तस्लीमा नसरीन की वापसी

तस्लीमा नसरीनः कट्टरवाद और वामपंथी दोहरे मापदंडों के बीच एक आवाज

बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन को कोलकाता में शरण मिली है। उनकी वापसी बंगाली साहित्य और समाज में एक नई चर्चा का विषय बन गई है।

By : स्वदेश डेस्क
तस्लीमा नसरीनः कट्टरवाद और वामपंथी दोहरे मापदंडों के बीच एक आवाज

तस्लीमा नसरीन की रचनाएँ किसी को पसंद आ सकती हैं और कोई उनके सभी विचारों से सहमत न भी हो सकता है। लेकिन किसी लेखक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अपनी भाषा के लोगों के बीच लौटकर रहने के अधिकार पर कोई विवाद नहीं होना चाहिए। दुर्भाग्य से, बंगाल की राजनीति और बुद्धिजीवी वर्ग के एक हिस्से ने इस प्रश्न को बार-बार राजनीतिक और वैचारिक चश्मे से देखा है। इसलिए यह पूछना स्वाभाविक है कि जो लोग सबसे अधिक धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं, क्या वे वास्तव में धर्मनिरपेक्ष हैं, या फिर उनके लिए धर्मनिरपेक्षता केवल चुनिंदा अवसरों पर इस्तेमाल किया जाने वाला राजनीतिक हथियार है?

बांग्ला की अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त लेखिका तस्लीमा नसरीन का परिचय देने की आवश्यकता नहीं है। उनकी रचनाओं पर विवाद हुए, आलोचना हुई और अनेक लोगों ने उनके विचारों का विरोध किया। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि इस्लामी कट्टरपंथियों की धमकियों और फतवों के कारण उन्हें अपना देश बांग्लादेश छोड़ना पड़ा। उन्होंने देश छोड़ा, पर अपने विचारों से समझौता नहीं किया। बाद में उन्हें कोलकाता में शरण मिली, किंतु 2007 के बाद राजनीतिक और कट्टरपंथी दबाव के कारण उन्हें पश्चिम बंगाल भी छोड़ना पड़ा। यह विडंबना ही है कि बांग्ला भाषा की एक लेखिका अपनी ही भाषा के सबसे बड़े शहर में नहीं रह सकीं।

अब समय आ गया है कि इस ऐतिहासिक भूल को सुधारा जाए। तस्लीमा नसरीन कोलकाता लौट रही हैं। इस संदर्भ में प्रसिद्ध कवि जय गोस्वामी की टिप्पणी उल्लेखनीय है। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था, "जो लोग तस्लीमा को वापस ला रहे हैं, वे मेरे लिए प्रणम्य हैं।" उन्होंने 1986 की स्मृतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि तस्लीमा ने जो कुछ लिखा, उसे अपने जीवन में भी पूरी ईमानदारी से निभाया। वास्तव में, उन्होंने केवल अपने लेखन से नहीं, बल्कि अपने जीवन से भी अपने विश्वासों की कीमत चुकाई। इसका प्रमाण उस समय की मीडिया रिपोर्टों में भी मिलता है। Sunday पत्रिका (21–27 अगस्त) ने लिखा था, "She emplaned when Dhaka slept. Taslima Nasreen, the xx-year-old Bangladeshi writer who faced fundamentalist fatwas and carried a price on her head, left the country for Sweden in the early hours of 9 August."

बांग्लादेश से उनका निष्कासन एक त्रासदी थी, लेकिन उससे भी अधिक आश्चर्यजनक यह है कि जब उन्हें पश्चिम बंगाल छोड़ना पड़ा, तब राज्य में वामपंथी सरकार थी। आज जो लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सबसे बड़े समर्थक होने का दावा करते हैं, उनके शासनकाल में ही एक लेखिका को सुरक्षित रहने का अधिकार नहीं मिल सका। इतिहास बताता है कि जब तस्लीमा के साथ खड़े होने का समय आया, तब नैतिक साहस से अधिक महत्व वोटों के गणित, राजनीतिक लाभ और कट्टरपंथियों की नाराज़गी से बचने को दिया गया। उस समय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भाषण नहीं, बल्कि मौन दिखाई दिया। जो लोग आज विश्वविद्यालयों, साहित्यिक मंचों और सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बातें करते हैं, तस्लीमा के मामले में वे कहाँ थे?

