरेज में निवेश को बल मिल सकता है, जिसका सीधा लाभ कृषि राज्यों को होगा। सार्वजनिक विमर्श में संतुलन आवश्यक है। इस समझौते की संरचना स्पष्ट रूप से दर्शाती है:
- सीमित और चरणबद्ध कोटा
- न्यूनतम आयात मूल्य की बाध्यता
- कोटा से अधिक आयात पर पूर्ण शुल्क
- संवेदनशील कृषि उत्पादों की स्पष्ट सुरक्षा
ये तत्व संकेत देते हैं कि यह नीति अंधाधुंध उदारीकरण की नहीं, बल्कि संतुलित व्यापार प्रबंधन की है। डर सुर्खियां बनाता है, लेकिन नीति आंकड़ों से बनती है। यदि बहस तथ्यों के आधार पर की जाए तो स्पष्ट है कि भारत–अमेरिका व्यापार समझौता सेब उत्पादकों के लिए तात्कालिक खतरा नहीं है, बल्कि नियंत्रित और संतुलित ढांचे के साथ आगे बढ़ने का प्रयास है। नीति का मूल्यांकन भावनाओं से नहीं, तथ्यों से होना चाहिए।