सुदर्शन जी का जीवन वृतांत

जैसा उन्हें देखा-समझा: सरसंघचालक श्री के. एस. सुदर्शनजी

सदानन्द दामोदर सप्रे

By : नरेंद्र कुमार
जैसा उन्हें देखा-समझा: सरसंघचालक श्री के. एस. सुदर्शनजी

संघ के कारण इस युग के जिन महापुरुषों से निकट संबंध हुआ, परम पूज्य सुदर्शन जी उन्हीं में से एक हैं। उनकी बैठकों उपस्थित का और आने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, उन के उद्‌बोधन, विभिन्न दायित्वों का निवर्तन करते समय अनेक अवसरों पर उन के साथ प्रवास में सौभाग्य, हुआ ही;  सरसंघचालक के दायित्व से निवृत्त होने के उनका मुख्यालय भोपाल का प्रांतीय संघ कार्यालय 'समिधा' निर्धारित होने के बाद उसी कार्यालय में उन के साथ दो वर्ष से अधिक समय तक रहने का परम सौभाग्य भी मिला। प्रवास और निवास के कारण उन्हें निकट से देखने-समझने का अवसर मिला। उन की जो असंख्य बातें- यादें हैं उन में से ही कुछ यहाँ प्रस्तुत हैं।

अन्य देशों में हिन्दू का व्यवहार 

श्री गुरुजी जन्म-शताब्दी के निमित्त सरसंघचालक इस रूप में सुदर्शन जी का 2007 की मकर संक्रांति के अवसर पर केन्या में प्रवास हुआ था। उस समय वहाँ की राजधानी नैरोबी में हिन्दू समाज की भव्य शोभायात्रा का आयोजन किया गया था जिस में पंथ-संप्रदाय और भाषा आधारित 30 से अधिक संगठनों और संस्थाओं ने बड़े उत्साह से भाग लिया। उस के समापन के अवसर पर हजारों की संख्या में उपस्थित जन समुदाय को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि अपने पंथ-संप्रदाय और भाषा का अभिमान रखने के साथ ही हमने अपनी 'हिन्दू' इस पहचान को भी सदैव स्मरण में रखना चाहिए और वर्ष में कुछ अवसरों पर 'हिन्दू' इस रूप में इकठ्‌ठे होना चाहिए।

 नैरोबी के मन्दिर से जुड़े लोगों के साथ वार्तालाप के समय उन्होंने कहा कि मन्दिरों में वैभव का अत्यधिक प्रदर्शन ठीक नहीं। हिन्दू की विशेषता विलासिता नहीं, सादगी है। साथ ही उन्होंने कहा कि स्थानीय अफ्रीकी समाज में अत्यधिक गरीबी है, अतः उन की भलाई के कुछ काम प्रत्येक मन्दिर समिति द्वारा हाथ में लेने चाहिए। संघ के कार्यकर्ताओं की बैठकों में भी उन्होंने स्थानीय समाज के लिए सेवाकार्य बढ़ाने पर बल दिया।

कार्यकर्ताओं के साथ हुए एक अनौपचारिक वार्तालाप में उन्होंने कहा कि भारत में बच्चों के लिए पंचतंत्र और हितोपदेश जैसी जो संस्कारप्रद पुस्तकें हैं, उसी प्रकार अफ्रीकी बच्चों के लिए भी उनकी भाषा 'स्वाहिली' में इन पुस्तकों के भाषांतर होने चाहिए तथा उसी प्रकार की नई पुस्तकें लिखी जानी चाहिए। इन पुस्तकों में अफ्रीका में पाए जाने वाले जानवरों और पक्षियों के स्वभावों को ध्यान में रखकर लिखी कथाएँ भी सम्मिलित हों तो बहुत अच्छा रहेगा। 

दूसरे देशों के स्थानीय समाज के लिए उनके मन में जो अपनेपन के भाव थे, उनका कितना अच्छा प्रभाव जनों के मनों पर होता था, इसका प्रत्यक्ष दर्शन किसुमू नामक नगर में हुआ। उस नगर की महापौर एक अफ्रीकी महिला थीं। उनकी सौजन्य भेंट आयोजित की गई थी। उस भेंट के दौरान प्रारंभ में महापौर की बातें एकदम औपचारिक स्वरूप की थीं। वार्तालाप के दौरान सुदर्शन जी ने वहाँ के अतिविशाल सरोवर के सौंदर्य की प्रशंसा की और कहा कि इस Victoria Lake का यह नाम तो अंग्रेजों का दिया हुआ है। उसका मूल नाम क्या है? वहाँ बैठे हुए किसी को भी मालूम नहीं था। तब पीछे खड़े एक बुजुर्ग अफ्रीकी ने कहा कि उसका मूल नाम 'लोलवा' है।  

