राष्ट्रपति का पद किसी भी दल और विचारधारा से परे राष्ट्रीय अस्मिता, संवैधानिक गरिमा का द्योतक है.. क्योंकि राष्ट्रपति राष्ट्र के प्रथम नागरिक के रूप में भारतीय गणतंत्र की व्यस्तताओं एवं संवैधानिक सरोकारों का प्रतिनिधित्व करते हुए उसके संरक्षणकर्ता भी है... इसलिए राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होने तक किसी भी तरह के आरोप-प्रत्यारोप की तो गुंजाइश बनी रहती है.. लेकिन जब इस पद पर कोई आरूढ़ होता है तो वह भारत
का प्रथम नागरिक बनकर समग्र राष्ट्र के लिए सम्मानीय एवं गरिमामय संवैधानिक व्यवस्था के तहत निर्धारित प्रोटोकाल के संवैधानिक रूप से पात्र भी हो जाते है... ऐसे में राष्ट्रपति से जुड़े किसी भी तरह के प्रोटोकाल का पालन न करना भी राष्ट्रपति या राष्ट्रपति पद का खुला अपमान नहीं बल्कि राष्ट्र के प्रथम प्रतिनिधि के नाते राष्ट्र का भी अपमान है... उस समय यह विषय और गंभीर हो जाता है.. जब देश के जनजातीय वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाली मातृशक्ति के रूप में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का ममता बनर्जी सरकार संवैधानिक गरिमा को ठेस पहुंचाते हुए अपमान करने पर उतारू हो जाए... यही नहीं, ममता सरकार ने यह कृत्य एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश के तहत उस समय किया.. जब देश-विदेश में महिला दिवस के अवसर पर संपूर्ण मातृशक्ति के सम्मान में विभिन्न आयोजनों का सिलसिला चल रहा था...
ऐसे में अगर पश्चिम बंगाल से महिला दिवस पर राष्ट्र की सर्वेसर्वा मातृशक्ति की पद-गरिमा के विपरीत व्यवस्था भंग की जाए और उसके बचाव में महिला होने के बावजूद ममता बनर्जी सरकार संवैधानिक गरिमा को ठेस पहुंचाते हुए अपमान करने पर उतारू हो जाए... यही नहीं, ममता सरकार ने यह कृत्य एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश के तहत उस समय किया.. जब देश-विदेश में महिला दिवस के अवसर पर संपूर्ण मातृशक्ति के सम्मान में विभिन्न आयोजनों का सिलसिला चल रहा था... ऐसे में अगर पश्चिम बंगाल से महिला दिवस पर राष्ट्र की सर्वेसर्वा मातृशक्ति की पद-गरिमा के विपरीत व्यवस्था भंग की जाए और उसके बचाव में महिला होने के बावजूद ममता बनर्जी राष्ट्रपति पर भाजपाई होने का आरोप मढ़ दें तो क्या यह राष्ट्रपति और राष्ट्रपति पद के साथ संपूर्ण राष्ट्र और मातृशक्ति का भी सामूहिक अपमान नहीं है..?
उससे भी बढ़कर क्या यह संपूर्ण जनजातीय समाज की भी अवहेलना नहीं है? केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव से राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के नौवें अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन में भाग लेने के दौरान लापरवाही के संबंध में रिपोर्ट मांगी है... यह कथित लापरवाही प्रोटोकॉल, मार्ग सुरक्षा और कार्यक्रम स्थल प्रबंधन से संबंधित है... यह मामला अब संवैधानिक गरिमा, प्रशासनिक जवाबदेही का ही है, लेकिन ममता सरकार इसे चुनावी राजनीति का हथियार बनाने पर उतारू है... जबकि महामहिम राष्ट्रपति ने स्वयं सार्वजनिक रूप से प्रोटोकॉल संबंधी खामियों की ओर संकेत कर बता दिया है कि कोई राज्य राजनीतिक जोड़-तोड़ के चलते क्या इतने निचले स्तर पर आ सकता है..? भारत में राष्ट्रपति का पद राजनीति से ऊपर ही नहीं माना जाता, बल्कि यह संवैधानिक रूप से स्थापित सत्य भी है...
केंद्र और राज्यों में सरकार चाहे किसी की भी हो, लेकिन राष्ट्रपति काकार्यक्रम कभी किसी राजनीतिक विवाद में नहीं पड़ता, यह पद किसी व्यक्ति की नहीं, देश की गरिमा और प्रतिष्ठा से जुड़ा है... ऐसे में अगर राष्ट्रपति स्वयं यह अनुभूत करती हैं कि उनके सम्मान का ध्यान पश्चिम बंगाल में नहीं रखा गया तो प्रदेश सरकार की मंशा और उसकी कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े होते हैं... राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल को लेकर सख्त नियम है, जिनका पालन हर हाल में करना होता है... राष्ट्रपति की आमतौर पर अगवानी राज्य के मुख्यमंत्री करते हैं या उनकी तरफ से नोंमित उसका कोई मंत्री करता है.
लेकिन पश्चिम बंगाल में ममता सरकार के राज में ऐसा नहीं हुआ... केंद्र सरकार ने इस चूक पर राज्य सरकार से जवाब मांगा है... इस मामले से यह भी पता चलता है कि देश में कई बार बड़े आयोजनों तक की तैयारी आखिरी वक्त तक चलती रहती है अगर राष्ट्रपति के दौरे से जुड़े सारे इंतजाम पहले ही पूरे होते तो शायद यह विवाद खड़ा ही नहीं होता.. लेकिन क्या ममता सरकार ने साजिशसन व्यवस्थाएं इसीलिए लंबित रखी कि पश्चिम बंगाल में संवैधानिक गरिमा ताक पर रखी जा सके..?