मध्य प्रदेश के धार जिले की भोजशाला सिर्फ एक ऐतिहासिक इमारत नहीं, बल्कि सदियों से धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक आस्था का केंद्र रही है। हाईकोर्ट के फैसले के बाद एक बार फिर यह स्थल चर्चा में आ गया है, लेकिन क्या आप जानते हैं इसका इतिहासिक वैभव क्या है और इसे कब विवाद में खींचा गया, आखिर शुरू कैसे हुआ?
परमार काल की पहचान
दरअसल, भोजशाला का उल्लेख 11वीं शताब्दी से मिलता है और इसे परमार वंश के काल से जोड़ा जाता है। यह स्थान विद्या और सरस्वती पूजा का प्रमुख केंद्र था। इतिहासकारों के अनुसार भोजशाला का संबंध परमार वंश के राजा भोज से है। कहा जाता है कि धार उस समय शिक्षा और कला का बड़ा केंद्र था और भोजशाला को संस्कृत अध्ययन एवं सरस्वती उपासना का स्थान माना जाता था। ब्रिटिश काल के रिकॉर्ड और कई शोध पत्रों में भी इस बात का जिक्र मिलता है कि यहां संस्कृत शिलालेख और विद्या से जुड़े प्रमाण पाए गए। यही कारण है कि इसे विद्या का केंद्र कहा जाता रहा है।
भोजशाला का इतिहास?
स्थापना
- 1034: परमार वंश के राजा भोज ने भोजशाला की स्थापना की, जिन्हें 72 कलाओं का ज्ञाता माना जाता था। यह एक भव्य आवासीय संस्कृत विश्वविद्यालय था, जिसकी तुलना नालंदा-तक्षशिला से होती थी।
- 1035: देशभर के राजाओं की मौजूदगी में बसंत पंचमी के दिन 40 दिन के यज्ञ के साथ मंदिर के गर्भगृह में मकराना संगमरमर की गढ़ी मां सरस्वती की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की गई।
- 1035-1306: कालिदास, भवभूति, भारवि भट्ट, धनपाल, मातृगुप्त और बाणभट्ट जैसे महान विद्वानों ने यहां अध्ययन और अध्यापन किया।
इस्लामी शासन
- 1269: अरब मूल के कमाल मौलाना धार आकर बसे। वे निजामुद्दीन औलिया के अनुयायी थे।
- 1305: अलाउद्दीन खिलजी ने इस क्षेत्र पर कब्जा किया। इस दौरान भोजशाला समेत कई मंदिरों को नुकसान पहुंचा।
- 1569: महमूद शाह खिलजी द्वितीय ने परिसर के पास विशाल संत कमाल मौलाना का मकबरा बनवाया। इसी वजह से मुस्लिम समुदाय इसे कमाल मौलाना मस्जिद कहता है।
ब्रिटिश काल
1857: यहां खुदाई के दौरान देवी वाग्देवी की प्रतिमा निकली, जिसे ब्रिटिश अधिकारी विलियम किनेकेड ने लंदन ले गए। यह प्रतिमा आज भी लंदन के संग्रहालय में है। भोजशाला शब्द का उल्लेख पहली बार 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश अधिकारियों और शोधकर्ताओं के दस्तावेजों में मिलता है। जर्मन भारतविद एलॉइस एंटोन फ्यूहरर ने 1893 में इसका उल्लेख किया था। इसके बाद के.के. लेले जैसे अधिकारियों ने भी यहां पाए गए संस्कृत शिलालेखों का अध्ययन किया और इसे संस्कृत शिक्षा केंद्र से जोड़कर देखा। रॉयल एशियाटिक सोसाइटी में प्रकाशित शोध में भी भोज और सरस्वती से जुड़े संदर्भ सामने आए। यही दस्तावेज आगे चलकर ऐतिहासिक आधार बनते गए।

भोजशाला: कैसे शुरू हुआ विवाद?
