टी-20 वर्ल्डकप: पाकिस्तान का धमकी ड्रामा फेल

आईसीसी टी-20 वर्ल्ड कप: धमकी से लेकर घुटने टेकने तक, पाक का ‘बंदर भभकी ड्रामा’

भारत-पाक मैच से पहले बहिष्कार की धमकी और फिर आईसीसी के आगे झुकना, टी-20 वर्ल्डकप में पाकिस्तान की रणनीति सवालों में

By : नरेंद्र कुमार
आईसीसी टी-20 वर्ल्ड कप: धमकी से लेकर घुटने टेकने तक, पाक का ‘बंदर भभकी ड्रामा’

विवेक शुक्ला

पाकिस्तान की औकात एक बार फिर दुनिया के सामने है। पाकिस्तान बीते कई दिनों से यह कह रहा था कि उसकी टीम भारत के खिलाफ आईसीसी टी-20 वर्ल्ड कप में 15 फरवरी को कोलंबो में होने वाले मैच का बहिष्कार करेगी। इसके बाद उसने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) के दबाव में घुटने टेक दिए। अब उसने साफ कर दिया है कि वह भारत के खिलाफ मैच खेलेगा।

पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) और उससे जुड़े हलकों ने इस पूरे मामले में जिस तरह शर्तों और दबाव की भाषा अपनाई, वह न सिर्फ खेल की मर्यादा के खिलाफ है, बल्कि अंततः उसकी विश्वसनीयता को भी कमजोर करती है। आईसीसी द्वारा पाकिस्तान की किसी भी शर्त को न मानना इस बात का संकेत है कि अंतरराष्ट्रीय खेल संस्थाएं अब ‘बंदर भभकी’ और राजनीतिक दबाव की रणनीति से प्रभावित नहीं होने वाली हैं।

पाकिस्तान लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में ‘विशेष रियायत’ की अपेक्षा करता रहा है कभी सुरक्षा का हवाला, कभी मेजबानी के अधिकार, तो कभी बहिष्कार की धमकी। इस बार भी कहानी अलग नहीं थी। भारत के साथ मुकाबले को लेकर पाकिस्तान ने परोक्ष रूप से यह संदेश देने की कोशिश की कि अगर उसकी शर्तें नहीं मानी गईं, तो वह टूर्नामेंट या मैच से हट सकता है। लेकिन यह धमकी पहले से ही खोखली थी।वैश्विक क्रिकेट जगत जानता है कि भारत-पाक मुकाबला आर्थिक, दर्शक संख्या और प्रसारण तीनों दृष्टियों से टूर्नामेंट की रीढ़ होता है। इससे पीछे हटना पाकिस्तान के लिए आत्मघाती कदम साबित होता।

आईसीसी का रुख इस बार स्पष्ट और स्वागत योग्य रहा। उसने न तो अतिरिक्त शर्तों को स्वीकार किया और न ही किसी तरह का दबाव झेला। संदेश साफ था क्रिकेट अंतरराष्ट्रीय नियमों और तय ढांचे के अनुसार चलेगा, न कि किसी एक देश की अस्थिर राजनीति या घरेलू दबावों के हिसाब से। कोलंबो जैसे तटस्थ स्थल पर मैच कराने का निर्णय पहले से निर्धारित व्यवस्थाओं के अनुरूप था और इसमें किसी तरह का पक्षपात नहीं था।इसके बावजूद पाकिस्तान का शोर-शराबा यह दर्शाता रहा कि वहां खेल प्रशासन अभी भी भावनात्मक प्रतिक्रिया और तात्कालिक राजनीति से बाहर नहीं निकल पाया है। यहां ‘बंदर भभकी’ शब्द इसलिए प्रासंगिक लगता है, क्योंकि बार-बार धमकी देना और अंत में उसी व्यवस्था के आगे झुक जाना यही इस पूरी कवायद का सार रहा। ऐसी बयानबाजी से न सम्मान मिलता है, न सहानुभूति। उलटे यह अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश की गंभीरता पर सवाल खड़े करती है।

