नई दिल्ली: वर्ष 2020 में भारत-चीन सीमा पर हुए तनाव को लेकर पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे का ताजा बयान से राजनीतिक में हलचन मच गई है। उन्होंने कहा कि उस समय केंद्र सरकार ने सेना को अकेला नहीं छोड़ा, बल्कि हर स्तर पर समर्थन दिया और आवश्यक निर्णय लेने की पूरी स्वतंत्रता भी दी। यह बयान ऐसे समय आया है जब राहुल गांधी लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि सरकार ने चीन के साथ गतिरोध के दौरान सेना को पर्याप्त समर्थन नहीं दिया।
सरकार ने दिया था ‘फ्री हैंड’
जनरल नरवणे ने एक इंटरव्यू में कहा कि सेना को जमीनी हालात के अनुसार कार्रवाई करने की पूरी छूट दी गई थी। उन्होंने कहा, “जो उचित समझो, वह करो” जैसे निर्देश सरकार के भरोसे को दर्शाते हैं। उनके अनुसार, हालात बिगड़ने पर सेना को कड़े कदम उठाने की भी अनुमति थी। उन्होंने इस मुद्दे को राजनीतिक विवाद से दूर रखने की अपील करते हुए कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।
‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ को लेकर विवाद
पूर्व सेना प्रमुख की प्रस्तावित किताब Four Stars of Destiny भी इस पूरे विवाद के केंद्र में है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस किताब में 2020 के भारत-चीन सीमा विवाद, सैन्य रणनीतियों और अग्निपथ योजना जैसे विषयों का जिक्र है। हालांकि, इस किताब को अभी तक आधिकारिक मंजूरी नहीं मिली है। इस पर नरवणे ने कहा कि यदि सरकार को कुछ हिस्से उपयुक्त नहीं लगे, तो वह उसका सम्मान करते हैं।
राहुल गांधी ने संसद में क्या कहा था
राहुल गांधी ने फरवरी में संसद के भीतर और बाहर इस किताब का हवाला देते हुए सरकार पर गंभीर आरोप लगाए थे। उनका दावा था कि प्रधानमंत्री ने सेना प्रमुख से कहा था—“जो उचित समझो, वह करो”, जिसे उन्होंने जिम्मेदारी से पीछे हटने के रूप में पेश किया।उन्होंने संसद परिसर में किताब की एक कथित कॉपी भी दिखाई थी और कहा था कि इसमें चीन के साथ झड़पों और अग्निवीर योजना की समीक्षा का उल्लेख है।
पब्लिशर का पक्ष और बढ़ता विवाद
किताब के प्रकाशक Penguin Random House India ने स्पष्ट किया कि यह पुस्तक अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है और इसका कोई भी हिस्सा सार्वजनिक रूप से जारी नहीं किया गया है। प्रकाशक के इस बयान के बाद विवाद और गहरा गया। राहुल गांधी ने इसके जवाब में कहा था कि या तो पूर्व सेना प्रमुख गलत जानकारी दे रहे हैं या फिर प्रकाशक।
भारत-चीन सीमा पर स्थिति पर क्या बोले नरवणे
जनरल नरवणे ने रेचिन ला और पैंगोंग त्सो क्षेत्र का जिक्र करते हुए कहा कि वहां दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने थीं, लेकिन भारतीय सेना ने स्थिति को नियंत्रित रखा और अपने रणनीतिक उद्देश्यों को हासिल किया।अग्निपथ योजना को लेकर उन्होंने कहा कि किसी भी नई नीति पर चर्चा स्वाभाविक है। उन्होंने बताया कि उन्होंने भी अपने विचार स्पष्ट रूप से रखे थे, लेकिन एक बार निर्णय हो जाने के बाद उसे लागू करना सेना की जिम्मेदारी होती है।
राजनीतिक बनाम सैन्य दृष्टिकोण
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर राजनीतिक और सैन्य दृष्टिकोण के बीच अंतर को उजागर किया है। जहां एक ओर विपक्ष सरकार की भूमिका पर सवाल उठा रहा है, वहीं सैन्य नेतृत्व का बयान सरकार के समर्थन की पुष्टि करता नजर आता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत-चीन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर तथ्य आधारित और संतुलित चर्चा जरूरी है, ताकि राष्ट्रीय हित सर्वोपरि बना रहे।