वैश्विक नेताओं की विद्वता पर सवाल

अविश्वास और हास्यास्पद व्यवहार: वैश्विक नेताओं की विद्वता पर सवाल, पीएम नरेंद्र मोदी का संयमित रुख सर्वमान्य

डॉ राघवेंद्र शर्मा

अविश्वास और हास्यास्पद व्यवहार: वैश्विक नेताओं की विद्वता पर सवाल, पीएम नरेंद्र मोदी का संयमित रुख सर्वमान्य

 हमें कब कहां क्या बोलना चाहिए या नहीं बोलना चाहिए, या फिर हमें कब कहां क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए, यह सावधानी बड़े मायने रखती है। क्योंकि हमारे विद्वान कह गए हैं -
 बिना बेचारे जो करे सो पांछे से पछताय।
 काम बिगाड़े आपनो, जग में होत हंसाय।।

 अर्थात बिना विचार किये जो भी व्यक्ति कुछ कहता या करता है, वह खुद का काम तो बिगाड़ता ही है, साथ में हंसी का पात्र भी बनता है। आज यही हालत खुद को दुनिया का ठेकेदार मानने वाले देशों और वहां के कतिपय नेताओं की हो गई है। 

अमेरिका ने ईरान पर हमला क्यों बोला ? सब जानते हैं। इजरायली राष्ट्रपति बेंजामिन नेतन्याहू की दुश्मनी डोनाल्ड ट्रंप ने अपने ऊपर क्यों ली? यह भी सबको पता है। रूस यूक्रेन लंबे समय से क्यों एक दूसरे के दुश्मन बने हुए हैं, यह भी किसी से छुपा नहीं है। रह जाती है खाड़ी देशों की बात, तो वहां से भी अच्छे समाचार नहीं मिल रहे। आपस में एक दूसरे के ठिकानों पर बमबारी करने की मजबूरी देखने को मिल रही है। लेकिन वैश्विक और क्षेत्रीय कुछ नेताओं ने युद्ध से पहले और युद्ध के दौरान जो कहा और किया, उस कृत्य ने उनकी वैश्विक छवि को हास्यास्पद बना दिया है। मसलन - ईरान को बर्बाद कर देने के दावे करने के बावजूद ईरान का और ज्यादा आक्रामक होते चले जाना, यूरोपीय एकता की मिसाल कहे जाने वाले नाटो का हालातो से किनारा कर जाना, युद्ध में अपनी जमीन का दुरुपयोग ना होने देंगे संबंधी फ्रांस का दो टूक जवाब, सीज फायर की नौबत आन पड़ी तो एक ओर समझौते की बात करना फिर साथ में इस युद्ध में उलझे हुए देशों द्वारा एक दूसरे को खत्म करने की धमकी भी देते चले जाना, ऐसे मामले हैं जो उपरोक्त मामलों में विद्वता झाड़ रहे बड़बोले नेताओं की गंभीरता को कम करते हैं।  

नतीजा यह है कि विश्व समझ ही नहीं पा रहा, परस्पर एक दूसरे से जूझ रहे देश के नेताओं की कौन सी बात मानें और कौन सी नहीं। यानि असमय और हर वक्त मुंह चलाने की आदत ने शाब्दिक जुगाली करने के आदी नेताओं को अविश्वसनीय बना दिया है। हालत यह बन गए हैं कि एक देश का राष्ट्र अध्यक्ष दूसरे को गंभीरता से लेना ही नहीं चाहता। हालत ये हो गई कि कल जिन देशों को शत्रु राष्ट्र समझा जा रहा था अब उन का साथ बैठना दोनों की मजबूरी के रूप में देखा जा रहा है।  लेकिन जग हंसाई इस पर भी हो रही है कि नेता आपस में मिल रहे है। कैसे भी जंग समाप्त हो, इसके सच्चे झूठे रास्ते भी तलाश रहे हैं। लेकिन इसे अविश्वास की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा कि स्वयं को विश्व का ठेकेदार समझने वाले ऐसे वार्ताकार साझा प्रेस कांफ्रेंस करने की हिम्मत तक नहीं कर पा रहे । उससे भी ज्यादा अपमानजनक हालत यह बने कि एक राष्ट्र अध्यक्ष दूसरे राष्ट्र की यात्रा पर जा रहा है तो यजमान राष्ट्राध्यक्ष द्वारा प्रोटोकॉल के तहत आगंतुक अति विशिष्ट जन की सम्मानजनक अगवानी तक नहीं की जा रही ।

