Rajmata Vijayaraje Scindia Emergency Story

आपातकाल की आपबीती:आपातकाल, तिहाड़ और विजयाराजे सिंधिया की अदम्य कथा

राजमाता विजयाराजे सिंधिया के जीवन पर प्रकाश डालते हुए यह लेख आपातकाल के दौरान उनके संघर्षों और तिहाड़ जेल में बिताए गए समय का वर्णन करता है।

By : स्वदेश डेस्क
आपातकाल की आपबीती:आपातकाल, तिहाड़ और विजयाराजे सिंधिया की अदम्य कथा

चन्द्रवेश पाण्डेय 

25 जून 1975 की वह रात भारतीय लोकतंत्र के माथे पर एक स्याह दाग की तरह दर्ज है। राजधानी दिल्ली की हवा में घुटन थी। सत्ता ने असहमति को अपराध घोषित कर दिया था और लोकतंत्र की आवाजों को चुप कराने का अभियान शुरू हो चुका था। देशभर में गिरफ्तारियां हो रही थीं। टेलीफोन खामोश थे, अखबारों की स्याही पर पहरा था और भय की लंबी परछाइयां सत्ता के गलियारों में उतर आई थीं।

उसी रात दिल्ली के राजपुर रोड स्थित एक बंगले में भी बेचैनी थी। वहां ठहरी थीं ग्वालियर राजघराने की राजमाता विजयाराजे सिंधिया, जनसंघ की प्रखर नेता, लाखों कार्यकर्ताओं की प्रेरणा और सत्ता के सामने न झुकने वाली दृढ़ व्यक्तित्व की स्वामिनी। उनके साथ थे विश्वस्त सहयोगी ध्यानेन्द्र सिंह 'मामाजी'। अंदेशा था कि इंदिरा गांधी सरकार उन्हें कभी भी गिरफ्तार कर सकती है।

जब आधी रात को मिली गिरफ्तारी की आहट

आपातकाल की घोषणा के तुरंत बाद जनसंघ नेताओं की एक गुप्त बैठक हुई। सूचना मिली कि गिरफ्तारी की सूची तैयार हो चुकी है। दिल्ली में जनसंघ के वरिष्ठ नेता मदनलाल खुराना के एक सहयोगी ने संदेश पहुंचाया-'राजमाता को तुरंत दिल्ली छोड़नी होगी।' पहचान छिपाने के लिए हमेशा श्वेत वस्त्र धारण करने वाली राजमाता को पहली बार हरी-काली छींटदार साड़ी पहनाई गई। आंखों पर बड़ा चश्मा लगाया गया। उम्र 55-56 वर्ष थी, किंतु चेहरे का तेज छिपाना आसान नहीं था। फिर भी रात के अंधेरे में कुछ विश्वस्त लोगों के साथ वे दिल्ली से निकल पड़ीं। ध्यानेन्द्र सिंह, डॉ. जे.के. जैन, दीवान सुरिन्दर लाल और अन्य सहयोगी उन्हें उत्तराखंड के एक फार्महाउस तक ले गए। वहां कुछ दिन गुप्त रूप से रहीं। देश में इस बीच गिरफ्तारियों का सिलसिला तेज हो चुका था। सत्ता विरोधी हर आवाज को दबाया जा रहा था। सरदार आंग्रे भी वहां पहुंच गए। सभी चाहते थे कि राजमाता कुछ समय और छिपी रहें, लेकिन उनका स्वभाव पलायन का नहीं था।

इंदिरा गांधी का आदेश- 'उन्हें तिहाड़ भेजो'

तीन-चार महीने बाद खबर दिल्ली पहुंची कि राजमाता पचमढ़ी में अपेक्षाकृत सहज हैं। इसके बाद उन्हें तिहाड़ जेल भेजने का आदेश हुआ। ट्रेन से दिल्ली लाया गया। इस बार ध्यानेन्द्र सिंह साथ नहीं जा सके। तिहाड़ पहुंचते ही राजमाता का नाम छिन गया। वे केवल 'कैदी नंबर 2265' बनकर रह गई.

