जल संरक्षण की आवश्यकता

जो बचाएँगे वही बचाएगा : जल, ऊर्जा और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग का समय

  प्रो. आर. सी. कुहाड़

By : स्वदेश डेस्क
जो बचाएँगे वही बचाएगा : जल, ऊर्जा और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग का समय

मानव सभ्यता आज ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ विज्ञान, तकनीक और आधुनिक सुविधाओं ने जीवन को अभूतपूर्व गति और सहजता प्रदान की है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंटरनेट, स्मार्ट उपकरणों तथा डिजिटल प्रणालियों ने हमारे दैनिक कार्यों को अत्यंत सरल बना दिया है। आज ज्ञान, सूचना, संचार और सेवाएँ हमारी उँगलियों के स्पर्श मात्र से उपलब्ध हो जाती हैं। यह युग निस्संदेह मानव बुद्धिमत्ता और वैज्ञानिक प्रगति का स्वर्णिम अध्याय है।   किन्तु इस सुविधा और विकास के पीछे एक ऐसा पक्ष भी है जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है: प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव। आधुनिक जीवन की लगभग प्रत्येक सुविधा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जल, ऊर्जा और प्रकृति पर निर्भर है। बिजली उत्पादन से लेकर डेटा केंद्रों के संचालन तक, उद्योगों से लेकर डिजिटल सेवाओं तक, हर क्षेत्र में संसाधनों की निरंतर आवश्यकता होती है। ऐसे में यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या हम इन संसाधनों का उपयोग उतनी ही जिम्मेदारी से कर रहे हैं, जितनी उनसे अपेक्षित है?

संसाधनों का  विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक

मानव जीवन में संसाधनों का उपयोग अनिवार्य है। समस्या उपयोग में नहीं, बल्कि अनावश्यक और असंतुलित उपयोग में है। आज हम अनेक बार ऐसी गतिविधियों में ऊर्जा और संसाधन व्यय कर देते हैं जिनकी वास्तव में आवश्यकता नहीं होती।
डिजिटल तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है, और एक पहलू यह भी है कि  ऊर्जा उत्पादन की अधिकांश प्रक्रियाएँ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जल पर निर्भर करती हैं। इसलिए बिजली की अनावश्यक खपत वास्तव में जल संसाधनों पर भी अतिरिक्त दबाव डालती है।  हम अपने आसपास अक्सर देखते हैं कि कई स्थानों पर स्ट्रीट लाइटें सूर्योदय के बाद भी घंटों तक जलती रहती हैं। कार्यालयों और भवनों में खाली कमरों की बत्तियाँ तथा वातानुकूलन उपकरण अनावश्यक रूप से चलते रहते हैं। यह केवल बिजली की बर्बादी नहीं है, बल्कि उन प्राकृतिक संसाधनों का भी अपव्यय है जिनके आधार पर ऊर्जा का उत्पादन संभव हो पाता है। सतत विकास की अवधारणा हमें यही सिखाती है कि विकास और संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। यदि संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग नहीं किया गया, तो आज की सुविधाएँ भविष्य की पीढ़ियों के लिए संकट का कारण बन सकती हैं।

जल : जीवन का आधार और सभ्यता की धुरी

पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व जल पर आधारित है। मनुष्य, पशु, पक्षी, वनस्पतियाँ तथा सूक्ष्म जीव, सभी किसी न किसी रूप में जल पर निर्भर हैं। जल केवल जैविक आवश्यकता नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन का भी मूल आधार है।  दुर्भाग्यवश वर्तमान समय में बढ़ती जनसंख्या, तीव्र शहरीकरण, औद्योगिकीकरण और जल के असंतुलित उपयोग ने जल संकट की समस्या को गंभीर बना दिया है। अनेक क्षेत्रों में भूजल स्तर निरंतर गिर रहा है। नदियाँ, तालाब, झीलें और पारंपरिक जल स्रोत प्रदूषण, अतिक्रमण तथा उपेक्षा के कारण अपनी क्षमता खोते जा रहे हैं।  विश्व स्तर पर किए गए विभिन्न अध्ययनों से स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि यदि वर्तमान प्रवृत्तियाँ जारी रहीं, तो आने वाले दशकों में जल संकट विश्व की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन सकता है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। देश के अनेक भागों में जल उपलब्धता और जल मांग के बीच का अंतर लगातार बढ़ रहा है। यह केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं है; इसका प्रभाव कृषि, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था, सामाजिक समानता और मानव जीवन की गुणवत्ता पर भी पड़ता है।