 कुल मिलाकर अमेरिका ईरान का सीज फायर संकट में है। हॉर्मुज स्ट्रेट का मामला सिर दर्द बना हुआ है। रूस यूक्रेन पहले की तरह ही मोर्चे पर डटे हुए हैं। किसी की ताइवान तो किसी की क्यूबा पर गंदी नजर है। जिन्हें खुद पर गुरुर था अब वो खुद चलकर उन देशों की यात्रा कर रहे हैं, जिन्हें कल तक शत्रु देश कहा जा रहा था। हद तो यह है कि शाब्दिक जुगलियों के लिए बदनाम हो चुके स्वयंभू विद्वानों को मध्यस्थता के लिए भी मिला तो पाकिस्तान। वह पाकिस्तान, जिसके बारे में कहा जाता है कि कल उसका अस्तित्व दुनिया के नक्शे पर रहेगा भी या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं है। क्योंकि पाकिस्तान खुद आतंकवाद को पाल पोसकर अपनी मौत का बंदोबस्त कर चुका है। 

बड़ा आश्चर्य होता है यह सोचकर कि हमारे देश के अनेक विपक्षी नेता काफी चिल्लपों इस बात पर मचा रहे थे कि इतना सब  हो रहा है, पर हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ नहीं बोल रहे। इस बात पर भी आपत्ति जताई गई कि बोलते भी हैं तो बेहद कम और अपने मतलब की बात करते हैं। अब जब पूरा वैश्विक परिदृश्य सामने है, तब ऐसे स्वयंभू ज्ञानियों को समझाना थोड़ा आसान प्रतीत होता है कि इस अशांति पूर्ण माहौल में अकारण मुंह चलाने वालों की कैसी दुर्दशा हो रही है? लेकिन एक हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, जो चुपचाप अपना कार्य करते चले जा रहे हैं। बड़बोले नेताओं के देश ईंधन से मेहरूम होकर बर्बादी की कगार पर हैं। जहां थोड़ा बहुत ईंधन है भी तो दाम दुगने चौगुने करने की लाचारी है। लेकिन भारत एकमात्र ऐसा देश है जो भारी हिंसा और युद्ध कालीन विभीषिकाओं के बीच भी शांति का टापू बना हुआ है। हमारे यहां डीजल पेट्रोल और रसोई गैस का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है।

कारण सिर्फ यही है कि हमारे नेता नरेंद्र मोदी दूसरों के मामले में अपनी टांग फंसाने का शौक नहीं रखते। और ना ही उन्हें यह मंजूर है कि कोई हमारे मामलों में अपनी नाक घुसेड़े। वे अमेरिका और इजरायल से बात करते हैं तो ईरान सहित अन्य खाड़ी देश का भी सम्मान बनाए रखते हैं। जहां भी बात करते हैं तो नेशन फर्स्ट की सोच आगे रखकर ही बेहद सधे हुए कदम बढ़ाते हैं। इसी परिपक्वता का परिणाम है कि प्रधानमंत्री मोदी हाल ही में जब 5 देशों की यात्रा पर गए तो हमेशा की तरह इस बार भी वहां के राष्ट्राध्यक्षों ने उनका बढ़-चढ़कर सम्मान किया। यहां तक कि उन्हें सर्वोच्च सम्मान से अलंकृत किए जाने की श्रृंखला लंबी होती रही। यही नहीं, उक्त देशों ने भारत के साथ आर्थिक, ऊर्जा, सुरक्षा और तकनीकी सहयोग के मामलों में बेहद प्रसन्नता के साथ अनुबंध किये।

इससे स्पष्ट हो जाता है कि वैश्विक स्तर पर भारत का दबदबा अन्य देशों की अपेक्षा ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में वर्तमान भारत की आवाज और उसकी अपेक्षाओं को गंभीरता से लिया जाता है। काश यह बात दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्षों के साथ-साथ हमारे देश के विपक्षी नेताओं की समझ में भी आ जाती!

डॉ राघवेंद्र शर्मा

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