पेरिस के बाहरी इलाकों से लेकर रोम की प्राचीन गलियों तक..! और अब बाल्कन देशों तक..! 2025-26 ने यूरोप को एक नई हकीकत से रू-ब-रू कर दिया है। हिंसा अब उसकी सीमाओं पर नहीं है। हिंसा अब उसकी अपनी सड़कों के भीतर रोज की सुर्खी बन चुकी है।दशकों तक यूरोप ने खुद को दुनिया के सामने एक 'हिंसा-मुक्त महाद्वीप' के तौर पर पेश किया है। जहां युद्ध इतिहास बन चुके हैं..! सड़कें सुरक्षित हैं..! और सामाजिक शांति एक स्थायी सच्चाई है..! पर यह तस्वीर अब दरक रही है।पेरिस के बाहरी इलाकों से लेकर रोम की प्राचीन गलियों तक..! और अब बाल्कन देशों तक..! 2025-26 ने यूरोप को एक नई हकीकत से रू-ब-रू कर दिया है। हिंसा अब उसकी सीमाओं पर नहीं है। हिंसा अब उसकी अपनी सड़कों के भीतर रोज की सुर्खी बन चुकी है।
फ्रांस में अब गुस्से का सैलाब उमड़ पड़ा है। गिरफ्तारियों का आंकड़ा हजार के पार पहुंच चुका है। फ्रांस इस बेचैनी का सबसे बड़ा उदाहरण है और इस साल का पैमाना अभूतपूर्व रहा। गृह मंत्रालय के अनुसार, 18 सितंबर को देश भर में हुए एक समन्वित आंदोलन में 40 हजार से ज्यादा लोग सड़कों पर उतरे। पेरिस, ल्यों, मार्सेल और नांत में भी प्रदर्शन हुए। महंगाई, पेंशन सुधार और सरकारी खर्च में कटौती के खिलाफ शुरू हुआ यह प्रदर्शन शाम होते-होते हिंसक झड़पों में बदल गया।
रात तक लगभग 1000 लोगों को गिरफ्तार किया गया..! 200 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए..! पेरिस के बास्तील इलाके में बैरिकेड्स जलाए गए। बस स्टॉप तोड़े गए और दंगा-रोधी पुलिस के साथ सीधी भिड़ंत हुई। सरकार ने इसे कानून-व्यवस्था का पतन कहा, वहीं ट्रेड यूनियनों ने इसे जनता की हताशा का विस्फोट बताया। यह फ्रांस की दोहरी हकीकत है। एक तरफ वेतन और महंगाई को लेकर जायज गुस्सा, दूसरी तरफ शहरों में संगठित नार्को-गैंग। मार्सेल और ग्रेनोबल में नशे के सौदागरों ने कई मोहल्लों को नो-गो जोन बना दिया है, जहां 25 साल से कम उम्र के लड़के असॉल्ट राइफल लेकर घूमते हैं।
उधर, इटली में तो खामोश बढ़त अब शोर बन रही है। इटली लंबे समय तक उत्तरी पड़ोसियों के मुकाबले सुरक्षित माना जाता रहा है, पर आंकड़े अब तेजी से बदल रहे हैं। उत्तर में पुलिसिंग का तरीका ही बदल गया है। मिलान में पुलिस ने निवारक उपाय के तौर पर कई नाबालिगों को हिरासत में लिया। एक ऐसा कदम, जिसने शहर को चौंका दिया। अधिकारियों के अनुसार, खुफिया जानकारी थी कि ये नाबालिग प्रदर्शन में चाकू, लोहे की रॉड और पेट्रोल बम ले जाने की योजना बना रहे थे। मानवाधिकार संगठनों ने इसे सख्ती बताया। दूसरी ओर, प्रशासन ने इसे हिंसा रोकने के लिए जरूरी बताया। यह दिखाता है कि विरोध की भीड़ अब कितनी युवा हो रही है। 15 से 17 साल के किशोर, जो टिकटॉक और टेलीग्राम पर लामबंद होते हैं।
आईएसटीएटी के अनुसार, मिलान, ट्यूरिन और नेपल्स में पिछले दो साल में गंभीर हमलों, लूट और यौन हिंसा में 8 से 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। दक्षिण में कैमोरा और 'नद्रंगेटा माफिया' अब ड्रग्स और निर्माण ठेकों के लिए ज्यादा खूनी जंग लड़ रहे हैं।दूसरी ओर, रोम में गुस्से के फव्वारे फूट पड़े हैं। रोम इस विरोधाभास का सबसे सजीव प्रतीक है। 2025 में दो करोड़ से अधिक पर्यटकों का स्वागत करने वाला यह शहर अब अपनी ही धरोहर को अपने ही गुस्से से बचाने में जूझ रहा है।