छोटी आदतें, बड़ा परिवर्तन

जल संरक्षण की दिशा में सबसे प्रभावी कदम अक्सर बहुत छोटे होते हैं। हमारे दैनिक व्यवहार में कुछ साधारण परिवर्तन लाखों लीटर जल बचा सकते हैं।  प्रतिदिन वाहन धोना, आवश्यकता से अधिक पानी से फर्श साफ करना, घर के सामने सड़क पर पानी बहाकर सफाई करना, पौधों को जरूरत से अधिक सिंचित करना तथा उपयोग के बाद नलों को खुला छोड़ देना, ये ऐसी आदतें हैं जो अनजाने में जल की बड़ी मात्रा को व्यर्थ कर देती हैं। यदि प्रत्येक नागरिक केवल उतना ही जल उपयोग करे जितना वास्तव में आवश्यक है, तो सामूहिक रूप से इसका प्रभाव अत्यंत व्यापक हो सकता है। जल संरक्षण की शुरुआत किसी बड़े अभियान से नहीं, बल्कि घर के एक बंद नल, एक बचाई हुई बाल्टी पानी और एक जागरूक निर्णय से होती है।

जल के बिना जीवन की कोई कल्पना भी नहीं की जा सकती

अफ्रीकी लोकज्ञान की एक प्रसिद्ध कहावत है
“जब आप स्वयं पानी ढोते हैं, तब आपको उसकी प्रत्येक बूंद का महत्व समझ में आता है।”
यह कथन केवल जल के महत्व का वर्णन नहीं करता, बल्कि मानव व्यवहार का भी गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। जिस वस्तु को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति परिश्रम करता है, उसका मूल्य उसके मन में स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है।

आधुनिक जीवन में पानी और बिजली इतनी सहजता से उपलब्ध हैं कि हम कई बार उनके वास्तविक महत्व को भूल जाते हैं। नल खोलते ही पानी आ जाता है, स्विच दबाते ही प्रकाश उपलब्ध हो जाता है। इस सहज उपलब्धता ने संसाधनों के प्रति हमारी संवेदनशीलता को कहीं न कहीं कम किया है। आज आवश्यकता है कि हम संसाधनों को सुविधा नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व के रूप में देखना सीखें।

जल संकट : पर्यावरण से आगे की चुनौती

वर्तमान वैज्ञानिक अनुसंधान यह स्पष्ट करते हैं कि जल संकट का प्रभाव केवल जल उपलब्धता तक सीमित नहीं रहता। इसका सीधा संबंध मानव स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, कृषि उत्पादन और जैव विविधता से भी है।
जब जल की कमी होती है, तो कृषि प्रभावित होती है। कृषि प्रभावित होने पर खाद्य उत्पादन कम होता है। खाद्य उत्पादन में कमी आर्थिक असमानता को बढ़ाती है और समाज के कमजोर वर्गों पर सबसे अधिक प्रभाव डालती है।  आज भी देश के कई प्रदेशों में  महिलाएँ और बच्चे प्रतिदिन कई किलोमीटर दूर से पानी लाने के लिए विवश हैं। इससे उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होती है। इस दृष्टि से जल संरक्षण सामाजिक न्याय और मानव अधिकारों से भी जुड़ा हुआ विषय है।

पुनः उपयोग की संस्कृति विकसित करनी होगी

जल संरक्षण का एक अत्यंत व्यावहारिक उपाय है-जल का पुनः उपयोग। घरों, विद्यालयों, कार्यालयों, होटलों तथा सार्वजनिक स्थलों पर बचा हुआ पानी यदि व्यवस्थित रूप से एकत्र किया जाए, तो उसका उपयोग पौधों की सिंचाई, उद्यानों, रसोई बगीचों तथा पशु-पक्षियों की आवश्यकताओं के लिए किया जा सकता है। जैसे हम ठोस कचरे के लिए डस्टबिन रखते हैं, उसी प्रकार "जल संग्रह पात्र" या "वेस्ट वाटर बिन" जैसी व्यवस्था विकसित की जा सकती है। इससे न केवल जल की बचत होगी, बल्कि लोगों में संरक्षण के प्रति व्यवहारिक चेतना भी विकसित होगी। संसाधनों के पुनः उपयोग की संस्कृति ही भविष्य की टिकाऊ जीवनशैली का आधार बनेगी।

