Everest Climber Amita Srivas

एवरेस्ट से लौटते वक्त मौत से हुई आमने-सामने मुलाकात, अमिता श्रीवास ने सुनाई डेथ जोन की कहानी

माउंट एवरेस्ट फतह करने के बाद लौटते समय अमिता श्रीवास ने डेथ जोन में अपने दो साथियों को खो दिया। फ्रास्टबाइट से जूझ रहीं पर्वतारोही ने मौत के करीब के उन खौफनाक पलों को साझा किया।

एवरेस्ट से लौटते वक्त मौत से हुई आमने-सामने मुलाकात, अमिता श्रीवास ने सुनाई डेथ जोन की कहानी

Amita Shrivas News

छत्तीसगढ़ की पर्वतारोही अमिता श्रीवास ने 22 मई को माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराकर इतिहास रचा, लेकिन यह सफर सिर्फ जीत की कहानी नहीं रहा। दुनिया की सबसे ऊंची चोटी से लौटते समय उन्हें खराब मौसम, ऑक्सीजन की कमी और डेथ जोन के खतरनाक हालात का सामना करना पड़ा। इसी दौरान उनकी आंखों के सामने दो साथियों की मौत हो गई।

गंभीर फ्रास्टबाइट की हालत में अमिता को काठमांडू के नारविक इंटरनेशनल हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है। अस्पताल से बातचीत में उन्होंने बताया कि एवरेस्ट की चढ़ाई से ज्यादा डरावना उसका वापसी का सफर था। उनकी कहानी सिर्फ एक पर्वतारोही की उपलब्धि नहीं, बल्कि उस मानसिक और शारीरिक संघर्ष की तस्वीर भी है, जो एवरेस्ट जैसी चुनौती के पीछे छिपा होता है।

आठ साल की तैयारी के बाद पूरा हुआ सपना

अमिता श्रीवास ने बताया कि माउंट एवरेस्ट तक पहुंचना उनका कई साल पुराना सपना था। साल 2016 में उन्होंने तय कर लिया था कि एक दिन दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर तिरंगा जरूर फहराएंगी। इसके लिए उन्होंने लगातार आठ साल तक कठिन ट्रेनिंग की। रोज सुबह साढ़े तीन बजे उठकर अभ्यास करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया था। उन्होंने कहा कि उनकी तैयारी का असर पूरे परिवार की जिंदगी पर पड़ा, लेकिन परिवार ने हर कदम पर उनका साथ दिया।

साधारण परिवार से आने वाली अमिता ने माना कि एवरेस्ट अभियान का खर्च उठाना आसान नहीं था। उन्होंने बताया कि जिला प्रशासन और छत्तीसगढ़ सरकार के सहयोग के बिना यह मिशन पूरा कर पाना संभव नहीं था।

डेथ जोन में टूटता हौसला और आंखों के सामने मौत

एवरेस्ट से लौटते समय हालात तेजी से बिगड़ने लगे। मौसम खराब हुआ और ऑक्सीजन का स्तर कम होने लगा। अमिता के मुताबिक उसी दौरान उनके साथ मौजूद दो पर्वतारोहियों अरुण तिवारी और संदीप आरे की मौत हो गई। उन्होंने बताया कि सफर के दौरान कई शव पहले भी दिखाई दिए थे, लेकिन जिन लोगों के साथ 40 दिनों तक वक्त बिताया हो, उनकी मौत सामने देखना सबसे ज्यादा डराने वाला अनुभव था। इस घटना ने पूरे दल को मानसिक रूप से झकझोर दिया। अमिता ने कहा कि डेथ जोन में शरीर के साथ दिमाग भी काम करना बंद करने लगता है। वहां हर कदम जिंदगी और मौत के बीच संतुलन जैसा महसूस होता है।

माइनस 40 डिग्री में मेडिटेशन बना सहारा

एवरेस्ट पर माइनस 40 डिग्री तक गिरते तापमान और तेज हवाओं के बीच खुद को संभालना सबसे बड़ी चुनौती थी। अमिता के मुताबिक ऐसी परिस्थितियों में सिर्फ शारीरिक ताकत काफी नहीं होती। उन्होंने बताया कि मेडिटेशन ने उन्हें मानसिक रूप से स्थिर बनाए रखने में सबसे ज्यादा मदद की। जब हालात पूरी तरह नियंत्रण से बाहर लगते हैं, तब शांत दिमाग ही सबसे बड़ा हथियार बनता है। फ्रास्टबाइट की वजह से उनकी तबीयत बिगड़ गई, लेकिन अब उनकी हालत में सुधार बताया जा रहा है।

अस्पताल में याद आ रहा घर का खाना

करीब डेढ़ महीने से नेपाल में रह रहीं अमिता ने कहा कि अब उन्हें अपने घर और छत्तीसगढ़ के खाने की सबसे ज्यादा याद आ रही है। उन्होंने हंसते हुए कहा कि भजिया-कढ़ी, मखना भाजी और चीला-चटनी खाने का बहुत मन कर रहा है। लंबे समय तक सख्त डाइट और एक जैसा खाना खाने के बाद अब उन्हें घर लौटने का इंतजार है।

बेटियों को रोकिए मत, भरोसा दीजिए

अमिता श्रीवास ने अपनी सफलता का बड़ा संदेश बेटियों और उनके माता-पिता के लिए भी दिया। उन्होंने कहा कि अक्सर लड़कियों को बड़े सपने देखने से रोका जाता है। लेकिन उन्हें सिर्फ भरोसे और अवसर की जरूरत होती है। उन्होंने कहा कि माता-पिता बेटों की तरह बेटियों पर भी विश्वास करें। वहीं, लड़कियों की जिम्मेदारी है कि वे उस भरोसे को मजबूत बनाएं। अमिता ने युवाओं से कहा कि सपनों को दूसरों के भरोसे छोड़ने के बजाय खुद उन्हें जीने की हिम्मत करनी चाहिए।

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