तिहाड़ जहां राजमाता ने नरक देखा-अपनी आत्मकथा 'राजपथ से लोकपथ पर' और 'प्रिंसेज' में उन्होंने तिहाड़ जेल का भयावह चित्र खींचा है। कमरे से लगे शौचालय में पानी तक नहीं था। केवल एक गड्डा था, जिसे दिन में दो बार साफ किया जाता। बदबू इतनी तीखी थी कि सांस लेना कठिन हो जाता। रात में मच्छर, मक्खियां और कीड़े कमरे में भर जाते। वे लिखती हैं 'एक हाथ से खाना खाती थी और दूसरे हाथ से मक्खियां उड़ाती थी।

यहीं उनकी मुलाकात जयपुर की राजमाता गायत्री देवी से हुई। दो राजघरानों की महिलाएं, जो कभी वैभव का प्रतीक थीं, अब एक ही जेल की घुटन साझा कर रही थीं। जेल में एक खूंखार महिला कैदी अन्य बंदियों को आतंकित करती थी। गालियों और हिंसा के बीच राजमाता का आध्यात्मिक व्यक्तित्व अलग संसार रचता था। महिला कैदियां मनोरंजन के लिए फिल्मी गीत गाती थीं। राजमाता ने उनसे कहा- 'पहले भजन गाओ।' धीरे-धीरे जेल के भीतर भजन गूंजने लगे।

मौनी अमावस्या और मृत्यु का पूर्वाभास

ध्यानेन्द्र सिंह एक प्रसंग सुनाते हैं। मौनी अमावस्या पर संगम स्नान के दौरान राजमाता का संतुलन बिगड़ गया और वे बहने लगीं। ध्यानेन्द्र सिंह ने उन्हें संभाल लिया। बाद में उन्होंने कहा- 'ध्यानू, कितना शुभदिन था। इस दिन शरीर त्यागना कितना बडा सौभाग्य होता। वर्षों बाद उनका निधन भी मौनी अमावस्या के दिन ही हुआ। तड़‌के चार बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। बाहर रात और सुबह के बीच वही धुंधलका था, मानो इतिहास एक युग का शांत पटाक्षेप कर रहा हो।

 एक स्त्री, जो झुकी नहीं

राजमाता विजयाराजे सिंधिया की यह कथा केवल एक राजघराने की महिला की पीड़ा नहीं, बल्कि उस दौर का जीवंत दस्तावेज है जब असहमति को अपराध बना दिया गया था। तिहाड़ की सलाखें उनका स्वाभिमान कैद नहीं कर सकी। पचमढ़ी का एकांत उन्हें तोड़ नहीं सका। सता का भय उनके आत्मविश्वास को झुका नहीं पाया। वे अंत तक वहीं रहीं अडिग, आध्यात्मिक, तेजस्वी और अपने विचारों की कीमत चुकाने को सदैव तैयार।

पापड़ों में छिपे नोट

तिहाड़ में मिलने की अनुमति केवल उनकी बेटियों ऊषा राजे, वसुंधरा और यशोधरा तथा ध्यानेन्द्र सिंह को थी। ध्यानेन्द्र सिंह पापड़ों के बीच सौ-सौ रुपये के नोट छिपाकर ले जाते, ताकि राजमाता जरूरतमंद कैदियों और जेल कर्मचारियों की सहायता कर सकें। स्वयं कैद में रहते हुए भी उनका ध्यान दूसरों की सहायता पर था।

विरोधी, लेकिन सम्मानित राजनीतिक संघर्ष के बावजूद इंदिरा

गांधी भी राजमाता के साहस का सम्मान करती थीं। विष्व न्यायालय हेग के व्यायाधीश नागेंद्र सिंह ने जब उनसे कहा कि राजमाता को जेल में डालना गलत था, तब उन्होंने स्वीकार करते हुए कहा- 'कई राजघराने संपति बचाने के लिए झुक गए, लेकिन राजमाता सिंधिया नहीं झुकी। मैं उनके इस स्वाभिमान का सम्मान करती हूं।

