Iran Attack and OIC Silence Explained

मुस्लिम देश बनाम अमेरिका:ईरान पर अमेरिका का हमला व ओआईसी की चुप्पी

ईरान पर अमेरिकी हमले के बाद ओआईसी की चुप्पी क्यों है। मुस्लिम देशों के आंतरिक मतभेद, अमेरिका से रिश्ते और संगठन की सीमाएं इस खामोशी को कैसे समझाती हैं।

By : स्वदेश डेस्क
मुस्लिम देश बनाम अमेरिका:ईरान पर अमेरिका का हमला व ओआईसी की चुप्पी

विवेक शुक्ला

मुंबई के मोहम्मद अली रोड पर रमजान की रौनक अपने चरम पर थी। मीनारा मस्जिद के आसपास की गलियों में खरीददारों की भीड़ उमड़ रहीं थी। इसी हलचल के बीच एक होटल में बैठे कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवी, पत्रकार और कारोबारी गहरी चिंता के साथ मुस्लिम देशों के संगठन, ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक को-ऑपरेशन (ओआईसी), की निष्क्रियता पर चर्चा कर रहे थे। उनका सवाल सीधा था-अमेरिका द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद भी ओआईसी की आवाज इतनी धीमी क्यों है? 57 मुस्लिम देशों का प्रतिनिधित्व करने वाला यह संगठन अक्सर फिलिस्तीन जैसे मुरों पर मुखर रहता है, प्रस्ताव पसारित करता है और कड़े बयान जारी करता है। लेकिन जब मामला ईरान जैसा प्रभावशाली और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में अहम देश हो, तब उसकी प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत नरम क्यों दिखाई देती है? यह प्रश्न केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि राजनीतिक और कूटनीतिक जटिलताओं से जुड़ा है। 

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कोई नया अध्याय नहीं है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से दोनों देशों के संबंधों में अविश्वास और टकराव बना हुआ है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम, उस पर लगाए गए प्रतिबंधों और पश्चिम एशिया में उसकी चढ़ती भूमिका ने इस तनाव को और गहरा किया है। जब भी हालात बिगड़ते हैं, पूरी दुनिया की निगाहें इस क्षेत्र पर टिक जाती हैं। ऐसे समय में उम्मीद की जाती है कि इस्लामिक देश एकजुट होकर शांति, संवाद और न्याय की वकालत करेंगे। पर व्यवहार में तस्वीर अधिक जटिल दिखती है। ओआईसी का गठन मुस्लिम देशी के बीच सहायोग, एकता और साइरु हितों की रक्षा के उद्देश्य से हुआ था। सिद्धांततः यदि किसी सदस्य देश पर संकट आए, तो चाकी देश उसका समर्थन करें और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी आवाज बनें। लेकिन व्यावहारिक राजनीति में यह संगठन अवसर औपचारिक बयानों तक सीमित रह जाता है। ईरान के मामले में भी कई देशों ने सावधानी भरे बक्तव्य दिए, कुछ ने चुप्पी साध ली, और कुछ ने अप्रत्यक्ष रूप से अमरीकी रुख के प्रति सहमति जताई।

इस विभाजन के पीछे सबसे बड़ी वजह मुस्लिम दुनिया के भीतर मौजूद वैचारिक और रणनीतिक मतभेद हैं। पश्चिम एशिया में ईरान और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से प्रभाष की प्रतिस्पर्धा रही है। एक और शिया नेतृत्व चाला ईरान है, तो दूसरी ओर सुन्नी बहुत खाड़ी देश। यह प्रतिस्पर्धा केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं, बल्कि क्षेत्रीय प्रभुत्व, सुरक्षा और राजनीतिक प्रभाव से भी जुड़ी है। परिणामस्वरूप, किसी भी सामूहिक मंच पर सर्वसम्मति बनाना कठिन हो जाता है।

