HC says Tribals covered under Hindu Marriage Act

हाई कोर्ट का अहम फैसला: हिंदू रीति अपनाने वाले आदिवासी भी हिंदू विवाह अधिनियम के दायरे में

By : Admin
हाई कोर्ट का अहम फैसला: हिंदू रीति अपनाने वाले आदिवासी भी हिंदू विवाह अधिनियम के दायरे में

Bilaspur High Court Decision

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय के लोग हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार विवाह करते हैं, तो उन्हें हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के प्रावधानों से बाहर नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह टिप्पणी करते हुए जगदलपुर के फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया।

दरअसल, फैमिली कोर्ट ने पति-पत्नी की आपसी सहमति से तलाक की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि हिंदू विवाह अधिनियम अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होता। हाई कोर्ट ने इस फैसले को कानूनी रूप से गलत मानते हुए हस्तक्षेप किया।

डिवीजन बेंच ने पलटा फैमिली कोर्ट का आदेश

यह फैसला जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने सुनाया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि कोई व्यक्ति अनुसूचित जनजाति से है, लेकिन उसका विवाह और पारिवारिक जीवन हिंदू परंपराओं के अनुसार चलता है, तो उसे इस अधिनियम के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। 

न्यायालय ने साफ कहा कि केवल जाति के आधार पर कानून के दायरे से बाहर करना उचित नहीं है, खासकर तब जब व्यवहार और परंपरा हिंदू रीति-रिवाजों से जुड़ी हो।

आपसी सहमति से तलाक की याचिका

मामले में पति-पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के तहत आपसी सहमति से तलाक की याचिका दायर की थी। यह याचिका जगदलपुर स्थित पारिवारिक न्यायालय में लगाई गई थी। दंपती की शादी को करीब 20 साल हो चुके हैं और दोनों लंबे समय से अलग रह रहे हैं। इसलिए उन्होंने आपसी सहमति से विवाह विच्छेद का रास्ता चुना।

फैमिली कोर्ट ने क्यों खारिज की थी याचिका

जगदलपुर फैमिली कोर्ट ने 12 अगस्त 2022 को यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि हिंदू विवाह अधिनियम 1955 अनुसूचित जनजातियों पर तब तक लागू नहीं होता, जब तक केंद्र सरकार इसके लिए कोई अधिसूचना जारी न करे। अदालत ने अधिनियम की धारा-2 का हवाला देते हुए यह निर्णय दिया था। इसी फैसले को बाद में हाई कोर्ट में चुनौती दी गई।

क्या है पूरा मामला

मामले के अनुसार, बस्तर जिले का रहने वाला पति अनुसूचित जनजाति समुदाय से है, जबकि पत्नी अनुसूचित जाति से आती है। दोनों की शादी 15 अप्रैल 2009 को हुई थी। शादी के दो साल बाद 28 दिसंबर 2011 को उन्हें एक बेटा हुआ, जो फिलहाल मां के साथ रह रहा है। दंपती के बीच मतभेद बढ़ने के बाद 6 अप्रैल 2014 से दोनों अलग रहने लगे। इसके बाद उन्होंने आपसी सहमति से तलाक लेने के लिए फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी। हाई कोर्ट के इस फैसले को कानूनी विशेषज्ञ एक अहम मिसाल मान रहे हैं, क्योंकि इससे भविष्य में ऐसे कई मामलों में स्पष्टता मिल सकती है।