इस सप्ताह चुनावी जीत और राजनीतिक गतिरोध एक ऐसी दुनिया को उजागर करते हैं, जिसमें घरेलू ध्रुवीकरण तेजी से अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को आकार दे रहा है। ब्राजील में लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा की राष्ट्रपति पद पर वापसी व्यक्तिगत राजनीतिक पुनरागमन के साथ-साथ लैटिन अमेरिका में दक्षिणपंथ के प्रति व्यापक वैचारिक संतुलन का प्रतिनिधित्व करती है। इजराइल में अरब-नेतृत्व वाली पार्टियां हाशिये के खिलाड़ियों से संभावित किंगमेकर के रूप में उभरी हैं, जो लोकतंत्र, पहचान और क्षेत्रीय कूटनीति के बीच अनसुलझे संबंधों को उजागर करता है। ये घटनाक्रम दर्शाते हैं कि राष्ट्रीय चुनाव अपनी सीमाओं से आगे तक प्रभाव डालते हुए गठबंधनों, व्यापार, सुरक्षा और प्रतिस्पर्धी राजनीतिक मॉडलों की वैधता को प्रभावित कर सकते हैं।
लूला की जीत और ब्राजील के लिए इसका अर्थ
लूला की जीत केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि उन्होंने एक और कार्यकाल हासिल किया, बल्कि इसलिए भी कि उन्होंने यह कैसे हासिल किया। पहले दौर में पीछे रहने के बाद उनके अभियान ने श्रमिकों, पर्यावरण आंदोलनों और राजनीतिक केंद्र के कुछ हिस्सों को जोड़कर एक व्यापक गठबंधन बनाया। हालांकि, घरेलू स्तर पर उनका जनादेश सीमित है। ब्राजील की कांग्रेस में दक्षिणपंथी झुकाव वाली ताकतों का प्रभुत्व बना हुआ है। ऐसे में सरकार को राजकोषीय नीति, सार्वजनिक व्यय, पर्यावरणीय विनियमन और संस्थागत सुधारों पर सावधानीपूर्वक बातचीत करनी होगी। यह विभाजित राजनीतिक परिदृश्य महत्वाकांक्षी सामाजिक कार्यक्रमों को सीमित कर सकता है, लेकिन शासन की व्यावहारिक शैली को मजबूत भी कर सकता है। लूला के सामने चुनौती सत्ता में लाने वाले गठबंधन को बनाए रखने और उन संस्थागत टकरावों से बचने की है, जिन्होंने पिछली सरकारों को कमजोर किया था।
लैटिन अमेरिका में क्षेत्रीय परिणाम
लैटिन अमेरिका में लूला की जीत राष्ट्रवादी सरकारों की ओर बढ़ते क्षेत्रीय रुझान को बाधित करती है। इस क्षेत्र के सबसे बड़े देश और अर्थव्यवस्था होने के कारण ब्राजील की राजनीतिक दिशा का प्रतीकात्मक और वास्तविक, दोनों तरह का महत्व है। लूला सरकार क्षेत्रीय एकीकरण, जलवायु परिवर्तन पर समन्वित प्रयासों और दक्षिण-दक्षिण सहयोग की संभावनाओं को मजबूत करती है।
यह जीत अमेरिका के उन प्रयासों को भी जटिल बनाती है, विशेषकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में, जिनके माध्यम से टैरिफ, प्रतिबंधों और राजनीतिक दबाव के जरिए पश्चिमी गोलार्ध पर प्रभुत्व फिर से स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। लूला के नेतृत्व में ब्राजील रणनीतिक स्वायत्तता, बहुपक्षवाद और दबावपूर्ण कूटनीति के प्रतिरोध पर जोर दे सकता है। इसका अर्थ वाशिंगटन से टकराव होना जरूरी नहीं है, बल्कि यह अधिक सक्रिय ब्राजीलियाई विदेश नीति का संकेत है, जो चीन, भारत, यूरोप, अफ्रीका और ग्लोबल साउथ के अन्य देशों के साथ साझेदारी चाहती है।
लूला, भारत और वैश्विक राजनीति
लूला का वैश्विक प्रभाव उनकी राजनीतिक और आर्थिक विश्वसनीयता पर निर्भर करेगा। निवेशक और अंतरराष्ट्रीय संस्थान यह देखेंगे कि उनका प्रशासन सामाजिक निवेश तथा राजकोषीय अनुशासन के बीच संतुलन बना पाता है या नहीं। यदि ब्राजील विकास, असमानता में कमी और पर्यावरण संरक्षण को जोड़ने में सफल होता है, तो वह निवेशकों के लिए आकर्षक अवसर प्रस्तुत कर सकता है।