दूसरा महत्वपूर्ण कारण कई मुस्लिम देशों के अमेरिका के साथ गहरे आर्थिक और सुरक्षा संबंध हैं। खाड़ी देशों की सुरक्षा संरचना काफी हद तक अमरीकी सैन्य सहयोग पर आधारित है। ऊर्जा व्यापार, हथियार सौदे और निवेश संबंध भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। ऐसे में वे खुलकर अमेरिका की आलोचना करने से बचते है। उनकी प्राथमिकता अपने राष्ट्रीय हितों और आंतरिक स्थिरता की रक्षा करना होती है।

इस यथार्थवादी दृष्टिकोण के कारण वे ईरान के समर्थन में आक्रामक रुख अपनाने से हिचकते हैं। इसके अलावा, कुछ अरब देशों का मानना है कि क्षेत्रीय तनाव के लिए ईरान की नीतियां भी जिम्मेदार रही है। समन, सीरिया और इराक में उसकी सक्रियता को लेकर कई देशों में असंतोष है। इसलिए वे इस टकराव को केवल 'मुस्लिम देश बनाम अमेरिका' के रूप में नहीं देखते, बल्कि इसे व्यापक भू-राजनीतिक संघर्ष के रूप में आंकते हैं। यहीं सोच ओजईसी के भीतर साझा बयानबाजी को सीमित कर देती है। ओआईसी की कार्यप्रणाली भी एक बाधा है। संगठन अक्सर सर्वसम्मति पर आधारित निर्णय प्रक्रिया अपनाता है। जब सदस्य देशी के हित, गठबंधन और प्राथमिकताएं अलग-अलग हों, तब कठोर और स्पष्ट निर्णय लेना कठिन हो जाता है। कई बार तीखे शब्दों वाले प्रस्ताव पारित तो हो जाते हैं, लेकिन उनके अनुपालन या ठोस कुटनीतिक कदमों का अभाव रहता है। इससे संगठन की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं। दूसरी ओर, आम मुस्लिम समाज की अपेक्षाएं अलग हैं। वे चाहते हैं कि इस्लामिक देश अन्याय या बाहरी हस्तक्षेप के खिलाफ एकजुट स्वा में बोले। सोशल मीडिया पर भी यह भावना दिखाई देती है कि कम से कम कूटनीतिक स्तर पर मजबूत और स्पष्ट रुख अपनाया जाना चाहिए था। लेकिन सरकारे भावनात्मक आवेगों की बजाय रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा गणनाओं के आधार पर निर्णय लेती है। इस स्थिति का व्यापक प्रभात भी है। 

यदि 57 देश सचमुच एक मंच पर संगठित होकर बोलें, तो अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उनका प्रभाव काफी बड़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर वे एक मजबूत दबाव समूह बन सकते हैं। पर आपसी अविश्वास और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा के कारण यह संभावना अक्सर साकार नहीं हो पातीं। यह भी सच है कि केवल धार्मिक या भावनात्मक एकता से जटिल अंतरराष्ट्रीय समस्याओं का समाधान नहीं होता। मुस्लिम देशों के बीच आर्थिक असमानताएं शासन प्रणालियों में अंतर, सुरक्षा चुनौतियां और बाहरी शक्तियों के साथ अलग-अलग रिश्ते हैं। जब तक इन अंतर्विरोधों को स्वीकार कर संवाद और सहयोग की दिशा में ठोस प्रयास नहीं होंगे, तब तक किसी भी बड़े संकट पर एकजुट प्रतिक्रिया की उम्मीद अधूरी ही सोगी। 

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने एक बार फिर इस्लामिक दुनिया की आंतरिक सीमाओं को उज्जवगर किया है। ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक को-ऑपरेशन के सामने चुनौती यही है कि वह केवल औपचारिक जक्तज्यों तक सीमित न रहे, बल्कि सदस्य देशों के बीच भरोसा, पारदर्शिता और साझा रणनीति विकसित करे। यदि इस्लामिक देश वैश्विक मंच पर प्रभावशाली भूमिका निभाना चाहते हैं, तो उन्हें अपने मतभेद कम कर व्यापक सामूहिक हितों की प्राथमिकता देनी होगी। अन्यथा हा बड़े संकट में उनकी बटी हुई प्रतिक्रिया निराशा को ही जन्म देती रहेगी।


 

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