इस पर सुदर्शन जी ने कहा कि तब तो यह सरोवर इसी नाम से पहचाना जाना चाहिए, क्योंकि अंग्रेजों का दिया नाम तो गुलामी का चिह्न है। किसी दूसरे देश का व्यक्ति मेरे देश के राष्ट्रीय स्वाभिमान के बारे में इतना सोचता है, यह बात महापौर के हृदय को छू गई और उस समय तक केवल औपचारिकता के नाते बातें करने वाली वह महिला अब हिन्दू-अफ्रीकी संस्कृतियों में समानता, भारत-केन्या में अच्छे संबंधों की आवश्यकता व संभावना जैसे विषयों पर खुलकर बातें करने लगी।

वहाँ बैठे अन्य अफ्रीकी अधिकारी भी, जो अब तक चुप थे, वार्तालाप में भाग लेने लगे। सौजन्य भेंट के लिए निर्धारित समयावधि समाप्त होने के बाद भी लंबे समय तक वार्तालाप होता रहा। इस तरह उस केन्या प्रवास के दौरान परम पूजनीय गुरुजी का कथन 'विश्व में कहीं भी जो हिन्दू है, वह हिन्दुत्व का सांस्कृतिक राजदूत है' सुदर्शन जी की वाणी और व्यवहार में साकार रूप लिए हुए दिख रहा था।

अध्ययनशील एवं परिपूर्णतावादी 

सुदर्शन जी की एक प्रमुख विशेषता थी उनकी अध्ययनशीलता। साठ के दशक में जबलपुर में वाद-विवाद का एक बहुत बड़ा आयोजन हुआ था, जिसे लेकर सारे शहर में उत्सुकता का वातावरण बन गया था। और ऐसा क्यों न होता? क्योंकि जहाँ एक ओर सुदर्शन जी और महाकोशल प्रांत प्रचारक रामशंकर जी अग्निहोत्री थे, तो दूसरी ओर थे जबलपुर के कुछ वरिष्ठ साम्यवादी विचारक।

नित्य हमारी शाखा संघ कार्यालय के पास होने के कारण हममें से अनेक बाल स्वयंसेवक प्रायः वहाँ जाते थे। उस आयोजन के कई दिन पहले से हमने प्रतिदिन एक दृश्य देखा था कार्यालय के एक कमरे में ये दोनों दरी पर बैठे हुए हैं, आसपास पुस्तकें बिखरी हुई हैं और उनके पन्ने पलटते हुए वे कुछ लिख रहे हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि वाद-विवाद में दूसरे पक्ष की धज्जियाँ उड़ गईं।

कुछ-कुछ ऐसा ही अनुभव भोपाल के प्राध्यापक लक्ष्मणराव जोशी का है। भोपाल में आयोजित एक प्रांतीय बैठक में अखिल भारतीय अधिकारी के नाते सुदर्शन जी आए थे और उनका निवास जोशी जी के घर पर था। उन्होंने सोचा कि सुदर्शन जी से वार्तालाप करने का यह अच्छा अवसर है। परंतु ऐसा न के बराबर ही हो सका, क्योंकि जिस समय वे घर में होते, अध्ययन-लेखन में जुटे रहते थे। उनकी इसी अध्ययनशीलता के कारण वे सिख इतिहास, असम समस्या, इस्लाम, ईसाइयत, धर्म, विकास-पथ जैसे अनेक विषयों के ज्ञाता बने। 

सुदर्शन जी का पूर्णतावादी स्वभाव

सुदर्शन जी की एक और विशेषता थी उनका परिपूर्णतावादी होना। तृतीय वर्ष में जब मेरी ओर बौद्धिक विभाग का दायित्व था, तब वर्ग में उनका आगमन हुआ। उनके कार्यक्रम हेतु मैं उनके पास गया और रुका। तब उन्होंने मेरा अभिप्राय समझकर कहा कि मेरा बौद्धिक हो जाने दो, फिर आराम से बैठकर बातें करेंगे। आगे दो दिनों तक उन्हें बौद्धिक की तैयारी (विभिन्न पुस्तकों में से बौद्धिक के लिए बिंदु और टिप्पणियाँ निकालना, उनका पुनर्लेखन करना इत्यादि) करते हुए ही देखा। उनका कहना था कि बौद्धिक के विषय को पूरी तैयारी के साथ और सर्वोत्तम रीति से प्रस्तुत करना चाहिए।

