पेयजल की गुणवत्ता पर ध्यान देने की जरूरत

पेयजल की गुणवत्ता पर ध्यान देने की जरूरत

By : Swadesh Bhopal
पेयजल की गुणवत्ता पर ध्यान देने की जरूरत

जल ही जीवन है, जल नहीं तो जीवन नहीं। यानी जल के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। लेकिन जब जल ही जीवन को निगलने लगे, तो बड़ा सवाल यही उठता है कि जीवन कैसे बचेगा? देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर की घटना इसका ताजा उदाहरण है। इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से 14 लोगों की मौत हो गई, जो एक बहुत बड़ी प्रशासनिक विफलता है।

यह विफलता राज्य सरकार की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की है जो बार-बार शिकायत मिलने पर भी सोता रहा। यह उन अधिकारियों की विफलता का दुष्परिणाम है जिन पर घर-घर स्वच्छ जल पहुंचाने की जिम्मेदारी है। इंदौर, जिसे लगातार देश का सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया जाता रहा, उसी शहर के कुछ क्षेत्रों में नलों से दूषित पानी आया। बाद में खुलासा हुआ कि एक शौचालय की सीवर लाइन और पेयजल पाइपलाइन का घातक मिलान हो गया था।

यह घटना बताती है कि वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट लगा देना ही पर्याप्त नहीं है। असली खतरा उस पाइप नेटवर्क में छिपा है जो घरों तक पानी पहुंचाता है। पुरानी, जर्जर, रिसाव से भरी पाइप लाइनें, जिनकी कोई नियमित निगरानी नहीं होती।

हालांकि यह सब अचानक नहीं हुआ। स्थानीय नागरिक महीनों से शिकायत कर रहे थे, लेकिन गंदे पानी से होने वाली बीमारियों को इमरजेंसी नहीं माना गया। जब दूषित पानी से बीमार होकर लोग मरने लगे, तब सिस्टम जागा।

इंदौर में सीवरयुक्त पानी पीने से हुई मौतें सिर्फ एक शहर की त्रासदी नहीं हैं, बल्कि ये उस सरकारी भ्रम का भी पर्दाफाश हैं जिसमें पाइप से पानी पहुंचना ही सुरक्षित पेयजल मान लिया गया। देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर में हुई मौतों ने यह भी साबित किया है कि ऊपरी साफ-सफाई के नीचे अंडरग्राउंड सड़ांध बह रही थी।

यह सड़ांध सिर्फ पाइपों में गंदे पानी की नहीं थी, बल्कि उस सरकारी उपेक्षा की भी थी जिस पर किसी चेतावनी का असर नहीं पड़ा। यही बेख़बरी और अनदेखी देश के अलग-अलग हिस्सों में भी दिखती है।

इंदौर की यह घटना कोई अपवाद नहीं बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में पहले से घट चुकी समान त्रासदियों की कड़ी है। गुजरात के महिसागर जिले में पीलिया का प्रकोप बोरवेल और नगर पालिका के जल स्रोतों के दूषित होने से जुड़ा पाया गया था। तमिलनाडु के तिरुवल्लूर में प्रदूषित नल जल पीने से कई लोग अस्पताल में भर्ती हुए थे। ओडिशा के संबलपुर में 2014 के हेपेटाइटिस प्रकोप में 3900 से अधिक लोग संक्रमित हुए और लगभग 36 लोगों की मौत हुई।

शुद्ध पेयजल आपूर्ति में हमारी विफलता भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि में भी झलकती है। ग्लोबल रेस्क्यू जैसी अंतरराष्ट्रीय ट्रैवल और सेफ्टी एडवाइजरी देने वाली फर्म भारत को उन देशों की सूची में रखती हैं जहाँ नल का पानी पीना असुरक्षित माना जाता है। दूसरे देशों से भारत आने वाले नागरिकों को पहले से हिदायत दी जाती है कि केवल बोतलबंद मिनरल वाटर पिएं।

हालांकि यह कोई औपनिवेशिक पूर्वाग्रह नहीं है, बल्कि एक व्यावहारिक चेतावनी है। नॉर्वे, स्विट्ज़रलैंड, जापान, सिंगापुर, इजरायल जैसे देशों में नल का पानी सीधे पिया जाता है। वहाँ सिस्टम के कठोर स्टैंडर्ड होते हैं, जहाँ लगातार टेस्टिंग और निगरानी होती है।

लेकिन भारत में केवल पाइप बिछाने पर जोर है, पानी की गुणवत्ता पर नहीं। इंदौर की यह घटना भविष्य के लिए बड़ी चेतावनी है। भारत ने जिस गंभीरता से हवा की गुणवत्ता मापनी सीखी है, अब उसी गंभीरता से पेयजल की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। सरकार को पेयजल की गुणवत्ता पर ध्यान देना होगा। हर शहर में नियमित जल परीक्षण सार्वजनिक करना होगा। गंदे पानी की आपूर्ति को हेल्थ इमरजेंसी मानना पड़ेगा।

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