खेल कूटनीति में दृढ़ता का अर्थ यह नहीं कि हर बात पर अल्टीमेटम दिया जाए। दृढ़ता का मतलब है नियमों के भीतर रहकर अपने हितों की रक्षा करना। भारत ने इस पूरे घटनाक्रम में अपेक्षाकृत संयम दिखाया। न उकसावे का जवाब दिया, न ही सार्वजनिक बयानबाजी में उलझा। यह परिपक्वता इस बात को रेखांकित करती है कि मजबूत पक्ष अक्सर शोर नहीं करता, वह व्यवस्था पर भरोसा करता है। आईसीसी का फैसला उसी भरोसे की पुष्टि है।इससे यह भी स्पष्ट हो गया कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट अब किसी एक बोर्ड की धमकियों से नहीं चलता, बल्कि सामूहिक नियमों और पारदर्शिता से संचालित होता है।पाकिस्तान को आत्ममंथन की जरूरत है। क्या बार-बार विवाद खड़ा कर वह सचमुच अपने खिलाड़ियों और प्रशंसकों का भला कर रहा है? क्या हर बड़े मंच पर नकारात्मक सुर्खियां बटोरना उसकी क्रिकेट विरासत के अनुरूप है? खेल का मैदान प्रतिस्पर्धा के लिए होता है, बयानबाजी और धमकियों के लिए नहीं।

अगर पाकिस्तान वास्तव में सम्मान और स्थिरता चाहता है, तो उसे अपनी रणनीति बदलनी होगी धमकी की जगह प्रदर्शन और राजनीति की जगह खेल भावना को प्राथमिकता देनी होगी। कोलंबो में होने वाला यह मैच खिलाड़ियों के लिए खुद को साबित करने का अवसर है। दर्शक क्रिकेट देखना चाहते हैं।आईसीसी ने स्पष्ट संदेश दिया है कि नियम सर्वोपरि हैं और कोई भी बोर्ड उनसे ऊपर नहीं। उम्मीद यही है कि पाकिस्तान इस अनुभव से सबक लेगा और भविष्य में ऐसी बंदर भभकियों से परहेज करेगा। आखिरकार, क्रिकेट की जीत इसी में है कि खेल बोला जाए, धमकियां नहीं। पाकिस्तान की रणनीति हर बार एक जैसी रहती है पहले धमकी, फिर माहौल गर्म, फिर पीड़ित बनने की कोशिश और अंत में जब कुछ हासिल नहीं होता तो चुपचाप उसी व्यवस्था के सामने सिर झुका देना, जिसे वह कोस रहा होता है। इस बार भी वही हुआ। भारत के साथ मैच को लेकर जिस तरह की बयानबाजी की गई, मानो पूरी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट उसकी मर्जी से चलेगी, वह न सिर्फ हास्यास्पद थी बल्कि उसकी वास्तविक स्थिति भी उजागर कर गई।

सबसे दुखद पहलू यह है कि इस पूरे प्रकरण में नुकसान पाकिस्तान के खिलाड़ियों और आम क्रिकेट प्रशंसकों का हुआ। उन्हें एक बार फिर अपने बोर्ड की नाकामी और गैर-जिम्मेदाराना रवैये का खामियाजा भुगतना पड़ा। क्रिकेटरों को मैदान पर अपनी मेहनत से पहचान बनानी चाहिए, न कि बोर्ड की बयानबाजी से।अगर पाकिस्तान वास्तव में क्रिकेट का भला चाहता है, तो उसे परिपक्व होना होगा। धमकियों से न सम्मान मिलता है, न सहानुभूति। सम्मान मिलता है प्रदर्शन, अनुशासन और नियमों के पालन से। बार-बार पीड़ित बनने की कोशिश अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर काम नहीं आने वाली।

पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड की हालत उस बच्चे जैसी हो चुकी है, जो हर बात पर जमीन पर लोटता है, लेकिन जब ध्यान नहीं मिलता तो खुद ही चुप हो जाता है। भारत के साथ मैच को लेकर की गई बयानबाजी किसी जिम्मेदार क्रिकेट बोर्ड की नहीं, बल्कि राजनीतिक एजेंडे से चलने वाली एक नाकाम संस्था की प्रतीक थी।आईसीसी ने इस पूरे तमाशे को जिस ठंडे दिमाग से निपटाया, वह काबिल-ए-तारीफ है। उसने साफ कर दिया कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट किसी की मर्जी से नहीं चलता। नियम पहले हैं, ड्रामा बाद में। कोलंबो में मैच कराने का फैसला पहले से तय और पूरी तरह तार्किक था। इसके बावजूद पाकिस्तान ने जिस तरह माहौल जहरीला करने की कोशिश की, उसने उसकी हतोत्साहित और असुरक्षित मानसिकता को उजागर कर दिया। क्रिकेट एक खेल है, दया की भीख नहीं। धमकियों से सम्मान नहीं मिलता। आईसीसी ने रीढ़ दिखाई है अब पाकिस्तान को या तो खेलना सीखना होगा, या चुप रहना।

 

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