ईरानः अंतर्कलह और भारत पर इसका प्रभाव

ईरानः अंतर्कलह और भारत पर इसका प्रभाव

मेजर सरस् त्रिपाठी

By : Swadesh Bhopal
ईरानः अंतर्कलह और भारत पर इसका प्रभाव

इस समय ईरान में एक व्यापक विरोध आंदोलन फैल रहा है, जो आर्थिक संकट से शुरू होकर राजनीतिक विद्रोह तक पहुँच गया है। देशव्यापी प्रदर्शन, जो मूलतः महंगाई, मुद्रा के अवमूल्यन और बेरोजगारी के विरुद्ध थे, धीरे-धीरे सरकार और सर्वोच्च नेता आयातुल्लाह अली खामेनेई के खिलाफ गहरे असंतोष की अभिव्यक्ति बन गए हैं। इन प्रदर्शनों में बाजारों के व्यापारियों, छात्रों और श्रमिकों सहित समाज के हर वर्ग की भागीदारी देखी जा रही है।

हाल के आंकड़ों के मुताबिक, विरोध प्रदर्शनों के कारण अब तक हुई मौतों का आंकड़ा संभवतः 12,000 से अधिक तक पहुँच चुका है और सरकार ने हजारों लोगों को गिरफ्तार किया है। सरकार ने इंटरनेट और संचार सेवाओं पर कठोर प्रतिबंध लगा दिए हैं, जिससे सूचना के प्रवाह को रोकने की कोशिश की जा रही है।

ये विरोध केवल छोटी-मोटी नाराजगी नहीं हैं। ये 2022 के ‘महसा अमीनी हिंसा विरोध’ के बाद के सबसे बड़े विद्रोह माने जा रहे हैं और असंतोष कई क्षेत्रों में सरकार की वैधता को चुनौती देने लगा है। ईरान के वर्तमान विद्रोह की जड़ें कुछ तात्कालिक और कई दीर्घकालिक, इतिहास में गहरे धंसे कारणों से जुड़ी हैं।

“ईरान दुनिया का पहला ऐसा मुस्लिम देश होगा जो इस्लाम को त्याग देगा” ऐसी घोषणाएं अनेक अध्येता पिछले कई वर्षों से करते आ रहे हैं। शरिया कानून को जबरन लागू करने के लिए जिस प्रकार का मानवाधिकार हनन ईरान में हुआ है, वह अत्यंत विद्रूप है। महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन, युवाओं पर तरह-तरह के अत्याचार और समलैंगिकता के संदेह मात्र पर फांसी ये सभी घटनाएं भीतर ही भीतर ज्वालामुखी की तरह धधक रही हैं। लगभग 5,000 युवाओं को समलैंगिकता के कारण या उसके संदेह में फांसी पर चढ़ाया गया।

कट्टरपंथी इस्लाम ने संसार की जिन महान सभ्यताओं का विनाश किया है, उनमें ईरान एक महत्वपूर्ण नाम है। ‘ईरान’ शब्द की उत्पत्ति ‘आर्यान’ से हुई है। भारतीय और पारसी आपस में अत्यंत निकट संबंधी हैं। आर्य और द्रविड़ भौगोलिक शब्द हैं, न कि जातीय (racial)। ईरान का प्राचीन नाम ‘पारस’ था, जो अरबों के ध्वनि परिवर्तन (phonetic transliteration) के कारण ‘फारस’ बना और इसी से भाषा का नाम ‘फारसी’ पड़ा।

सामान्य तौर पर जो जरथुस्त्र को मानते थे, वे ‘पारसी’ कहलाए और जिन्हें जबरन धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बनाया गया, वे अनेक नामों से जाने गए। अधिकांश पारसियों ने अरबों के साथ आए इस्लाम को हृदय से कभी स्वीकार नहीं किया और अपनी श्रेष्ठ सभ्यता को जंगली अरबों द्वारा रौंदे जाने को भी नहीं माना। वे प्रारंभ से ही जबरन थोपे गए मजहब को अस्वीकार करते रहे।

1979 की इस्लामिक क्रांति और उसकी विरासत भी एक प्रमुख कारण है। 1979 में ईरान में शाह की पारंपरिक, पाश्चात्य-समर्थित शासन प्रणाली को गिराकर इस्लामिक गणराज्य की स्थापना की गई। इस क्रांति ने समाज को धर्म और राज्य शक्ति के बीच एक नई संरचना में बाँध दिया, जहाँ ऊपर से थोपे गए मजहबी नेतृत्व (वली-ए-फ़क़ीह) ने शासन के प्रमुख शक्ति केंद्र के रूप में स्थान बना लिया।