लैटिन अमेरिका के प्रमुख देश के रूप में ब्राजील वैश्विक संस्थागत सुधारों और ग्लोबल साउथ के देशों के लिए नेतृत्वकारी भूमिका की भारत की मांग को भी मुखरता से दोहराता है। उल्लेखनीय है कि वामपंथी नेता होने के बावजूद लूला ने वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ भारत के संघर्ष तथा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ग्लोबल साउथ के देशों के लिए स्थायी सीटों की मांग सहित संस्थागत सुधारों का लगातार समर्थन किया है।
इजराइल की त्रिशंकु संसद
इस सप्ताह इजराइल के चुनाव में त्रिशंकु संसद की स्थिति उभरी है, जिसमें कोई भी गुट सरकार बनाने के लिए आवश्यक 61 सीटों का आंकड़ा हासिल नहीं कर सका। यह परिणाम इजराइली समाज के गहरे विभाजन को दर्शाता है। धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष समुदायों, मौजूदा नेतृत्व के समर्थकों और आलोचकों तथा सुरक्षा, न्यायिक सुधार और फिलिस्तीनियों के साथ संबंधों को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोणों के बीच मतभेद स्पष्ट हैं। त्रिशंकु नेसेट न केवल सरकारी अस्थिरता पैदा करती है, बल्कि विचारधारा और पहचान से विभाजित समाज में टिकाऊ शासक गठबंधन बनाने की कठिनाई को भी उजागर करती है।
इजराइल में अरब दलों की भूमिका
इजराइली नेसेट में 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की आवश्यकता होती है। नेतन्याहू के गुट ने 63 सीटें हासिल की हैं, जबकि उनके विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें मिली हैं। अरब पार्टियों ने 19 सीटें हासिल की हैं। ऐसे में सरकार गठन की सौदेबाजी में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। कोई भी बड़ा गुट अकेले शासन करने में सक्षम नहीं होने के कारण अरब पार्टियां गठबंधन गठन को प्रभावित कर सकती हैं, भले ही वे औपचारिक रूप से सरकार में शामिल न हों। उनकी संभावित भूमिका उस राजनीतिक वास्तविकता को चुनौती देती है, जिसमें इजराइल के अरब नागरिकों को संसदीय प्रतिनिधित्व के बावजूद अक्सर शासक गठबंधनों से बाहर रखा गया है।किसी गुट को समर्थन देने की उनकी इच्छा इस बात पर निर्भर करेगी कि वह प्रतीकात्मक समावेशन से आगे बढ़कर इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान जैसी सार्थक नीतिगत प्रतिबद्धताएं प्रस्तुत करता है या नहीं।
लूला की जीत और इजराइल का संसदीय गतिरोध दो अलग-अलग लोकतांत्रिक परिदृश्य सामने रखते हैं। ब्राजील दर्शाता है कि चुनावी गठबंधन राजनीतिक समीकरणों को बदलकर अंतरराष्ट्रीय एजेंडे को नई दिशा दे सकते हैं। इजराइल दिखाता है कि खंडित लोकतंत्र अल्पसंख्यकों और छोटी पार्टियों को सशक्त बना सकते हैं, लेकिन सहमति के अभाव में दीर्घकालिक अस्थिरता का जोखिम भी पैदा कर सकते हैं।
दोनों मामले समकालीन राजनीति के एक केंद्रीय सत्य को रेखांकित करते हैं कि घरेलू वैधता और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव अविभाज्य हैं। वैश्विक बहसों को आकार देने की ब्राजील की क्षमता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह घरेलू स्तर पर प्रभावी शासन कर पाता है या नहीं। वहीं, इजराइल के क्षेत्रीय संबंध इस बात से प्रभावित होंगे कि उसकी राजनीतिक व्यवस्था प्रतिनिधित्व को समावेशी और शांतिपूर्ण नीतियों में बदल पाती है या नहीं। ध्रुवीकृत मतदाताओं और विवादित वैश्विक व्यवस्था के इस दौर में चुनाव केवल राष्ट्रीय घटनाएं नहीं हैं, बल्कि ऐसे अवसर हैं, जिनके माध्यम से राष्ट्र दुनिया में अपनी भूमिका को फिर से परिभाषित करते हैं।

प्रो. अंशु जोशी
(लेखिका जेएनयू में प्राध्यापक हैं।)