परिपूर्णता के प्रति उनके आग्रह का एक प्रत्यक्ष अनुभव। एक बार एक अंग्रेजी शब्द के लिए सटीक हिन्दी प्रतिशब्द नहीं मिल रहा था। सुदर्शन जी के पास गया। उन्होंने दो-तीन मोटे-मोटे शब्दकोशों में खोजा, परंतु समाधानकारक शब्द नहीं मिल रहा था। अधिक समय लगता देख उनसे कहा कि निकटतम सही प्रतिशब्द से काम हो जाएगा। परंतु वे नहीं माने। फिर मुझे किसी कार्यवश जाना है, यह देखकर बोले ठीक है, तुम हो आओ, बाद में देखेंगे।

मैंने सोचा कि विषय समाप्त हो गया। परंतु दोपहर लगभग ढाई बजे उनका बुलावा आया। उनके पास गया तो वे प्रसन्न मुद्रा में थे। मुझे देखते ही बोले मिल गया तुम्हारा शब्द। फिर एक नया शब्दकोश खोलकर वह शब्द दिखाया और समझाया। भोजन के बाद विश्राम न करते हुए वे मेरे लिए एक शब्द खोज रहे थे, यह देखकर मैं अपना अपराधबोध प्रकट करने लगा तो वे बोले अरे, कोई बात नहीं। तुम्हारा शब्द तो मिल गया न!

संघ की अखिल भारतीय बैठक में एक प्रस्ताव का प्रारूप हर बार की तरह उनके पास भेजा गया। रात को लगभग दस बजे उन्होंने प्रस्ताव टोली को बुलाया और कहा कि अंग्रेजी प्रारूप ठीक नहीं है। फिर वे एक-एक वाक्य ठीक करने लगे। इसमें तो बहुत समय लगने वाला था। अतः प.पू. सरसंघचालक जी को अधिक देर तक जागना न पड़े, इस विचार से उनसे कहा गया कि आप कृपया त्रुटियाँ बता दीजिए, सुधारित प्रस्ताव प्रारूप कल प्रातः आपको दिखा दिया जाएगा।

परंतु वे बोले कि अभी ठीक हो जाएगा और एक-एक वाक्य में सुधार करते रहे। संपूर्ण प्रस्ताव ठीक हुआ तब तक रात के बारह बज चुके थे। शाखा में होने वाले कार्यक्रमों की ओर वे बारीकी से ध्यान देते थे और प्रार्थना, उच्चारण, आज्ञाएँ, आचार-पद्धति, शारीरिक-बौद्धिक कार्यक्रम इत्यादि में होने वाली त्रुटियों को दूर करने का प्रयास करते थे। ऐसा करने का कारण स्पष्ट है। ‘चलता है’ ऐसा कहने का स्वभाव ही नहीं था उनका। वे परिपूर्णतावादी थे और चाहते थे कि अन्य लोग भी वैसे ही बनें।

 अपने वरिष्ठों के प्रति आदर का भाव

सरसंघचालक बनने के बाद जब वे पहली बार भोपाल आए, तब उन्होंने आग्रहपूर्वक उस प्रवास में निजी भेंट का कार्यक्रम रखवाया। वह था श्री ओमप्रकाश कुन्द्रा और श्री अयोध्या प्रसाद गुप्ता के घर जाना। कारण यह था कि जब सुदर्शन जी जबलपुर से प्रचारक के रूप में निकले, तब कुन्द्रा जी वहाँ के प्रचारक थे और गुप्ता जी वहाँ के एक प्रमुख कार्यकर्ता। अतः उन दोनों के घर जाकर सुदर्शन जी ने उन्हें शाल-श्रीफल प्रदान कर प्रणाम किया और उनका आशीर्वाद लिया।

सहज-सरल शिशुहृदय

सुदर्शन जी बहुत बड़े अधिकारी और उच्च कोटि के विद्वान होते हुए भी व्यवहार में अत्यंत सहज व सरल थे। शिशुहृदय था उनका! केन्या प्रवास में जिस ‘लोलवा’ सरोवर का उल्लेख है, उसमें उनके नौकाविहार का कार्यक्रम था। आधे घंटे से अधिक समय के उस नौकाविहार में सुदर्शन जी किसी शिशु की भाँति अपना आनंद प्रकट कर रहे थे। लग ही नहीं रहा था कि यही व्यक्ति संघ जैसे विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन का प्रमुख भी है।

किसुमु नगर से कुछ ही दूरी पर भूमध्य रेखा है, यह ज्ञात होने पर उन्होंने वहाँ जाने की इच्छा प्रकट की। वहाँ के कार्यकर्ता भी उन्हें वहाँ ले जाना चाहते थे, परंतु यह सोचकर बोले नहीं कि मालूम नहीं सुदर्शन जी को अच्छा लगेगा या नहीं। परंतु जब उन्होंने ही इच्छा प्रकट की तो तुरंत वैसा कार्यक्रम बना।

उस स्थान पर जाने के बाद सुदर्शन जी का उत्साह देखते ही बनता था। भूमध्य रेखा को पार करते हुए वे कह रहे थे कि देखो, मैं एक ही पग में एक गोलार्ध से दूसरे गोलार्ध में जा रहा हूँ। लगता है कि मेरा पग वामन का पग बन गया है। मध्य भारत में प्रवास के समय एक कार्यकर्ता के घर उनका भोजन निर्धारित था। संघ के किसी बड़े अधिकारी द्वारा उनके घर भोजन करने का यह प्रथम ही अवसर था। अतः परिवार के सदस्यों के चेहरों पर आदर और धन्यता के भाव के साथ ‘हमसे कहीं कोई चूक न हो जाए’ ऐसे विचार वाला तनाव भी दिख रहा था।

भोजन के बाद कटे हुए आम प्रस्तुत किए गए। सुदर्शन जी ने पूछा कि बिना कटे आम हैं क्या? आम का असली आनंद तो चूसकर खाने में है। तुरंत वैसे आम लाए गए और सुदर्शन जी उन्हें आनंदपूर्वक चूसकर खाने लगे। देखते ही देखते परिवार के सदस्यों के चेहरों का तनाव चला गया और सभी लोग आम के साथ सुदर्शन जी की मधुर बातों का भी रसास्वादन करने लगे। सन् 2011 में मैसूर में उनके खो जाने की घटना के बाद ‘समिधा’ में उस विषय की चर्चा निकलने पर वे हँसते हुए कहते थे कि बिना कुछ किए हमें कितनी प्रसिद्धि मिल गई।

महाविद्यालयीन स्मृतियाँ

अवसर हो, सुदर्शन जी व्यस्त न हों (ऐसे कम ही आते थे) और प्रसन्नचित्त हों, तब उनसे सब प्रकार की बातें हो सकती थीं। इसी तरह के एक अवसर पर मैंने उनसे कहा कि जबलपुर अभियांत्रिकी महाविद्यालय के दूरसंचार विभाग में 1953 की जो तस्वीर लगी है, उसमें उनकी संघ की नेकर और पट्टा स्पष्ट रूप से दिख रहा है। इस पर वे बोले कि मैं महाविद्यालय में एक दिन भी फुलपैंट पहनकर नहीं गया। नेकर या पायजामा पहनकर ही जाता था।

फिर मैंने कहा कि वहाँ 1953 के बैच से संबंधित चित्र लगे हुए हैं। इस पर वे बोले कि पता नहीं मेरे परिचय में ‘प्रथम श्रेणी स्वर्णपदक विजेता’ ऐसा क्यों कहा जाता है। मैं तो तीसरे स्थान पर था और स्वर्णपदक विजेता नहीं हूँ।  उनके महाविद्यालयीन जीवन के बारे में जानने का यह अच्छा अवसर है, ऐसा देखकर तथा किसी भी ज्ञान के व्यावहारिक उपयोग में उनकी रुचि को देखते हुए मैंने उनसे पूछा कि आपके समय में प्रायोगिक प्रशिक्षण (Practical Training) हुआ करता था क्या?