इस प्रणाली ने मजहबी नियमों को राष्ट्रव्यापी कानून का रूप दिया और राजनीतिक स्वतंत्रता व महिलाओं के अधिकारों पर कठोर प्रतिबंध लगाए। प्रारंभ में यह व्यवस्था कुछ वर्गों में लोकप्रिय रही, लेकिन समय के साथ धार्मिक शासन की कठोरता और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के टकराव ने व्यापक असंतोष को जन्म दिया।

दूसरा प्रमुख कारण आर्थिक संकट और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हैं। ईरान की अर्थव्यवस्था दशकों से अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, तेल राजस्व में गिरावट और कुप्रबंधन से जूझ रही है। इन आर्थिक दबावों के कारण स्थानीय मुद्रा रियाल का अवमूल्यन हुआ, महंगाई बढ़ी और दैनिक आवश्यकता की वस्तुओं के दाम आसमान छूने लगे।

दिसंबर 2025 में मुद्रास्फीति 40–50 प्रतिशत से ऊपर पहुँच गई, जिससे आम जनता की क्रय शक्ति पर गहरा असर पड़ा। ये कठिनाइयाँ केवल आर्थिक नहीं रहीं, बल्कि इन्होंने राजनीतिक असंतोष को भी बढ़ावा दिया, क्योंकि लोग बुनियादी जीवन आवश्यकताओं के लिए संघर्ष करते हुए शासन से जवाबदेही की माँग करने लगे।

तीसरा कारण सामाजिक आंदोलनों और महिला अधिकार संघर्ष से जुड़ा है। 2019 के बाद और विशेष रूप से महसा अमीनी की मौत (2022) के बाद ‘औरत, जिंदगी, आज़ादी’ का नारा व्यापक रूप से उभरा। यह आंदोलन पारंपरिक धार्मिक नियमों के विरोध में लैंगिक समानता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय की माँग का प्रतीक बन गया। इन आंदोलनों ने ईरान की सामाजिक कमजोरियों, विशेषकर युवाओं और महिलाओं की गहरी निराशा को उजागर किया, जो वर्तमान विद्रोह की एक अहम परत है।

चौथा कारण कट्टरपंथी इस्लाम द्वारा ईरानी जनता पर किए गए अत्याचार हैं। ईरान का राजनीतिक ढांचा शिया इस्लाम के कठोर धार्मिक सिद्धांतों पर आधारित है। राजनीति से लेकर न्याय व्यवस्था तक, हर स्तर पर मजहबी विचारधारा का वर्चस्व है। शासन की प्रतिष्ठा और निर्णय प्रक्रिया अक्सर शरिया कानूनों पर आधारित होती है, जिससे जनहित की अपेक्षा मजहबी आदेशों को प्राथमिकता मिलती है। इसके परिणामस्वरूप सामाजिक उदारता पर पाबंदियाँ लगीं और मानवाधिकारों के संघर्ष गहराते चले गए।

पांचवां कारण ईरान की विदेश नीति में कट्टर धार्मिक तत्वों का प्रभाव है जैसे क्षेत्रीय संघर्षों में हस्तक्षेप, आतंकी संगठनों को समर्थन और अमेरिका तथा इजराइल के साथ निरंतर टकराव। इस संकीर्ण मजहबी दृष्टिकोण ने आर्थिक और राजनीतिक दबाव को और बढ़ाया तथा घरेलू असंतोष को गहरा किया। ईरान ने न केवल अमेरिका और इजराइल से टकराव का रास्ता चुना, बल्कि हिज़्बुल्ला, हमास जैसे कई आतंकी संगठनों को खड़ा किया, उन्हें पनाह, धन और प्रशिक्षण दिया।

ईरान का भविष्य कई संभावित परिदृश्यों में बँटा हुआ है, जो इस बात पर निर्भर करेगा कि आंतरिक असंतोष, सुरक्षा प्रतिक्रिया और अंतरराष्ट्रीय दबाव किस दिशा में जाते हैं। यदि नेतृत्व आर्थिक सुधार, राजनीतिक समावेशन और सामाजिक स्वतंत्रता की दिशा में वास्तविक कदम उठाता है, तो धीरे-धीरे राजनीतिक वैधता बहाल हो सकती है और एक स्थिर लोकतांत्रिक मार्ग खुल सकता है। हालांकि, यह मार्ग अत्यंत कठिन है।

यदि वर्तमान हिंसक दमन जारी रहता है, तो शासन अस्थिरता को बलपूर्वक नियंत्रित करने की कोशिश करता रहेगा, लेकिन यह तरीका अंततः और अधिक असंतोष तथा अंतरराष्ट्रीय अलगाव को जन्म देगा। विदेशी दबावों और घरेलू असंतोष के बीच ईरान फिलहाल एक नाजुक संतुलन साधे हुए है। पूर्ण तख्तापलट या तत्काल सरकार का पतन संभव नहीं दिखता, लेकिन समय के साथ एक धीमी और जटिल परिवर्तन प्रक्रिया सामने आ सकती है।

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