परंपरा और विज्ञान का समन्वय

भारतीय सभ्यता जल संरक्षण के क्षेत्र में सदियों से समृद्ध अनुभव रखती है। प्राचीन काल में बावड़ियाँ, कुएँ, तालाब, जोहड़ और वर्षा जल संचयन की विभिन्न प्रणालियाँ समाज के जीवन का अभिन्न अंग थीं।
इन व्यवस्थाओं ने केवल जल उपलब्धता सुनिश्चित नहीं की, बल्कि सामुदायिक सहभागिता और प्रकृति के प्रति सम्मान की संस्कृति भी विकसित की। आज आवश्यकता है कि हम इन पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ जोड़ें। वर्षा जल संचयन प्रणालियों को व्यापक स्तर पर अपनाया जाए, भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा दिया जाए तथा स्थानीय जल स्रोतों के संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए। अतीत की बुद्धिमत्ता और वर्तमान की वैज्ञानिक क्षमता मिलकर ही भविष्य का समाधान तैयार कर सकती हैं।

जनभागीदारी से बनेगा जल संरक्षण आंदोलन

जल संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं का विषय नहीं है। यह तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक समाज स्वयं इसमें सक्रिय भागीदारी न करे। नलों को खुला न छोड़ना, आवश्यकता अनुसार ही पानी परोसना, वर्षा जल संचयन को अपनाना, वृक्षारोपण करना और स्थानीय जल स्रोतों की स्वच्छता बनाए रखना, ये सभी छोटे कदम सामूहिक रूप से बड़े परिणाम उत्पन्न कर सकते हैं। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, सामाजिक संगठनों और मीडिया को भी जल संरक्षण की चेतना फैलाने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। जागरूक नागरिक ही जागरूक समाज का निर्माण करते हैं।

युवा शक्ति : परिवर्तन की सबसे बड़ी आशा

किसी भी सामाजिक परिवर्तन की सबसे बड़ी शक्ति युवा वर्ग होता है। यदि युवाओं को जल संरक्षण के व्यावहारिक उपायों से जोड़ा जाए, तो यह अभियान एक व्यापक जनांदोलन का रूप ले सकता है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में जल संरक्षण परियोजनाएँ, पौधारोपण अभियान, स्थानीय जल स्रोतों की सफाई तथा सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रम युवाओं में उत्तरदायित्व की भावना विकसित कर सकते हैं।

आज का जागरूक युवा ही कल का उत्तरदायी नागरिक बनेगा और वही भविष्य की पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान तैयार करेगा।

भविष्य के प्रति हमारी जिम्मेदारी

मानव इतिहास हमें यह सिखाता है कि सभ्यताएँ केवल संसाधनों के कारण विकसित नहीं होतीं, बल्कि उनके विवेकपूर्ण उपयोग के कारण टिकाऊ बनती हैं। यदि आज हम जल, ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रति गंभीर नहीं हुए, तो आने वाले वर्षों में संकट और गहरा हो सकता है। इसलिए आवश्यक है कि हम जल को केवल उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की अमूल्य धरोहर समझें।

“पानी बचाओ, जीवन बचाओ” केवल एक नारा नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का आधारभूत सिद्धांत है।

अंग्रेज़ी का एक प्रेरक वाक्य है:
“What We Save, Saves Us.”

अर्थात:
“जो हम बचाते हैं, वही अंततः हमें बचाता है।”

यह संदेश आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। जल, ऊर्जा और प्रकृति के प्रति संवेदनशील होकर ही हम ऐसा भविष्य निर्मित कर सकते हैं जो सुरक्षित, संतुलित, समृद्ध और टिकाऊ हो। संसाधनों के संरक्षण का प्रत्येक प्रयास वास्तव में मानवता के संरक्षण का ही प्रयास है। इसलिए समय की पुकार है कि हम आज से, अभी से और अपने स्तर से शुरुआत करें क्योंकि जो बचाएँगे, वही हमें बचाएगा।

(लेखक  प्रो. आर. सी. कुहाड़ अंतरराष्ट्रीय स्तर के वैज्ञानिक एवं सेंट्रल यूनिवर्सिटी हरियाणा के पूर्व कुलपति हैं)

 

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