पिछले हफ्ते देशव्यापी अशांति के दौरान प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने कोलोसियम में जबरन घुसने की कोशिश की। बैरिकेड्स फांदे और मुख्य द्वार पर सुरक्षाबलों से भिड़ गए। यह घटना संक्षिप्त थी, पर प्रतीकात्मक..! प्राचीन मेहराबों के सामने काले हुड पहने युवाओं की पुलिस के साथ धक्का-मुक्की का वीडियो पूरे इटली में वायरल हो गया है। अधिकारियों के अनुसार, प्रदर्शनकारी इस स्मारक को अपनी दृश्यता के मंच के तौर पर इस्तेमाल करना चाहते थे। रोमवासियों के लिए यह एक लक्ष्मण रेखा थी। जब असहमति धरोहर को निशाना बनाए, तो वह सिर्फ विरोध नहीं रह जाता।टर्मिनी स्टेशन, ट्रास्टेवेरे और एस्क्विलिनो के आसपास जेबकतरी और लूटपाट अब आम हो चुकी हैं, जबकि बाहरी इलाकों टोर बेला मोनाका और सेंटोसेले में नशे के कारोबार और अवैध कब्जों को लेकर झड़पें रोजमर्रा की बात हैं।
उधर, बाल्कन की गूंज : अल्बानिया का क्या कहना..! अशांति सिर्फ पश्चिमी यूरोप तक सीमित नहीं है। तिराना, अल्बानिया में भ्रष्टाचार, न्यायिक देरी और महंगाई के खिलाफ हजारों लोग सड़कों पर उतरे। जब प्रदर्शनकारियों का एक हिस्सा सरकारी इमारतों की ओर बढ़ा, तो स्थिति बिगड़ गई। अल्बानिया की दंगा पुलिस ने प्रदर्शनकारियों की बड़ी भीड़ को हटाने के लिए स्केंडरबेग स्क्वायर में वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। दर्जनों लोग घायल हुए और यूरोपीय संघ में शामिल होने की आकांक्षा रखने वाली एक राजधानी में वाटर कैनन की तस्वीरों ने ब्रसेल्स में लोकतांत्रिक पुलिसिंग पर असहज सवाल खड़े कर दिए।
अब यूरोप का पैटर्न बदलने लगा है। पेरिस, मिलान, रोम और तिराना को जोड़ने वाले सिर्फ अपराध के आंकड़े नहीं हैं, बल्कि तीन गहरी धाराएं हैं। पहला, गुस्से का अर्थशास्त्र..! महंगाई भले थमी हो..! पर मकान और ऊर्जा की कीमतें आज भी युवा यूरोपीय की पहुंच से बाहर हैं। दूसरा, डिजिटल चिंगारी..! टेलीग्राम के ड्रग बाजार से लेकर स्नैपचैट पर दंगों के आह्वान तक, हिंसा पुलिस से तेज गति से लामबंद होती है। फ्रांसीसी खुफिया एजेंसियों के अनुसार, हाल के अधिकांश दंगे दो घंटे के भीतर ऑनलाइन संगठित हुए। तीसरा, दृश्यता का जाल..! प्रदर्शनकारी अब कैमरे चाहते हैं। कोलोसियम में घुसने की कोशिश हो या तिराना में वाटर कैनन का सामना, ये तस्वीरें वैश्विक कवरेज की गारंटी देती हैं।
यूरोप आज भी दुनिया के सबसे सुरक्षित महाद्वीपों में से एक है, पर वह कम अनुमान-योग्य होता जा रहा है। पुरानी हिंसा देशों के बीच थी। नई हिंसा सड़कों के भीतर है, एक राज्य और उसकी अपनी सड़कों के बीच। और पेरिस से लेकर रोम तक प्रयोग एक ही हो रहा है ज्यादा दिखावा नहीं, ज्यादा नजदीकी, ज्यादा कम्युनिटी पुलिसिंग और राष्ट्रीय बयानबाजी से ज्यादा स्थानीय संवाद।
अतः यूरोप को सख्ती से ज्यादा सहभागिता चाहिए। युवाओं के लिए सस्ते आवास चाहिए। रोजगार और कौशल विकास की योजनाएं चाहिए। कम्युनिटी पुलिसिंग चाहिए। नशा-गिरोहों पर डिजिटल निगरानी चाहिए। स्कूलों में मीडिया-साक्षरता चाहिए। और प्रदर्शन की स्वतंत्रता के साथ धरोहरों की सुरक्षा का संतुलन ही हिंसा का स्थायी समाधान है।

प्रो. डॉ. मनोज दयाल
(लेखक कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर के कुलगुरु हैं।)