कर्नाटक में 3 साल बाद खत्म हुई सीएम की जंग

Siddaramaiah vs DKS: 3 साल की खींचतान आखिर कैसे खत्म हुई? जानिए कर्नाटक की सत्ता का पूरा गेम

कर्नाटक में सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर चल रही तीन साल पुरानी खींचतान आखिर खत्म होती दिख रही है। जानिए 2023 से 2026 तक कब-क्या हुआ और कैसे बदला पूरा समीकरण।

Siddaramaiah vs DKS: 3 साल की खींचतान आखिर कैसे खत्म हुई? जानिए कर्नाटक की सत्ता का पूरा गेम

कर्नाटक की राजनीति में पिछले तीन साल से चल रही सबसे बड़ी लड़ाई अब अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के बीच सत्ता को लेकर जो खींचतान 2023 में शुरू हुई थी, वह अब 2026 में जाकर खत्म होती दिख रही है। कांग्रेस हाईकमान ने आखिरकार डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाने पर सहमति जता दी है।

दिलचस्प बात यह है कि यह बदलाव अचानक नहीं हुआ। इसके पीछे तीन साल की रणनीति, गुटबाजी, सामाजिक समीकरण और दिल्ली दरबार की लंबी राजनीति छिपी रही। यही वजह है कि कर्नाटक का यह सत्ता संघर्ष अब राष्ट्रीय राजनीति में भी चर्चा का विषय बन गया है।

2023 में कैसे शुरू हुई थी सीएम पद की लड़ाई?

दरअसल, मई 2023 में कांग्रेस ने कर्नाटक विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत दर्ज की थी। इसके बाद सबसे बड़ा सवाल यही था कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा? पार्टी के दो बड़े चेहरे सिद्धारमैया और प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार दोनों ही इस रेस में थे।

सिद्धारमैया ने अपने अनुभव और विधायकों के समर्थन को सबसे बड़ा आधार बताया। कहा गया कि 135 कांग्रेस विधायकों में से करीब 90 उनके साथ थे। वहीं डीके शिवकुमार ने चुनावी जीत का श्रेय और संगठन पर पकड़ को अपनी ताकत बताया।

आखिरकार कांग्रेस आलाकमान ने अनुभव पर भरोसा जताते हुए सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री बनाया, जबकि डीके शिवकुमार को डिप्टी सीएम पद दिया गया।

क्या सच में हुआ था ढाई-ढाई साल वाला समझौता?

यही सवाल पिछले तीन साल से कर्नाटक की राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। हालांकि कांग्रेस ने कभी आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं की, लेकिन लगातार यह दावा किया जाता रहा कि दोनों नेताओं के बीच ढाई-ढाई साल के फॉर्मूले पर सहमति बनी थी।

डीके शिवकुमार समर्थकों का कहना था कि उन्होंने इसी भरोसे पर उपमुख्यमंत्री पद स्वीकार किया था। जैसे-जैसे ढाई साल का समय करीब आया, वैसे-वैसे सत्ता परिवर्तन की मांग तेज होने लगी। हालांकि, इसी दौरान सिद्धारमैया ने अपनी राजनीतिक पकड़ लगातार मजबूत कर ली। उनका ओबीसी चेहरा होना, मुस्लिम और दलित वोट बैंक पर प्रभाव और विधायकों का समर्थन कांग्रेस नेतृत्व के लिए बड़ा फैक्टर बन गया।

सिद्धारमैया इतने मजबूत कैसे हो गए?

कर्नाटक की राजनीति में सिद्धारमैया सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि बड़ा सामाजिक समीकरण माने जाते हैं। खासकर AHINDA यानी अल्पसंख्यक, पिछड़े और दलित वर्गों में उनकी मजबूत पकड़ रही है।

यही वजह रही कि कांग्रेस आलाकमान भी उन्हें हटाने का जोखिम नहीं लेना चाहता था। पार्टी को डर था कि अगर अचानक नेतृत्व बदला गया तो उत्तर कर्नाटक और ओबीसी वोट बैंक में गलत संदेश जा सकता है। फिलहाल कांग्रेस के अंदर भी यह माना जाता रहा कि सिद्धारमैया का राजनीतिक कद और अनुभव डीके शिवकुमार से बड़ा है। ऐसे में सीएम पद पर उनकी पकड़ लगातार मजबूत बनी रही।

मई 2026 में आखिर ऐसा क्या हुआ?

अब समझिए असली टर्निंग पॉइंट। मई 2026 के आखिरी सप्ताह में दिल्ली में कांग्रेस हाईकमान की लगातार बैठकों ने पूरा समीकरण बदल दिया। 26 मई को सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार को दिल्ली बुलाया गया। राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और केसी वेणुगोपाल के साथ लंबी चर्चा हुई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रियंका गांधी ने भी नेतृत्व परिवर्तन के पक्ष में जोर दिया।

बताया गया कि सिद्धारमैया को दिल्ली में बड़ी राष्ट्रीय भूमिका और राज्यसभा सीट का प्रस्ताव दिया गया। वहीं उनके बेटे यतींद्र सिद्धारमैया को कैबिनेट में जगह देने पर भी चर्चा हुई। अगले दिन सिद्धारमैया गुट ने कुछ शर्तें रखीं। इनमें कई डिप्टी सीएम बनाने और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अपनी पसंद का नेता रखने जैसी मांगें शामिल थीं।

तीन दिन में कैसे साफ हो गया रास्ता?

28 मई की सुबह बेंगलुरु में हुई बैठक ने लगभग सारी तस्वीर साफ कर दी। सिद्धारमैया ने अपने करीबी मंत्रियों को बता दिया कि वह इस्तीफा देने जा रहे हैं। इसी दौरान सामने आई तस्वीरों में डीके शिवकुमार उन्हें पैर छूकर आशीर्वाद लेते नजर आए।

इसके बाद कांग्रेस नेताओं ने भी संकेत दे दिए कि हाईकमान का फैसला मान लिया गया है। मंत्री एचके पाटिल ने बताया कि सिद्धारमैया दोपहर में इस्तीफा देंगे। यानी जिस सत्ता संघर्ष ने तीन साल तक कर्नाटक कांग्रेस को अंदर ही अंदर उलझाए रखा, उसका समाधान आखिर सिर्फ तीन दिनों की बातचीत में निकल आया।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री बनने के बाद कांग्रेस को एकजुट रख पाएंगे, या कर्नाटक की राजनीति में सत्ता संतुलन की नई लड़ाई शुरू होगी?

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