अतीत का विचार यथास्थिति या प्रतिशोध नहीं

अतीत का विचार यथास्थिति या प्रतिशोध नहीं

डॉ. अवधेश त्रिपाठी

By : Swadesh Bhopal
अतीत का विचार यथास्थिति या प्रतिशोध नहीं

समान नागरिक संहिता के बिना भेदभाव उन्मूलन असंभव

समाज मनुष्यों का एक समूह है। तब सबसे महत्वपूर्ण यह है कि उसमें मानवीय मूल्यों की उपस्थिति हो। साथ ही किसी भी विमर्श तथा किसी भी कार्रवाई का आधार केवल वर्तमान होना चाहिए। अतीत का विचार कदापि यथास्थिति या प्रतिशोध का नहीं हो सकता। अतीत की गलतियों को दोहराने का अर्थ भविष्य को अंधकार में धकेलना है। अतीत केवल सीख लेने और वर्तमान में उसे न दोहराने के लिए है, तभी उज्ज्वल भविष्य की कामना की जा सकती है। ध्यान रहे.

भूत केवल कल्पना है

और भविष्य भी कल्पना है।।

संविधान निर्माताओं ने इसी दृष्टि से मानवीय मूल्यों सत्य, न्याय, विवेक और प्रेम के विस्तार तथा सभी के लिए अवसर की समानता की बात कही थी। इसके अंतर्गत पंथ, संप्रदाय, जाति, भाषा, क्षेत्र और लिंग के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव और विशेषाधिकार का स्पष्ट निषेध किया गया है। वे इसे भारत की स्वतंत्रता, संप्रभुता, सुरक्षा और अखंडता का अनिवार्य आधार मानते थे। साथ ही इस उद्देश्य की हृदय से स्वीकार्यता को, नियम और कानून के माध्यम से, समस्त देशवासियों ‘हम भारत के लोग’ की नागरिकता की अनिवार्य शर्त के रूप में देखते थे।

दुर्भाग्यवश स्वतंत्रता के बाद की सरकारों ने अपने व्यक्तिगत और राजनीतिक स्वार्थों के लिए संविधान निर्माताओं की भावना और संविधान की उद्देशिका को न केवल अस्वीकार किया, बल्कि उसे कुटिलता के साथ बुरी तरह पददलित भी किया है। संविधान भविष्य उन्मुख होकर बनाया गया था, न कि अतीत उन्मुख होकर अतीत के संरक्षण के लिए।

सामाजिक भेदभाव के निराकरण के उपाय हृदय से स्वीकार किए जाएं, आचरण में प्रतिबिंबित हों और कानूनी रूप से प्रभावी ढंग से लागू किए जाएं, तभी यह संभव है। इसके लिए जिस तत्व को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी थी, वह है ज्ञान की अनिवार्यता। ज्ञान के लिए शिक्षा और विद्या दोनों आवश्यक हैं। शिक्षा केवल पढ़-लिखकर पुस्तकीय जानकारी प्राप्त करना है, जबकि विद्या बुद्धि का परिष्कार है।

सरकारों को चाहिए था कि वे देश के समस्त नागरिकों के लिए सम्मानजनक आजीविका, सुरक्षा और न्याय व्यवस्था को सुदृढ़ करते हुए त्वरित उपलब्धता सुनिश्चित करें। साथ ही देश के सांस्कृतिक ढांचे को हानि पहुंचाने वाले तत्वों से कठोरता से निपटने की भी सख्त आवश्यकता थी और है।

भेदमूलक सामाजिक व्यवस्थाओं का उन्मूलन भेदभाव-रहित समान नागरिक संहिता के बिना संभव नहीं है। संविधान के इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जिस बात की महती आवश्यकता है, वह है राजनेताओं का सुयोग्य, प्रज्ञावान और भ्रष्टाचार-रहित आचरण। यहां भ्रष्टाचार से आशय किसी भी प्रत्यक्ष या परोक्ष लाभ के लिए कर्तव्य की अवहेलना से है।

यदि ऐसा होता, तो सत्ता के लिए अधिकारों के दुरुपयोग, गुंडा तत्वों के सहयोग, धन के लेन-देन, संप्रदायवाद, जातिवाद, परिवारवाद, वंशवाद, क्षेत्रवाद और भाषावाद जैसे विभेदक तत्वों से बचते हुए देश को उन्नति के शिखर तक ले जाया जा सकता था।

दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के बाद की लगभग सभी सरकारों ने प्रतिगामी कदम उठाए हैं। इसमें उन्हें अशिक्षित, स्वार्थी और अदूरदर्शी जनसमूह का भी समय-समय पर सहयोग मिलता रहा है। आम लोग भी तात्कालिक परिणाम और व्यक्तिगत लाभ को प्राथमिकता देते रहे हैं।

यदि स्वतंत्रता सेनानियों ने भी इसी दृष्टिकोण को अपनाया होता, तो क्या आज हम वह सब देख और कर पाते, जो आज संभव है? अहो! शोक है…

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