Uniform Civil Code Debate in India

यूसीसी : न्याय, समानता और सच्चे धर्मनिरपेक्ष भारत की दिशा

समान नागरिक संहिता (UCC) पर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी ने बहस को फिर तेज कर दिया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि एक समान कानून से सभी नागरिकों को बराबर अधिकार मिल सकते हैं।

By : स्वदेश डेस्क
यूसीसी : न्याय, समानता और सच्चे धर्मनिरपेक्ष भारत की दिशा

भारत जैसे बहुलतावादी समाज में कानून और न्याय की व्यवस्था का सबसे बड़ा उद्देश्य यह होना चाहिए कि हर नागरिक को समान अधिकार और समान अवसर मिले। लेकिन वास्तविकता यह है कि आज भी विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और पारिवारिक मामलों में अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू हैं। इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी एक बार फिर समान नागरिक संहिता (यूसीसी) की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

मुस्लिम महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकारों से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि ऐसी जटिलताओं का ‘एकमात्र समाधान यूसीसी’ हो सकता है। यह टिप्पणी केवल एक कानूनी दृष्टिकोण नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत है।भारतीय संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 44 के तहत राज्य को यह निर्देश दिया गया है कि वह नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करे। इसका उद्देश्य किसी धर्म विशेष को निशाना बनाना नहीं, बल्कि सभी नागरिकों के लिए समान और न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थापित करना है। विडंबना यह है कि संविधान लागू होने के 75 वर्षों बाद भी यह लक्ष्य अधूरा है।

इस बीच सर्वोच्च न्यायालय कई बार विभिन्न मामलों में यूसीसी की आवश्यकता पर जोर दे चुका है। शाह बानो प्रकरण से लेकर हाल के कई फैसलों तक न्यायालय ने संकेत दिया है कि अलग-अलग व्यक्तिगत कानून कई बार महिलाओं और कमजोर वर्गों के अधिकारों में बाधा बन जाते हैं।हालिया सुनवाई में भी न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने यह स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत कानूनों को सीधे निरस्त करने से शून्य की स्थिति पैदा हो सकती है। इसलिए इस दिशा में पहल विधायिका को करनी होगी। अदालत का यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह बताता है कि सुधार केवल न्यायिक आदेशों से नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक सहमति और कानून निर्माण की प्रक्रिया से ही संभव है।

यूसीसी के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह है कि यह लैंगिक समानता को मजबूत करेगा। आज कई व्यक्तिगत कानूनों में महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार नहीं मिलते। उत्तराधिकार, तलाक या बहुविवाह जैसे मुद्दों पर महिलाओं के साथ भेदभाव के उदाहरण सामने आते रहे हैं। यदि पूरे देश में एक समान कानून लागू होगा, तो हर महिला चाहे वह किसी भी धर्म या समुदाय से हो समान अधिकारों की हकदार होगी। यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 में निहित समानता के सिद्धांत को वास्तविक रूप देगा।दूसरा महत्वपूर्ण पहलू भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप से जुड़ा है। सच्चे अर्थों में धर्मनिरपेक्षता का मतलब यह नहीं कि अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग कानून हों, बल्कि यह है कि राज्य सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करे। यूसीसी लागू होने से नागरिकों की पहचान धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि समान अधिकारों वाले भारतीय नागरिक के रूप में होगी। इससे राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता भी मजबूत होगी।

राजनीतिक स्तर पर भी यह विषय लंबे समय से चर्चा में रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने इसे अपने वैचारिक एजेंडे में प्रमुख स्थान दिया है और कई मंचों से इसे लागू करने की बात कही है। इतिहास गवाह है कि सामाजिक सुधार अक्सर शुरुआत में विवादास्पद रहे हैं, पर अंततः उन्होंने समाज को अधिक न्यायपूर्ण बनाया है।आज जब भारत वैश्विक मंच पर एक सशक्त और आधुनिक राष्ट्र के रूप में उभर रहा है, तब यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि उसके नागरिकों के अधिकार भी समान और स्पष्ट हों। समान नागरिक संहिता केवल एक कानूनी सुधार नहीं, बल्कि समानता, न्याय और सच्चे धर्मनिरपेक्ष भारत की दिशा में एक निर्णायक कदम है।अब समय आ गया है कि देश की राजनीति इस ऐतिहासिक जिम्मेदारी को स्वीकार करे और संविधान की इस अधूरी आकांक्षा को पूरा करने की दिशा में ठोस कदम उठाए।

 

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