नेपाल में माधवराव और बदला हुआ चेहरा

इसी दौरान माधवराव सिंधिया नेपाल में थे और परिवार की चिंता उन्हें लगातार बेचैन किए हुए थी। एक बार ध्यानेन्द्र सिंह उनसे मिलने पहुंचे। वहां टी-शर्ट और बढ़ी हुई मूंछों वाले एक युवक को देखकर वे उन्हें पहचान ही नहीं पाए। पास जाकर पता चला कि वह स्वयं माधवराव सिंधिया हैं। परिस्थितियों ने उनका रूप ही बदल दिया था। दोनों ने साथ भोजन किया। विदा होते समय माधवराव ने कुछ रुपये देते हुए कहा 'यशोधरा का ध्यान रखना और अम्मा से मिलते रहना।' इन शब्दों में एक पुत्र की मां के प्रति चिंता और परिवार के प्रति आत्मीयता झलक रही थी। माधवराव ने यह भी कहा कि वे पी.सी. सेठी से मिलकर सरदार आग्रे को यथासंभव जेल में ही रखने का आग्रह करें। हालांकि ध्यानेन्द्र सिंह ने उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए ऐसा कोई प्रयास नहीं किया। यह प्रसंग राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भी परिवार के मजबूत रिश्तों की झलक दिखाता है।

जयविलास की खुदाई और 'सांपों वाला तहखाना'

राजमाता को तोड़ने के लिए केवल जेल ही नहीं, उनके महलों तक को निशाना बनाया गया। जयविलास और अन्य परिसरों में तहखानों की खुदाई कराई गई। अफवाह थी कि वहां गुप्त खजाना छिया है। जब अधिकारी तहखाने तक पहुंचे तो कर्मचारियों ने बताया कि नीचे सांप हैं। सपेरा बुलाया गया, लेकिन लिखित जिम्मेदारी की बात आते ही वह पीछे हट गया। बाद में संग्रहालय तक में खुदाई करवाई गई। अंततः निकला केवल पानी का पाइप। खजाना नहीं मिला, लेकिन सत्ता का प्रतिशोध अवश्य उजागर हो गया। (जैसा पूर्व मंत्री ध्यानेन्द्र सिंह ने बताया)

'जो होगा देखा जाएगा, ग्वालियर चलो'

कुछ सप्ताह बाद उन्होंने कहा-'अब ग्वालियर चलो। जो होगा, देखा जाएगा।' ग्वालियर पहुंचते-पहुंचते देश का वातावरण पूरी तरह बदल चुका था। बड़े नेता जेलों में थे और जनता भयभीत। राजमाता ने स्वयं कहा- 'पुलिस को खबर कर दो। 'सभी को लगा कि गिरफ्तारी के विरोध में शहर उमड़ पड़ेगा, लेकिन आपातकाल का आतंक इतना गहरा था कि जयविलास के बाहर कोई नहीं आया। रात में पुलिस पहुंची। पहले सरदार आंग्रे को ले जाया गया, फिर लगभग दो बजे राजमाता को गिरफ्तार कर लिया गया। ध्यानेन्द्र सिंह भी उनके साथ रवाना हुए।

दतिया की भोर और पीताम्बरा पीठ

दतिया से गुजरते समय राजमाता ने धीमे स्वर में कहा 'ध्यानू, मेरी इच्छा है कि मांई और महाराज के दर्शन कर लूं।' काफिला पीताम्बरा पीठ पहुंचा। आश्रम में महाराज विश्राम कर रहे थे। गिरफ्तारी का समाचार सुनकर वे कुछ क्षण मौन रहे और फिर आशीर्वाद दिया। दृश्य अत्यंत मार्मिक था, एक ओर सत्ता की बंदूकें, दूसरी ओर देवी के चरणों में माथा टेकती राजमाता।

पचमढ़ी की कैदः बारिश और एकांत

झांसी, सागर और कई पड़ावों से होते हुए राजमाता को पचमढ़ी लाया गया। बैंसल लॉज को अस्थायी जेल बना दिया गया था। दिनभर बारिश होती रहती। चारों और धुंध और भीगे पेड़ों की गंध फैली रहती। जामुन के पेड़ों से घिरा वातावरण बाहर से शांत था, लेकिन भीतर अनिश्चितता और अकेलेपन का दबाव था। राजमाता पूजा-पाठ और वाल्मीकि रामायण के पाठ में समय बितातीं। वहीं

ध्यानेन्द्र सिंह धीरे-धीरे अवसाद में घिरने लगे। उनका विवाह हाल ही में हुआ था और तीन माह का पुत्र घर पर था। इसी दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश चंद्र सेठी की ओर से संदेश आया कि यदि राजमाता माफी मांग लें तो रास्ता निकल सकता है। जब यह राजमाता को बताई गई तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा- 'यह संभव नहीं है।' इस एक वाक्य में उनका समूचा स्वाभिमान समाया था।


 

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