Dowry Case: HC ने ससुराल पक्ष को दी राहत

Dowry Case में कर्नाटक हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बिना ठोस आरोप परिवार को घसीटना गलत

कर्नाटक हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न मामले में ससुराल पक्ष के तीन सदस्यों के खिलाफ कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने कहा- शादी के खर्चों को दहेज नहीं माना जा सकता।

By : स्वदेश डेस्क
Dowry Case में कर्नाटक हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बिना ठोस आरोप परिवार को घसीटना गलत

नई दिल्ली। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने दहेज उत्पीड़न से जुड़े एक अहम मामले में ससुराल पक्ष के तीन सदस्यों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना ठोस आरोपों के पूरे परिवार को मामले में घसीटना न्यायसंगत नहीं है। यह फैसला न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना की एकलपीठ ने सुनाया।

शादी के खर्चों को दहेज नहीं माना जा सकता

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि शिकायत और चार्जशीट में जिन बातों का उल्लेख किया गया है, वे मुख्य रूप से शादी के खर्चों से संबंधित हैं। इन्हें दहेज की मांग नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि शादी से पहले हुई चर्चाओं को बाद में दहेज की मांग में परिवर्तित नहीं किया जा सकता, खासकर जब उनके समर्थन में ठोस साक्ष्य न हों।

पूरे परिवार को आरोपी बनाना गलत

अदालत ने टिप्पणी की कि पति के पूरे परिवार को बिना किसी स्पष्ट भूमिका और प्रमाण के आरोपी बनाना उचित नहीं है। इस तरह के मामलों में आरोपों का विश्लेषण तथ्यों के आधार पर किया जाना जरूरी है।

2018 की शादी से जुड़ा मामला

यह मामला वर्ष 2018 में हुई एक शादी से जुड़ा है। शिकायतकर्ता महिला ने अपने पति, सास-ससुर और ननद पर दहेज उत्पीड़न और क्रूरता के आरोप लगाए थे। पुलिस ने सभी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। हालांकि, ससुराल पक्ष के तीन सदस्यों ने अदालत में याचिका दायर कर कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। पति के खिलाफ मामला अभी भी जारी रहेगा।

केवल 19 दिन साथ रहे दंपति

सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि दंपति शादी के बाद केवल 19 दिन ही साथ रहे थे। इसके बाद दोनों अलग हो गए। अदालत ने कहा कि आरोपों में अधिकतर बातें घरेलू मतभेद और सामान्य पारिवारिक विवाद की श्रेणी में आती हैं। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय उन मामलों में महत्वपूर्ण है, जहां दहेज कानूनों का दुरुपयोग होने की आशंका रहती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी भी आपराधिक मामले में आरोपों का आधार ठोस और प्रमाणिक होना चाहिए।

 

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