यह दोहरापन नया नहीं है। भारतीय वाम राजनीति के इतिहास में ऐसी प्रवृत्ति पहले भी दिखाई देती रही है। एक समय 'वंदे मातरम्', जो स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे बड़ी प्रेरणाओं में से एक था और आज भारत का राष्ट्रीय गीत है, उसका विरोध किया गया। रवीन्द्रनाथ ठाकुर को भी कभी 'बुर्जुआ कवि' कहकर खारिज करने का प्रयास हुआ। इतिहास बताता है कि विचारधारा के नाम पर राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक विरासत की उपेक्षा की गई। आज तस्लीमा नसरीन के मामले में भी वही मानसिकता दिखाई देती है। समस्या तस्लीमा नहीं हैं, बल्कि यह है कि उन्होंने इस्लामी कट्टरवाद की खुलकर आलोचना की। यदि उन्होंने सनातन हिंदू धर्म पर इसी प्रकार लिखा होता, तो संभवतः उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया जाता और उनके समर्थन में बड़े आंदोलन खड़े किए जाते। लेकिन जब आलोचना इस्लामी कट्टरवाद की होती है, तब तथाकथित प्रगतिशीलों का एक बड़ा वर्ग असहज हो जाता है और मौन को ही सुरक्षित विकल्प मानता है।

ऐसे समय में 1 अगस्त को सेक्युलर मिशन द्वारा तस्लीमा नसरीन के सम्मान में आयोजित कार्यक्रम निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण पहल है। इस आयोजन के लिए सेक्युलर मिशन और उससे जुड़े सभी संगठनों को बधाई। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में उनका साहस सराहनीय है। साथ ही, पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा इस कार्यक्रम के आयोजन में प्रशासनिक सहयोग और उदार दृष्टिकोण अपनाना भी एक सकारात्मक कदम है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण सांस्कृतिक कार्यक्रमों को अवसर देना सरकार का दायित्व है।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक और सच्चाई उजागर कर दी है। जो लोग प्रतिदिन सेक्युलरिज्म के नाम पर हिंदू समाज और संस्कृति की आलोचना करते हैं, उनमें से अधिकांश तस्लीमा नसरीन के प्रश्न पर मौन हैं। आलोचना लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है, किंतु यदि वह केवल एक धर्म तक सीमित रहे, तो क्या उसे धर्मनिरपेक्षता कहा जा सकता है? जब बांग्ला भाषा की एक लेखिका वर्षों तक कोलकाता नहीं लौट सकीं, तब इन तथाकथित सेकुलरों का विरोध कहाँ था? क्या उन्होंने कभी यह कहा कि किसी लेखक को कट्टरवादियों के दबाव में निर्वासन के लिए विवश नहीं किया जाना चाहिए? क्या उन्होंने कभी यह मांग की कि बांग्ला भाषा के लेखक के लिए कोलकाता के द्वार सदैव खुले रहने चाहिए?

यह चुप्पी उनकी कथित धर्मनिरपेक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाती है। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ किसी एक धर्म की आलोचना करना और दूसरे धर्म के कट्टरवाद पर मौन साध लेना नहीं है। सच्ची धर्मनिरपेक्षता वही है, जो सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण रखे, प्रत्येक नागरिक के समान अधिकारों का सम्मान करे और बिना किसी भेदभाव के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में दृढ़ता से खड़ी हो।

दिगंत चक्रवर्ती (लेखक स्तंभकार हैं)

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