कूटनीति के गलियारों में कभी-कभी समझौते कागज पर कम और बयानों में ज्यादा लड़ते नजर आते हैं। अमेरिका और ईरान के बीच हुआ ताजा समझौता भी अब उसी बहस में फंस गया है, जहां एक ही डील के तीन अलग-अलग सच सामने रखे जा रहे हैं। वॉशिंगटन इसे दबाव की जीत बता रहा है, तो तेहरान इसे अपनी रणनीतिक शर्तों की सफलता के तौर पर पेश कर रहा है, जबकि बीच में पश्चिम एशिया का तनाव पहले से ज्यादा उलझता दिख रहा है।
इस विवाद की शुरुआत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के उस दावे से हुई, जिसमें उन्होंने कहा कि ईरान कई दशकों में पहली बार अमेरिका और उसके नेतृत्व के प्रति सम्मान दिखा रहा है और लगभग सभी शर्तें मानने की स्थिति में है। वहीं ईरान के शीर्ष नेतृत्व से लेकर आर्थिक और सैन्य हलकों तक अलग-अलग बयान सामने आ रहे हैं, जो न सिर्फ समझौते की व्याख्या बदलते हैं, बल्कि इस पूरे समझौते को एक नए भू-राजनीतिक संघर्ष की तरह पेश करते हैं।
बयानों से बढ़ी सियासी जंग
डोनाल्ड ट्रम्प ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि ईरान इस समय कमजोर स्थिति में है और समझौते के लिए लगभग हर शर्त मानने को तैयार हो गया है। ट्रम्प का यह बयान अमेरिकी घरेलू राजनीति से भी जुड़ा माना जा रहा है, जहां विदेश नीति की उपलब्धियां हमेशा चुनावी विमर्श का हिस्सा बनती रही हैं।
तेहरान ने खारिज किया दबाव का दावा
ईरानी संसद अध्यक्ष बाघेर गालिबाफ ने अजरबैजान में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान ट्रम्प के दावों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि तथाकथित इस्लामाबाद समझौता अंततः अमेरिका की हार साबित हुआ है। उनके मुताबिक ईरान ने किसी दबाव में झुकने के बजाय अपनी शर्तों और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए सहमति दी।
अर्थव्यवस्था को राहत की उम्मीद
समझौते के बाद ईरान आर्थिक मोर्चे पर भी सकारात्मक संकेत देने की कोशिश कर रहा है। सेंट्रल बैंक के गवर्नर अब्दोलनासेर हेम्मती ने कहा कि अमेरिका से मिली हालिया छूट और विदेशों में फंसी ईरानी संपत्तियों तक पहुंच बढ़ने से विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होगा। उन्होंने बताया कि पहले चरण में 2 अरब डॉलर बाजार में जारी किए जाएंगे, जिससे जरूरी वस्तुओं और कच्चे माल के आयात पर दबाव कम हो सकता है।
परमाणु कार्यक्रम पर सख्त रुख
हालांकि समझौते के बावजूद ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर कोई नरमी नहीं दिखाई है। उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी IAEA को परमाणु ठिकानों तक पहुंच तभी मिलेगी जब अमेरिका सभी प्रतिबंध हटाने और अंतिम समझौते को लागू करने की प्रक्रिया पूरी करेगा। इससे साफ है कि परमाणु निगरानी का मुद्दा अभी भी दोनों देशों के बीच सबसे जटिल विषय बना हुआ है।
क्षेत्रीय तनाव अब भी बरकरार
इसी बीच इजराइल के विदेश मंत्री गिदोन सार ने दावा किया कि मार्च से अब तक हिजबुल्लाह ने 7,000 से अधिक रॉकेट, मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। इजराइल का कहना है कि ईरान समर्थित संगठन क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ा रहे हैं। ऐसे में अमेरिका-ईरान समझौते के बावजूद पश्चिम एशिया में सुरक्षा चुनौतियां खत्म होती नहीं दिख रहीं।
अंतिम मसौदे पर थी सर्वोच्च निगरानी
ईरानी सांसद अब्दोलहोसैन रूहोलअमीनी ने दावा किया कि समझौता ज्ञापन के मसौदे की सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई ने कम से कम 25 बार समीक्षा की थी। यह बयान बताता है कि तेहरान इस समझौते को केवल कूटनीतिक दस्तावेज नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक निर्णय के रूप में पेश कर रहा है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि प्रतिबंधों में राहत, परमाणु निरीक्षण और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर दोनों पक्ष कितनी तेजी से आगे बढ़ते हैं, क्योंकि इन्हीं पर इस समझौते की वास्तविक सफलता तय होगी।