Trump Iran Deal Birthday Wait

ट्रंप के जन्मदिन पर अटका सबसे बड़ा दांव, क्या ईरान डील बनेगी या बढ़ेगा दबाव?

डोनाल्ड ट्रंप को अपने जन्मदिन पर ईरान शांति समझौते की उम्मीद थी, लेकिन डील अब भी अधर में है। बढ़ती शर्तें, राजनीतिक दबाव और कूटनीतिक चुनौतियां नए सवाल खड़े कर रही हैं।

ट्रंप के जन्मदिन पर अटका सबसे बड़ा दांव, क्या ईरान डील बनेगी या बढ़ेगा दबाव?

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए इस बार जन्मदिन सिर्फ निजी जश्न का दिन नहीं है। उनकी नजर उस समझौते पर टिकी हुई है जिसे वह पिछले कई महीनों से अपनी बड़ी कूटनीतिक सफलता के तौर पर पेश करते रहे हैं। ईरान के साथ संभावित शांति समझौते को लेकर व्हाइट हाउस में लगातार उम्मीद जताई गई, लेकिन तय समय तक दस्तखत नहीं हो सके। ट्रंप ने कई बार दावा किया कि बातचीत अंतिम चरण में पहुंच चुकी है और दोनों पक्ष अधिकांश मुद्दों पर सहमत हैं। यही वजह है कि उनके 80वें जन्मदिन के आसपास किसी बड़े ऐलान की संभावना जताई जा रही थी। हालांकि हालात अब भी स्पष्ट नहीं हैं और समझौता कागज से आगे नहीं बढ़ पाया है।

इस देरी ने सिर्फ विदेश नीति नहीं बल्कि ट्रंप की राजनीतिक विश्वसनीयता को भी बहस के केंद्र में ला दिया है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या समझौता वास्तव में करीब था या फिर उम्मीदों को जरूरत से ज्यादा आगे बढ़ा दिया गया था।

ट्रंप के दावों और जमीनी स्थिति में अंतर

मार्च से लेकर जून तक ट्रंप लगातार यह कहते रहे कि ईरान के साथ बातचीत सकारात्मक दिशा में बढ़ रही है। व्हाइट हाउस की तरफ से भी संकेत दिए गए कि जल्द ही कोई बड़ा परिणाम सामने आ सकता है। हालांकि युद्धविराम जैसे सीमित कदमों के बावजूद ऐसा कोई औपचारिक समझौता सामने नहीं आया जो दोनों देशों के बीच लंबे समय की स्थिरता की गारंटी दे सके। अब आलोचक इसी अंतर को ट्रंप के दावों और वास्तविक प्रगति के बीच की दूरी के रूप में देख रहे हैं।

बातचीत से धमकियों तक पहुंचा मामला

पिछले कुछ दिनों में अमेरिकी रुख पहले की तुलना में अधिक सख्त दिखाई दिया। ट्रंप ने सार्वजनिक तौर पर ईरान पर कार्रवाई में देरी का आरोप लगाया और चेतावनी दी कि समझौता न होने की स्थिति में गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं। अमेरिकी प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों के बयान भी संकेत देते रहे कि कूटनीति के साथ सैन्य विकल्पों को पूरी तरह खारिज नहीं किया गया है। इससे यह धारणा मजबूत हुई कि बातचीत के समानांतर दबाव की रणनीति भी अपनाई जा रही है।

ईरान की शर्तों ने क्यों बढ़ाई मुश्किल

भले ही तेहरान ने बातचीत को पूरी तरह नकारा नहीं है, लेकिन उसकी कुछ प्रमुख मांगें समझौते को जटिल बना रही हैं। क्षेत्रीय सुरक्षा, इजरायल की भूमिका, लेबनान से जुड़ी स्थितियां और होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण जैसे मुद्दों पर ईरान अपने रुख में नरमी दिखाने को तैयार नजर नहीं आता। यही कारण है कि ट्रंप जिस समझौते को लगभग तय मान रहे थे, उसके सामने अब भी कई राजनीतिक और रणनीतिक बाधाएं मौजूद हैं।

पुराने अमेरिकी अनुभव से हो रही तुलना

वॉशिंगटन के राजनीतिक गलियारों में इस पूरे घटनाक्रम की तुलना पूर्व राष्ट्रपति जिमी कार्टर के दौर से भी की जा रही है। 1979 के ईरान बंधक संकट के दौरान कार्टर को लंबे समय तक कूटनीतिक दबाव झेलना पड़ा था और समाधान उनके कार्यकाल के अंत तक नहीं निकल सका। विश्लेषकों का मानना है कि यदि ट्रंप बार-बार आश्वासन देने के बाद भी समझौते तक नहीं पहुंच पाते हैं तो विपक्ष इसे उनकी बड़ी राजनीतिक असफलता के रूप में पेश कर सकता है।

समझौता हुआ तब भी खत्म नहीं होंगे सवाल

मान लें कि आने वाले दिनों में समझौते पर हस्ताक्षर हो जाते हैं, तब भी चुनौतियां खत्म नहीं होंगी। सबसे बड़ा प्रश्न यह रहेगा कि क्या ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर नई सीमाओं को व्यवहारिक रूप से स्वीकार करेगा। दूसरी तरफ इजरायल की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर उसके अपने अलग हित हैं। इसके अलावा समझौते की स्थिरता और लंबे समय तक उसके पालन को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निगाहें बनी रहेंगी।

ट्रंप के लिए साख की परीक्षा

यह मामला अब केवल अमेरिका और ईरान के रिश्तों तक सीमित नहीं रह गया है। बढ़ती महंगाई, व्यापारिक तनाव, युद्ध की लागत और घटती लोकप्रियता जैसे मुद्दों के बीच ट्रंप के लिए यह समझौता राजनीतिक संदेश का भी माध्यम बन चुका है। यदि डील सफल होती है तो वह इसे अपनी बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश कर सकते हैं, लेकिन देरी या विफलता की स्थिति में विपक्ष को उनके दावों पर सवाल उठाने का नया मौका मिलेगा। फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर है कि महीनों से चर्चा में रही यह डील आखिरकार हकीकत बनती है या फिर इंतजार और लंबा खिंचता है।

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