Iran-US War Tensions and Global Impact

ईरान-अमेरिका और युद्ध का बढ़ता दायरा…

ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता टकराव मध्य-पूर्व को अस्थिर कर रहा है। ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक राजनीति और भारत की चिंताएं इस युद्ध से सीधे जुड़ती दिख रही हैं।

By : स्वदेश डेस्क
ईरान-अमेरिका और युद्ध का बढ़ता दायरा…

मध्य-पूर्व में शनैः शनैः तीसरे विश्व युद्ध जैसी स्थितियां निर्मित होती नजर आ रही हैं। ब्रिटेन में आज हुए घटनाक्रम के बाद यह तनाव आगे क्या रूप लेगा, यह कह पाना मुश्किल है। ईरान में सर्वोच्च नेता खामेनेई की मौत और उनकी बेटी, दामाद, बहू व पोती के भी इस पूरे हमले में मारे जाने की खबरें यह बताती हैं कि अमेरिका-इजराइल के इस संयुक्त अभियान में ईरान जिस तरह से घिरा है, उसके बाद हालात आसानी से नियंत्रण में नहीं आने वाले हैं। अब उग्रता और बढ़ेगी, इसमें कोई दो राय नहीं है।

यह सच है कि ईरान के साथ युद्ध का अंदेशा तो लंबे समय से था, लेकिन इतनी भयावह आक्रामकता के कयास नहीं लगाए गए थे। अब जब अमेरिकी और इजरायली हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता के साथ कई महत्वपूर्ण लोग मारे गए हैं, तब मध्य-पूर्व में वार और पलटवार भी तेज हो गया है। ऐसा लग रहा है कि इस युद्ध का उद्देश्य केवल ईरान में सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि पूरे इस्लामी शासन का अंत है।

अगर इसे इस नजरिए से देखें तो स्पष्ट होता है कि इस्लामिक कट्टरता और कट्टरपंथी आक्रांताओं द्वारा मुस्लिम कौम में जो विषाक्त मानस पैदा किया गया, उसके खात्मे की घड़ी आ गई है। अब बड़ा सवाल यह है कि खामेनेई के बाद ईरान का क्या होगा। यह आकलन भी लगाया जा रहा है कि यह युद्ध पश्चिम एशिया और विश्व राजनीति को भी काफी हद तक प्रभावित करेगा।

अमेरिका और ईरान के बीच दोस्ती और दुश्मनी के रिश्ते रहे हैं। एक समय यहां पहलवी शासन की स्थापना में ब्रिटिशों ने अहम भूमिका निभाई थी, लेकिन बाद में पहलवी सरकार अमेरिका के करीब हो गई। यह नजदीकी इतनी बढ़ गई थी कि शाह शासन को वाशिंगटन की ‘कठपुतली’ कहा जाने लगा। सरकार का विरोध करने वालों पर कार्रवाइयां शुरू हो गई थीं। इसी ने 1979 की इस्लामी क्रांति की नींव रखी, जिसकी सफलता के बाद पश्चिमी प्रभाव वाले समाज को बढ़ावा देने वाले रजा पहलवी को निर्वासन झेलना पड़ा। तब से ईरान की सत्ता अमेरिका को चुभती रही है, मगर तमाम कोशिशों के बावजूद वह सफल नहीं हो सका।

यह भी स्पष्ट है कि युद्ध विश्व व्यवस्था के प्रतिकूल है। इससे ऊर्जा सुरक्षा पर सबसे अधिक खतरा पैदा होता है। यदि तेल जहाजों को होर्मुज जलडमरूमध्य के बजाय अफ्रीका का रास्ता अपनाना पड़े, तो लागत काफी बढ़ सकती है। इसी मार्ग से खाड़ी देशों का तेल चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया जैसे देशों में जाता है। अमेरिका ने भले ही भारत से वेनेजुएला से तेल आपूर्ति की बात कही हो, लेकिन भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, यानी करीब 13 लाख बैरल प्रतिदिन। इतनी बड़ी मात्रा में वेनेजुएला से आपूर्ति आसान नहीं है।

ऐसे में भारत के लिए अपने संसाधनों और अक्षय ऊर्जा के विस्तार की जरूरत और बढ़ जाती है। मध्य-पूर्व की अस्थिरता विश्व व्यवस्था की भी परीक्षा ले सकती है। ईरान ने अमेरिकी-इजराइली हमले के जवाब में उन देशों पर मिसाइलें दागी हैं, जहां अमेरिका के सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। इससे युद्ध का दायरा और बढ़ गया है, जिसका सीधा असर निवेश पर पड़ सकता है। भारत भी इस क्षेत्र में निवेश करता रहा है।

भारत के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से यह तनावपूर्ण युद्ध हालात परेशानी का कारण हैं। यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो गैस आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जो खाड़ी देशों से आती है। इसके साथ ही खाड़ी देशों में रह रहे करोड़ों प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा है। ईरान में कई भारतीय छात्र फंसे हुए हैं और दुबई में भी बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं।

कुल मिलाकर यह युद्ध दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को प्रभावित कर सकता है। ईरान युद्ध उन सभी क्षेत्रों में महत्वाकांक्षाएं बढ़ा सकता है, जो अपनी सत्ता से नाराज हैं, बलूचिस्तान भी उनमें से एक है। फिलहाल स्थिति को देखते हुए ‘इंतजार करो’ की नीति ही लागू होती है।

 

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