इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हरीश चंद्र रिसर्च इंस्टीट्यूट के खगोल भौतिकी वैज्ञानिक डॉ. तपस कुमार दास के खिलाफ यौन उत्पीड़न मामले में बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि आंतरिक शिकायत समिति (ICC) ने जांच के दौरान POSH कानून और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का सही तरीके से पालन नहीं किया।
न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने अपने फैसले में कहा कि जांच प्रक्रिया में गंभीर खामियां थीं। अदालत के अनुसार, शिकायतकर्ताओं के बयान दर्ज किए जाने का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं था। आरोपी प्रोफेसर को जिरह या मौखिक सुनवाई का पर्याप्त अवसर भी नहीं दिया गया।
क्या हैं डॉ. तपस कुमार दास पर आरोप?
मामला एचआरआई के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. तपस कुमार दास से जुड़ा है, जिन्हें ब्लैक होल और एनालॉग ग्रैविटी के क्षेत्र का विशेषज्ञ माना जाता है। उनके खिलाफ पीएचडी छात्राओं और महिला शोधार्थियों ने कई गंभीर आरोप लगाए थे। शिकायतों में देर रात ऑफिस बुलाना, आपत्तिजनक संदेश भेजना, अश्लील सामग्री साझा करना, यौन टिप्पणियां करना और अवांछित शारीरिक संपर्क जैसे आरोप शामिल थे। इन शिकायतों के बाद ICC ने जांच शुरू की थी।
ICC ने बताया था ‘सीरियल हैरेसर’
आंतरिक शिकायत समिति ने अपनी रिपोर्ट में डॉ. दास को “सीरियल हैरेसर” बताया था। समिति ने कहा था कि उन्होंने लंबे समय तक अपने पद और प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए छात्राओं का मानसिक और यौन उत्पीड़न किया। ICC ने वेतनवृद्धि रोकने, पदोन्नति पर रोक लगाने, छह महीने के निलंबन और महिला शोधार्थियों को उनके अधीन काम करने से रोकने जैसी सिफारिशें की थीं। इसके बाद जुलाई 2017 में संस्थान की गवर्निंग काउंसिल ने डॉ. दास को दंडित करते हुए महिला छात्रों का मार्गदर्शन करने पर रोक लगा दी थी।
हाईकोर्ट ने जांच प्रक्रिया पर उठाए सवाल
डॉ. दास ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा कि शिकायतें कथित घटनाओं के कई साल बाद दर्ज की गईं। उन्होंने POSH Act की धारा 9 का हवाला देते हुए कहा कि शिकायतें सामान्यतः तीन महीने के भीतर दर्ज होनी चाहिए।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि शिकायतों में घटनाओं की स्पष्ट तारीखें नहीं थीं और पूरी जांच एकतरफा तरीके से की गई। अदालत ने माना कि आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और प्रथम दृष्टया यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आते हैं, लेकिन जांच प्रक्रिया कानून के अनुरूप होना जरूरी है।
देरी हर मामले में शिकायत खारिज करने का आधार नहीं
अदालत ने कहा कि यौन उत्पीड़न के मामलों में देरी को हर स्थिति में शिकायत खारिज करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने माना कि कई बार छात्राएं या अधीनस्थ महिलाएं करियर प्रभावित होने के डर से तुरंत शिकायत नहीं कर पातीं।
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ICC को पहले यह तय करना होगा कि शिकायतें समयसीमा के भीतर हैं या देरी के पीछे पर्याप्त कारण मौजूद हैं। इसके लिए कारणयुक्त आदेश पारित करना आवश्यक होगा।
आठ सप्ताह में नई जांच के निर्देश
हाईकोर्ट ने 9 जुलाई 2017 के दंड आदेश को रद्द करते हुए ICC को सभी शिकायतों पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि समिति को शिकायतों की तारीख, कथित घटनाओं की समयावधि और देरी के कारणों की विस्तृत जांच करनी होगी।
यदि ICC आगे जांच जारी रखने का फैसला करती है, तो उसे POSH कानून और निर्धारित नियमों का पूरी तरह पालन करना होगा। कोर्ट ने समिति को आठ सप्ताह के भीतर नया निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं।