लाहौर के पुराने मोहल्लों की वापसी

लाहौर के पुराने मोहल्लों के नामों की वापसी : विरासत संरक्षण और पर्यटन अर्थव्यवस्था की नई उम्मीद

प्रो. लवकुश मिश्र

By : स्वदेश डेस्क
लाहौर के पुराने मोहल्लों के नामों की वापसी : विरासत संरक्षण और पर्यटन अर्थव्यवस्था की नई उम्मीद

हाल के दिनों में पाकिस्तान के ऐतिहासिक शहर लाहौर में पुराने मोहल्लों और गलियों के पारंपरिक नामों को पुनः बहाल करने की पहल मजबूरी में ही सही एक सराहनीय कदम है। मजबूरी इसलिए कहना पड़ रहा है कि आज पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गयी है । देश की अर्न्तराष्ट्रीय छवि आतंकवादी देश की बनने के कारण अंतरास्ट्रीय मुद्रा कोष से काली सूची में डालने का खतरा मडरा रहा है । इसलिए एक उदार देश दिखने की चाहत ने उसे यह कदम उठाने के लिए मजबूर भी किया होगा। यह केवल नाम परिवर्तन का मामला नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक विरासत ऐतिहासिक पहचान और पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने वाला कदम है। दक्षिण एशिया के इतिहास में लाहौर सदियों तक संस्कृति, साहित्य, कला और व्यापार का प्रमुख केंद्र रहा है। ऐसे में पुराने नामों की वापसी उस साझा सभ्यता की स्मृतियों को पुनर्जीवित करती है, जिसने इस क्षेत्र की पहचान गढ़ी।

पाकिस्तान की पंजाब सरकार लाहौर की बंटवारे से पहले की विरासत को लाने का प्रयास कर रही है, जो दशकों के दौरान धीरे-धीरे मिट गई थी। नाम बदलने का यह कदम पंजाब की मरियम नवाज सरकार की उसी कोशिश का हिस्सा है। पाकिस्तान की पंजाब सरकार ने लाहौर की कई सड़कों और गलियों के आजादी से पहले के नाम को बहाल करने की योजना को मंजूरी दे दी है।

भगवान् राम के पुत्र लव द्वारा बसाई गयी यह नगरी भारत के विभाजन से पहले बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक जीवन का जीवंत उदाहरण थी । शहर के अनेक मोहल्लों, बाजारों और चौकों के नाम स्थानीय परंपराओं, समुदायों और ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़े हुए थे। समय के साथ कई नाम धार्मिक कट्टरता के कारण बदल दिए गए, जिससे शहर की ऐतिहासिक आत्मा धीरे-धीरे धुंधली पड़ती गई। अब जब इन नामों को पुनः स्थापित करने की चर्चा हो रही है तो इसे इतिहास के सम्मान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के रूप में देखा जाना चाहिए।

किसी भी शहर की पहचान केवल उसकी इमारतों से नहीं, बल्कि उसकी स्मृतियों और प्रतीकों से बनती है। मोहल्लों और गलियों के नाम उस शहर की सामाजिक और सांस्कृतिक यात्रा के जीवित दस्तावेज होते हैं। लाहौर में पुराने नामों की बहाली नई पीढ़ी को यह समझने का अवसर देगी कि यह शहर केवल वर्तमान राजनीतिक सीमाओं तक सीमित नहीं, बल्कि साझा विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।

यह पहल पर्यटन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। आज विश्वभर में विरासत पर्यटन तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। पर्यटक उन शहरों की ओर अधिक आकर्षित होते हैं जहाँ इतिहास और संस्कृति अपने मूल स्वरूप में दिखाई देते हैं। भगवन राम के पुत्र लव के द्वारा बसाई गयी नगरी लाहौर पहले ही बादशाही मस्जिद , लाहौर किला और शालीमार बाग जैसे विश्वप्रसिद्ध धरोहर स्थलों के कारण अंतरराष्ट्रीय पहचान रखता है। यदि पुराने मोहल्लों की ऐतिहासिक पहचान भी पुनर्जीवित होती है, तो शहर का सांस्कृतिक आकर्षण और अधिक बढ़ सकता है।

विरासत आधारित पर्यटन स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देता है। पर्यटकों की बढ़ती संख्या से होटल, रेस्तरां, हस्तशिल्प, परिवहन और स्थानीय बाजारों में आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ती हैं। पुराने बाजारों और ऐतिहासिक गलियों को नए पर्यटन मार्गों से जोड़कर रोजगार और स्वरोजगार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं। इससे स्थानीय समुदायों को प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ मिलेगा।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे कदम दक्षिण एशिया की साझा सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने का संदेश देते हैं। इतिहास को मिटाने के बजाय उसे सम्मान देना किसी भी समाज की परिपक्वता का प्रतीक होता है। लाहौर में पुराने नामों की वापसी केवल अतीत को याद करने का प्रयास नहीं, बल्कि भविष्य की सांस्कृतिक और आर्थिक संभावनाओं को मजबूत करने की दिशा में एक सकारात्मक पहल है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि दक्षिण एशिया के ऐतिहासिक शहर अपनी सांस्कृतिक जड़ों को पहचानें और उन्हें संरक्षित करें। विरासत संरक्षण और पर्यटन विकास साथ-साथ चल सकते हैं। पिछले वर्षो में हमने देखा कि अबुधाबी जैसे इस्लामिक देश में हिन्दू मंदिर का बनाना एक ऐतिहासिक घटना थी जो निसंदेह उस देश को आर्थिक समृद्धि बढ़ाने में सहायक होगा। पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान को भी चाहिए कि वे धार्मिक कट्टरता को त्याग कर पूर्वजो कि धरोहरों को पुनर्स्थापित करते हुए अपने देश का आर्थिक विकास करे। लाहौर की यह पहल इसी सोच का उदाहरण बन सकती है जहाँ इतिहास केवल किताबों में नहीं, बल्कि शहर की गलियों और मोहल्लों में भी जीवित दिखाई दे।

लेखक प्रो. लवकुश मिश्र अंतर्राष्ट्रीय शिक्षाविद है व डॉ भीम राव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा में पर्यटन के वरिष्ठ प्रोफेसर है

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