कूटनीतिक समझौतों के बीच जब परमाणु सुरक्षा जैसे मुद्दे सामने आते हैं तो बातचीत सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि भरोसे की असली परीक्षा शुरू हो जाती है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर इसी तरह की नई टकराहट एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिखाई दे रही है, जहां एक तरफ निगरानी एजेंसी अपने अधिकारों पर जोर दे रही है और दूसरी तरफ तेहरान अपनी सीमाएं तय कर रहा है।
इस बहस के केंद्र में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के प्रमुख राफेल मारियानो ग्रॉसी का बयान है। उन्होंने साफ संकेत दिया है कि ईरान के न्यूक्लियर एनरिचमेंट साइट्स का निरीक्षण उनकी टीम जल्द ही करेगी। यह निरीक्षण अमेरिका और ईरान के बीच हुए अंतरिम समझौते का अहम हिस्सा माना जा रहा है, लेकिन ईरान की ओर से इसे लेकर अभी भी संशय और आपत्तियां बनी हुई हैं।
निगरानी और संप्रभुता के बीच तनाव
ग्रॉसी ने जापान के फुकुशिमा दाइची परमाणु संयंत्र में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि समझौता ज्ञापन में स्पष्ट है कि परमाणु सामग्री और सुविधाओं की निगरानी IAEA करेगी। उनके मुताबिक निरीक्षण का समय भले अलग हो सकता है, लेकिन यह प्रक्रिया टाली नहीं जा सकती। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब ईरान और अमेरिका के बीच समझौते की व्याख्या को लेकर मतभेद सामने आ रहे हैं। ईरान की ओर से हालांकि इस प्रक्रिया पर आपत्ति जताई गई है। तेहरान का कहना है कि बमबारी से प्रभावित परमाणु स्थलों तक संयुक्त राष्ट्र निरीक्षकों की पहुंच को लेकर कोई अंतिम योजना नहीं बनी है। इससे संकेत मिलता है कि निगरानी और संप्रभुता का टकराव अभी भी खुला हुआ है।
युद्ध के बाद बिखरी परमाणु तस्वीर
साल 2025 में इजराइल और ईरान के बीच 12 दिनों तक चले संघर्ष के दौरान परमाणु स्थलों को निशाना बनाया गया था। बाद में अमेरिका ने भी फोर्दो, नतांज और इस्फहान जैसी प्रमुख सुविधाओं पर बमबारी की थी। इन घटनाओं के बाद ईरान ने IAEA की पहुंच सीमित कर दी थी, जिससे उसके परमाणु कार्यक्रम की वास्तविक स्थिति को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई। विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान के पास मौजूद उच्च संवर्धित यूरेनियम की मात्रा इतनी है कि सैद्धांतिक रूप से इससे कई परमाणु हथियार तैयार किए जा सकते हैं। यही कारण है कि इन स्थलों का निरीक्षण वैश्विक सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यूरेनियम और भरोसे का संकट
ईरान लंबे समय से यह दावा करता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। हालांकि 60 प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम का भंडार और वेपन्स प्रोग्राम की अनुपस्थिति के बावजूद पारदर्शिता की कमी अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बनी हुई है। IAEA अब तक यह पुष्टि नहीं कर पाया है कि ईरान के भंडार और सेंट्रीफ्यूज मशीनों की वास्तविक स्थिति क्या है। इस बीच अमेरिका और ईरान के बीच 23 जून को दिए गए विरोधाभासी बयानों ने स्थिति को और उलझा दिया। वॉशिंगटन ने दावा किया कि ईरान ने निरीक्षण की अनुमति दी है, जबकि तेहरान ने इसे पूरी तरह खारिज कर दिया।
डाउनब्लेंडिंग की शर्त और बढ़ती निगरानी
समझौते के तहत एक अहम बिंदु ईरान के उच्च संवर्धित यूरेनियम को कम स्तर पर लाने यानी 'डाउनब्लेंड' करने से जुड़ा है। यही वह प्रक्रिया है जिस पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें टिकी हैं। IAEA का मानना है कि बिना ऑनसाइट निरीक्षण के इस प्रक्रिया की पुष्टि संभव नहीं है। IAEA प्रमुख के बयान ने स्पष्ट कर दिया है कि एजेंसी अपनी भूमिका से पीछे नहीं हटेगी। हालांकि ईरान की ओर से अब तक कोई नई प्रतिक्रिया नहीं आई है, जिससे यह संकेत मिलता है कि आने वाले दिनों में यह विवाद और गहरा सकता है।
गुप्त स्थानांतरण की आशंका और अगला चरण
परमाणु विशेषज्ञों को आशंका है कि यदि पारदर्शिता नहीं बनी रही तो ईरान अपने संवर्धित यूरेनियम को गुप्त स्थानों पर स्थानांतरित कर सकता है। यही चिंता IAEA और पश्चिमी देशों को लगातार सताए हुए है। इस बीच एजेंसी को कुछ सीमित स्थलों जैसे बुशेहर परमाणु संयंत्र तक पहुंच मिली है, लेकिन मुख्य संवर्धन केंद्र अब भी निगरानी से बाहर हैं। अब पूरी स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि ईरान और IAEA के बीच सहयोग किस दिशा में आगे बढ़ता है। यदि निरीक्षण शुरू होता है तो यह वैश्विक परमाणु कूटनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ होगा, लेकिन अगर गतिरोध बढ़ता है तो यह पश्चिम एशिया में पहले से मौजूद तनाव को और गहरा कर सकता है।