भारत के पड़ोसी देश नेपाल में गुरुवार को आम चुनाव के बाद अब वहां संवैधानिक व्यवस्था बहाल होने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के पटरी पर लौटने की उम्मीद बनी है। हालांकि, यह अनिश्चितता बनी हुई है कि अगली सरकार का नेतृत्व कौन करेगा। इसके पीछे निश्चित तौर पर किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने की संभावना है। राजनीतिक विश्लेषक त्रिशंकु संसद और गठबंधन राजनीति की वापसी की भविष्यवाणी कर रहे हैं, जो हाल के वर्षों में नेपाली लोकतंत्र की पहचान रही है।सवाल है कि नेपाल में अगर खंडित जनादेश मिलता है तो सरकार गठन का नया फार्मूला क्या होगा? नेपाली पार्टियों को न केवल आम सहमति बनानी होगी, बल्कि उन्हें अपने भीतर के मतभेदों को भी सुलझाना होगा। नई सरकार के गठन के बाद नेपाल के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती वहां की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाना है।
जहां तक भारत के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो नेपाल की भारत पर आर्थिक निर्भरता काफी अधिक है, क्योंकि उसके दो-तिहाई से अधिक व्यापार दक्षिणी पड़ोसी देश के साथ होता है। दोनों देश लगभग 1,800 किलोमीटर लंबी खुली सीमा साझा करते हैं, जिसे दोनों देशों के नागरिक बिना वीजा या पासपोर्ट के पार कर सकते हैं। नई दिल्ली केवल एक विकास भागीदार नहीं है, इसने ऐतिहासिक रूप से नेपाल की राजनीतिक प्रक्रियाओं में भी काफी प्रभाव डाला है, चाहे वह 1950 का दशक हो, 1990 का दशक हो या नेपाल का राजतंत्र से गणतंत्र में परिवर्तन का दौर।हालांकि जनरेशन जेड के विरोध प्रदर्शनों के बाद से दिल्ली ने अपेक्षाकृत दूरी बनाए रखी है, लेकिन इसने लगातार लोकतंत्र की बहाली के लिए दबाव बनाया है। काठमांडू में बार-बार सरकार बदलने और लगभग हर नौ महीने में जाने-पहचाने चेहरों के सत्ता में आने से पिछले एक दशक में दिल्ली की नेपाल के साथ भागीदारी जटिल हो गई है।
विश्लेषकों का तर्क है कि इसलिए नेपाल में राजनीतिक स्थिरता की भारत की अपेक्षा स्वाभाविक है। श्रीलंका और बांग्लादेश में अस्थिरता की घटनाओं के बाद नेपाल में लोकतांत्रिक व्यवस्था का पतन भारत के लिए अस्वीकार्य है। तीव्र भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच क्षेत्रीय स्थिरता दिल्ली के व्यापक रणनीतिक हितों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, विशेष रूप से ऐसे समय में जब भारत वैश्विक दक्षिण की एक अग्रणी आवाज के रूप में खुद को स्थापित करना चाहता है।भारत का घोषित रुख हमेशा से ‘काठमांडू में मौजूदा सरकार के साथ मिलकर काम करने’ का रहा है। फिर भी यह बात किसी से छिपी नहीं है कि ओली की अति-राष्ट्रवादी बयानबाजी और चीन की ओर उनके झुकाव ने कई बार दिल्ली के साथ संबंधों में तनाव पैदा किया है। भारत की रणनीति काठमांडू में गैर-वामपंथी सरकार को स्थापित कराने पर होगी। ऐसी सरकार का नेतृत्व या तो नेपाली कांग्रेस कर सकती है, जिसके भारत के साथ ऐतिहासिक और संस्थागत संबंध हैं, या फिर राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी कर सकती है, जो इस चुनाव में अपेक्षाकृत नई राजनीतिक शक्ति बनकर उभरी है।
दिल्ली के साथ आरएसपी के संबंध अभी स्पष्ट नहीं हैं, और इसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बलेंद्र शाह के पिछले उत्तेजक रुख ने राजनयिक हलकों में चिंताएं बढ़ा दी हैं। इस बीच, नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष गगन थापा हालांकि लोकप्रिय हैं, लेकिन कार्यकारी स्तर पर उनका अभी तक परीक्षण नहीं हुआ है।हाल के वर्षों में चीन ने नेपाल में अपना प्रभाव लगातार बढ़ाया है। परंपरागत रूप से वह शांत कूटनीति को प्राथमिकता देता रहा है, लेकिन 2018 में श्री ओली के नेतृत्व में नेपाल की कम्युनिस्ट ताकतों के एकजुट होकर एक शक्तिशाली वामपंथी गठबंधन बनाने के बाद चीन की सक्रिय भागीदारी अधिक मुखर हो गई।गुरुवार को होने वाले मतदान के परिणाम से न केवल घरेलू सत्ता समीकरणों को आकार मिलने की उम्मीद है, बल्कि तेजी से ध्रुवीकृत क्षेत्रीय वातावरण में नेपाल के बाहरी संतुलन पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा। संयुक्त राज्य अमेरिका यह देखने के लिए उत्सुक है कि नेपाल चीन पर अपनी निर्भरता को किस हद तक कम कर सकता है।