13वीं शताब्दी के आसपास इस क्षेत्र में बदलाव के ऐतिहासिक दावे मिलते हैं। मुस्लिम आक्रांताओं ने मूल मंदिर संरचना को तोड़ा, बाद में बदलकर इस्लामी ढांचे का निर्माण किया। इसके एक हिस्से में मस्जिद बनने के बाद मुस्लिम पक्ष इसपर अपना अधिकार जमाने लगा। यही आज भी विवाद की जड़ हैं। समय के साथ यह मुद्दा धार्मिक पहचान से जुड़ गया और धीरे-धीरे सामाजिक तनाव का कारण बन गया।
आजादी के बाद बढ़ता विवाद
- 1951 में भोजशाला को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया, लेकिन इसके बाद स्थिति और जटिल होती गई।
- 1952 में हिंदू समुदाय ने यहां भोज दिवस मनाना शुरू किया, जबकि 1953 में मुस्लिम समुदाय ने उर्स की परंपरा शुरू की। धीरे-धीरे यहां एक अनोखी व्यवस्था बनी, जिसमें अलग-अलग दिनों पर दोनों समुदाय अपनी धार्मिक गतिविधियां करते रहे।
यह व्यवस्था कई दशकों तक चलती रही, लेकिन समय के साथ तनाव बढ़ता गया।
भोजशाला विवाद के प्रमुख तथ्य (1995–2016 टाइमलाइन)
1992 के बाद बाबरी मस्जिद विवाद के प्रभाव से भोजशाला भी राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गया। कई बार यहां प्रदर्शन, झंडा फहराने की चेतावनी और प्रशासनिक हस्तक्षेप की स्थिति बनी।

1995: पहली बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई
- भोजशाला परिसर में नमाज और पूजा को लेकर विवाद तेज हुआ।
- प्रशासन ने व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रबंधन और निगरानी बढ़ाई।
- इस दौर में दोनों पक्षों के बीच तनाव लगातार बढ़ने लगा।
1997: विवाद बढ़ा, कर्फ्यू जैसी स्थिति
- 12 मई 1997 को तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के आदेश पर हालात बिगड़ने के बाद कड़ी सुरक्षा लगाई गई।
- भोजशाला में प्रवेश और गतिविधियों पर रोक जैसी स्थिति बनी।
- हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों के बीच तनाव और बढ़ गया।
1998: प्रशासनिक नियंत्रण और पाबंदियां
- 6 फरवरी 1998 को केंद्र सरकार और पुरातत्व विभाग ने क्षेत्र में कड़ी निगरानी रखी।
- किसी भी बड़े धार्मिक आयोजन पर नियंत्रण बढ़ाया गया।
- स्थानीय स्तर पर पुलिस तैनाती लगातार जारी रही।
2003: बड़ा टकराव और राजनीतिक मोड़
- बसंत पंचमी के दौरान विवाद हिंसक रूप लेने लगा।
- पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शन के बाद माहौल बिगड़ गया।
- यह मामला राज्य की राजनीति और संसद तक पहुंच गया।
- भोजशाला मुद्दा मध्य प्रदेश चुनावों में भी बड़ा एजेंडा बन गया।
2013: तनाव और सुरक्षा बढ़ाई गई
- बसंत पंचमी और शुक्रवार (नमाज दिवस) के दौरान तनाव बढ़ा।
- दोनों पक्षों की मौजूदगी के कारण माहौल संवेदनशील बना रहा।
- पुलिस को कई बार भीड़ नियंत्रण के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा।
2016: फिर बढ़ा विवाद
- बसंत पंचमी पर फिर से तनाव की स्थिति बनी।
- प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी।
- कुछ समय के लिए भोजशाला परिसर में गतिविधियों पर रोक जैसी स्थिति बनी।
ASI रिपोर्ट: सबसे अहम मोड़
हाल ही में ASI की विस्तृत रिपोर्ट ने सच सामने ला दिया। रिपोर्ट में कहा गया कि मौजूदा संरचना से पहले यहां एक बड़ा मंदिरनुमा ढांचा मौजूद था। रिपोर्ट में मिले शिलालेख, स्तंभ, यज्ञ कुंड और संस्कृत लेख इस दावे को मजबूत आधार देते हैं कि यह स्थल प्राचीन शिक्षा और धार्मिक गतिविधियों से जुड़ा रहा है।
भोजशाला का इतिहास सिर्फ पत्थरों और शिलालेखों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सदियों से बदलते सामाजिक और धार्मिक दृष्टिकोण की कहानी भी है।
