भारतीय विकास मॉडल के प्रवर्तक सुदर्शनजी

विकास की भारतीय व्यवस्था के प्रवर्तक थे सुदर्शनजी

सुदर्शनजी, RSS के पूर्व सरसंघचालक, ने भारतीय चिंतन और स्वावलंबी विकास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके विचार आज भी प्रेरणा देते हैं।

By : नरेंद्र कुमार
विकास की भारतीय व्यवस्था के प्रवर्तक थे सुदर्शनजी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक पूज्य श्री कुप्पहली सीतारमैया सुदर्शनजी भारतीय चिंतन, सांस्कृतिक एकात्मता और स्वावलंबी विकास की भारतीय व्यवस्था के प्रखर प्रवर्तक थे। उनका जीवन राष्ट्रसेवा, संगठन, सामाजिक समरसता और भारतीय जीवन-दृष्टि के प्रति समर्पित रहा। उनकी पुण्यतिथि पर उनका व्यक्तित्व और कृतित्व आज भी राष्ट्रकार्य के लिए प्रेरणा देता है।

सुदर्शनजी का जन्म 18 जून 1931 को छत्तीसगढ़ के रायपुर में हुआ। उनके पूर्वज लगभग ढाई सौ वर्ष पूर्व तमिलनाडु से कर्नाटक आकर बसे थे। पिता श्री सीतारमैया वन विभाग में कार्यरत थे और सेवा के कारण मध्यप्रदेश के विभिन्न स्थानों पर पदस्थ रहे। सुदर्शनजी की प्रारंभिक शिक्षा बैतूल, दमोह, रायपुर और मंडला में हुई। चंद्रपुर की जुबली हाईस्कूल से उन्होंने हाईस्कूल तथा जबलपुर के रॉबर्ट्सन कॉलेज से इंटर की शिक्षा पूरी की। वर्ष 1954 में उन्होंने दूरसंचार विषय में अभियांत्रिकी की उपाधि प्राप्त की और अगले ही वर्ष अपना जीवन संघकार्य के लिए समर्पित कर दिया।

श्री रामशंकर अग्निहोत्रीजी के संपर्क में आकर वे संघ से जुड़े। दमोह और सागर में जिला प्रचारक तथा रीवा में विभाग प्रचारक रहे। 1964 में उन्हें मध्यभारत के प्रांत प्रचारक का दायित्व मिला। 1969 में वे अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख बने। इस दौरान उन्होंने बिना शस्त्र आत्मरक्षा और प्रहार की भारतीय शैली 'नियुद्ध' को संघ के शारीरिक कार्यक्रम में सम्मिलित कराया।1975 में आपातकाल के दौरान उन्हें इंदौर में गिरफ्तार कर लिया गया। उन्नीस माह के कारावास में उन्होंने विभिन्न पंथों और मतों के लोगों से संवाद किया तथा अनेक पुस्तकों का अध्ययन किया। जेल का यह काल उनके वैचारिक व्यक्तित्व को और व्यापक बनाने वाला सिद्ध हुआ।

1977 में वे पूर्वांचल के क्षेत्र प्रचारक बने। पूर्वोत्तर भारत के जनजातीय समाज के बीच उन्होंने गहरा संपर्क स्थापित किया और वहां की अनेक भाषाओं को सीखा। मतांतरण और घुसपैठ के कारणों का अध्ययन करते हुए उन्होंने समाज और शासन को सचेत किया। जनजातीय समाज की आस्था और संस्कृति की रक्षा के लिए विद्यालय, छात्रावास और सेवा प्रकल्पों के निर्माण को उन्होंने गति दी। असम में रानी मां गाइदिन्ल्यू के साथ प्रवास कर उन्होंने जनजातीय समाज में जागरण का कार्य किया।अशांत पंजाब में शांति स्थापना के प्रयासों में भी सुदर्शनजी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने श्री गुरु ग्रंथ साहिब का अध्ययन किया और गुरुवाणी के अनेक प्रसंग कंठस्थ किए। वे भारतीय समाज की विविध परंपराओं को एकात्मता के सूत्र में देखने वाले मनीषी थे।

1979 में उन्हें अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख का दायित्व मिला। देशभर में प्रवास कर उन्होंने भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय एकात्मता और राष्ट्रजीवन के मूल तत्वों को समाज तक पहुंचाया। 1990 में वे सरकार्यवाह बने। 10 मार्च 2000 को प्रो. राजेंद्र सिंहजी के बाद उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक का दायित्व मिला। 21 मार्च 2009 को उन्होंने स्वयं इस पद से निवृत्त होकर डॉ. मोहन भागवतजी को यह दायित्व सौंपा।

सुदर्शनजी का चिंतन पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के भारतीय मॉडल पर भी केंद्रित था। वे जैविक खेती के प्रबल समर्थक थे और संकर तथा आनुवंशिक रूप से परिवर्तित बीजों के संभावित दुष्प्रभावों को लेकर वैज्ञानिकों से संवाद करते थे। जीवाश्म ईंधनों के विकल्प के रूप में जैव ईंधन के विकास में भी उनकी रुचि थी। भोपाल में उन्होंने संघ कार्यालय की छत पर रासायनिक खाद से मुक्त सब्जियों की खेती का प्रयोग कराया। जल और प्राकृतिक संसाधनों के न्यूनतम उपयोग को उन्होंने अपने जीवन में भी अपनाया।वे गौ, ग्राम और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को भारत के लिए अधिक अनुकूल मानते थे। उनका मानना था कि विकास का भारतीय मॉडल प्रकृति और समाज के संतुलन पर आधारित होना चाहिए। वे 'पोषणक्षम विकास' से अधिक 'पोषणक्षम उपयोग' को महत्व देते थे। उनका यह चिंतन आज पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास के संदर्भ में और अधिक प्रासंगिक हो उठा है।

अयोध्या में भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर को लेकर उनका विश्वास अटूट था। वे कहते थे कि भारत के उत्कर्ष का ऐसा काल आएगा, जब विश्व समाधान की दृष्टि से भारत की ओर देखेगा। भारतीय पर्वतों, नदियों, तीर्थों, ऋषियों और संतों को वे राष्ट्रीय एकात्मता के जीवंत सूत्र मानते थे।सुदर्शनजी ने नेत्रदान कर यह संदेश भी दिया कि देह के बाद भी सेवा का क्रम जारी रह सकता है। 15 सितंबर 2012 को रायपुर में उनका देहावसान हुआ। जन्मभूमि में ही उनका जीवन-प्रवास पूर्ण हुआ। उनका जीवन भारतीय विचार, राष्ट्रभक्ति, स्वावलंबन और सेवा-साधना का ऐसा अध्याय है, जिसकी प्रेरणा आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रकार्य के लिए सदैव मिलती रहेगी।

अरविन्द कुमार मिश्रा

(लेखक एवं स्तंभकार हैं।)

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