वे बोले, “हाँ, होता था। मैं उसके अंतर्गत मुंबई गया था। प्रशिक्षण आज के जैसा ही होता था। खाली समय बहुत मिलता था। मैं जहाँ रहता था, वहाँ की सायं शाखा में जाता था। संघस्थान लगभग कचरे के मैदान जैसा था और शाखा में कम संख्या रहती थी। फिर मैंने शाखा के समय से पहले जाकर संघस्थान की सफाई और पानी का छिड़काव करना प्रारंभ कर दिया। अब शाखा में अधिक आनंद आने लगा और उसकी संख्या बढ़ने लगी।”

वे सरसंघचालक बनने के बाद भोपाल में एक बार जबलपुर अभियांत्रिकी महाविद्यालय के पूर्व छात्रों के संघ ने उनका सत्कार करने के लिए एक कार्यक्रम आयोजित किया था, क्योंकि सुदर्शन जी भी वहाँ के पूर्व छात्र थे। उसमें 15 मिनट के अपने संक्षिप्त उद्बोधन में (चूँकि अन्य भी अनेक लोग उनसे पहले बोल चुके थे) उन्होंने अपने छात्र जीवन की कुछ स्मृतियाँ बताईं और देश के विकास में अभियंताओं की क्या भूमिका हो सकती है, इस पर अपने विचार रखे।

सब लोग उससे अत्यंत प्रभावित हुए। मेरे कुछ परिचितों ने तो बाद में यहाँ तक कहा कि उन्हें लग रहा था कि संघ के सरसंघचालक को पूर्व छात्र संघ के कार्यक्रम में बुलाया जाना ठीक था या नहीं। परंतु उनका उद्बोधन सुनने के बाद अब लग रहा है कि उन्हें बुलाना बहुत ही अच्छा रहा। उनके भाषण में हमें सोचने और करने के लिए बहुत कुछ मिला।

आदर्श स्वयंसेवक का अनुपम उदाहरण

सरसंघचालक के इस सर्वोच्च दायित्व से स्वयं होकर निवृत्ति लेने के बाद सुदर्शन जी ने आदर्श स्वयंसेवक का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। आवश्यकता और अखिल भारतीय/प्रांतीय योजना के अनुसार प्रवास करना (संयोग ऐसा है कि उनके जीवन का अंतिम संघ-प्रवास, जहाँ से उन्होंने अपनी इस जीवनयात्रा का प्रारंभ किया, उसी रायपुर में 14.09.2012 को संपन्न हुआ और दूसरे ही दिन प्रातः वे इस जीवन के अंतिम प्रवास के रूप में बैकुण्ठधाम की ओर चल दिए), भोपाल में हों तब महानगर की योजना के अनुसार विभिन्न शाखाओं में जाना (अधिकतर विद्यार्थी शाखा), किसी अन्य शाखा में जाना निर्धारित न हुआ हो तो कार्यालय के पास लगने वाली सायंकालीन विद्यार्थी शाखा में जाना (इसे वे ‘मेरी शाखा’ कहते थे) और शाखा के बाद स्वयंसेवकों के घरों में संपर्क करना, भोपाल के अन्यान्य लोगों से मिलना (कभी उनके घर जाकर और कभी उन्हें कार्यालय में बुलाकर), कार्यालय में रहने वाले बड़े-छोटे सभी से बात करना, अध्ययन-लेखन करना, दूरदर्शन के सुरुचिपूर्ण कार्यक्रमों को उनमें रस लेते हुए देखना व उन पर चर्चा करना इत्यादि बातों में वे व्यस्त रहते थे।

निजी स्वास्थ्य संबंधी बातों को उन्होंने कभी शिकायत के रूप में नहीं रखा। हाँ, कभी-कभी वे उन्हें विनोद के रूप में अवश्य रखते थे। कुल मिलाकर वे जहाँ भी होते, वहाँ उनके कारण आनंद और उत्साह का वातावरण बना रहता था और सीखने वालों को उनसे बहुत सी बातें सीखने को मिलती थीं। परम पूज्य सुदर्शन जी जैसे महापुरुष द्वारा कही गई और की हुई बातों को अपने जीवन में लाते रहने का प्रामाणिक प्रयत्न करते रहने में ही उनके पुण्यस्मरण की सार्थकता है।

प्रो. सदानन्द दामोदर सप्रे, सह संयोजक, विश्व विभाग एवं अ. भा. स्तरीय संयोजक, प्रज्ञा प्रवाह हैं, निवृत प्राध्यापक, एनआईटी भोपाल हैं।

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