हिड़मा का अंत: नक्सलवाद के ताबूत में एक और कील

हिड़मा का अंत: नक्सलवाद के ताबूत में एक और कील

By : Swadesh Bhopal
हिड़मा का अंत: नक्सलवाद के ताबूत में एक और कील

छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में वर्षों से दहशत का पर्याय बने कुख्यात नक्सली कमांडर माड़वी हिड़मा की मुठभेड़ में मौत नक्सल मोर्चे पर सुरक्षा बलों की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। करोड़ों की इनामी राशि और दर्जनों बड़े हमलों का मास्टरमाइंड, जंगलों की दुर्गमता को ढाल बनाकर वर्षों तक राज्य को चुनौती देने वाला यह कमांडर अब नहीं रहा। यह निश्चित रूप से नक्सल उन्मूलन अभियान की दिशा में एक बड़ा कदम है, लेकिन इस सफलता के बीच यह समझना भी जरूरी है कि नक्सलवाद केवल बंदूकों की लड़ाई नहीं है। यह उस गहरी सामाजिक-आर्थिक विषमता की उपज है, जिसे पूर्ववर्ती सरकारों ने दशकों तक अनदेखा किया।

पिछले कुछ वर्षों में सरकार का जोरदार और लगातार अभियान निर्णायक रूप से असरदार सिद्ध हुआ है। लगातार ऑपरेशनों, आधुनिक तकनीक, खुफिया समन्वय और सुरक्षा बलों की मजबूत उपस्थिति ने नक्सलियों की शक्ति लगभग क्षीण कर दी है। जंगलों में उनका प्रभाव क्षेत्र काफी कम हुआ है और नेतृत्व के स्तर पर उन्हें भारी क्षति उठानी पड़ी है। इस दबाव का सकारात्मक परिणाम यह है कि नक्सलियों के कई बड़े समूह अब मुख्यधारा में लौट रहे हैं। वे समझ चुके हैं कि हथियारबंद संघर्ष का भविष्य समाप्त हो चला है और सरकार की पुनर्वास नीतियां उन्हें बेहतर जीवन की दिशा में एक सशक्त विकल्प प्रदान करती हैं। आत्मसमर्पण करने वालों की बढ़ती संख्या इसी बदले हुए माहौल का प्रमाण है।

सरकार इस प्रक्रिया को केवल सैन्य उपलब्धि के रूप में नहीं देख रही है, बल्कि व्यापक पुनर्वास व्यवस्था लागू कर रही है-आवास, आजीविका, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन के अवसर प्रदान कर उन्हें समाज में वापस लाने का प्रयास किया जा रहा है। इससे स्थानीय समुदायों में भरोसा पैदा हुआ है कि सरकार केवल बल प्रयोग नहीं, बल्कि इंसाफ और विकास के साथ आगे बढ़ना चाहती है। जिन युवाओं ने किसी विचारधारा या क्षणिक आक्रोश में हथियार उठाए थे, वे अब हथियार छोड़ रहे हैं क्योंकि उन्हें शांतिपूर्ण जीवन, स्थिर आय और सामाजिक स्वीकृति के वास्तविक विकल्प दिखाई दे रहे हैं।

लेकिन वास्तविक चुनौती अब शुरू होती है। नक्सलवाद का जन्म उन क्षेत्रों में हुआ, जहां विकास योजनाएँ कागजों तक सीमित थीं। जनजातीय समुदायों के जमीन–जंगल–जल पर अधिकारों में कमी, बेरोजगारी, शिक्षा-स्वास्थ्य की उपेक्षा और प्रशासन का कठोर रवैया असंतोष की आग को भड़काता रहा। माओवादी और वामपंथी ताकतों ने इस असंतोष का लाभ उठाकर भोले-भाले जनजातीय समुदायों को सरकारों के खिलाफ भड़काया, और इसी से समस्या की जड़ें गहरी हुईं।

इसलिए यह अनिवार्य है कि अब जब नक्सली संगठन कमजोर हैं, तो सरकार उस भरोसे और विकास की कमी को पूरा करे, जिसने कभी इस आंदोलन को जन्म दिया था। सड़क, स्कूल, अस्पताल और डिजिटल कनेक्टिविटी जैसे मूलभूत विकास तभी सार्थक होंगे, जब स्थानीय समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी मिलेगी। सरकार ने मार्च 2026 तक नक्सलवाद के पूरी तरह अंत का लक्ष्य निर्धारित किया है। यह लक्ष्य तभी सार्थक होगा, जब सुरक्षा अभियानों के साथ सामाजिक-आर्थिक न्याय की गति भी समानांतर चले। इतिहास बताता है कि किसी उग्रवादी आंदोलन को केवल गोलियों से खत्म नहीं किया जा सकता-उसकी जड़ें विकास, सम्मान और विश्वास से ही कमजोर पड़ती हैं।

हिड़मा की मौत नक्सली संगठन के लिए एक बड़ा झटका है और सरकार का अभियान उन्हें लगातार कमजोर कर रहा है। मुख्यधारा में लौटते समूह, सफल पुनर्वास नीतियाँ और बढ़ता सामाजिक विश्वास यह संकेत देते हैं कि हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन यह यात्रा अभी अधूरी है। असली सफलता तब मानी जाएगी जब बंदूक छोड़ने वाले हाथों को स्थायी अवसर और सम्मान मिलेगा, और वे समुदाय, जिन्होंने दशकों तक हिंसा और भय में जीवन बिताया, विकास और न्याय को अपनी आंखों से देख सकेंगे।

यदि सुरक्षा, विकास और संवेदनशील शासन एक साथ आगे बढ़े, तो कहा जा सकेगा कि हिड़मा की मौत केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं, बल्कि नक्सलवाद के समाप्ति की ठोस शुरुआत है।

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