विशाल चतुर्वेदी, गोरखपुर: पूर्वांचल के प्रतिष्ठित होम्योपैथिक चिकित्सक, उत्तर प्रदेश के सर्वोच्च 'यश भारती' सम्मान से अलंकृत और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों के पुरोधा डॉ. राम रतन बनर्जी का निधन हो गया है। वे 90 वर्ष के थे। उनके प्रस्थान से न केवल चिकित्सा जगत ने एक महान मार्गदर्शक को खो दिया है, बल्कि गोरखपुर ने उस गौरवशाली पीढ़ी का एक ऐसा स्तंभ गंवा दिया है, जिसने चिकित्सा को केवल व्यवसाय नहीं बल्कि जनसेवा, करुणा और सामाजिक सरोकार का माध्यम बनाया।
गोरखपुर से लेकर न्यूयॉर्क तक का सफर
डॉ. राम रतन बनर्जी का जन्म 3 जून 1936 को गोरखपुर में हुआ था। उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा राजकीय जुबिली इंटर कॉलेज से पूरी की। इसके बाद 1952 में सेंट एंड्रयूज कॉलेज से इंटरमीडिएट और 1954 में विज्ञान स्नातक (B.Sc.) की डिग्री प्राप्त की। चिकित्सा के क्षेत्र में कदम रखते हुए उन्होंने 1959 में कलकत्ता होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल से स्वर्ण पदक (Gold Medal) के साथ अपनी चिकित्सा शिक्षा पूरी की। इसके बाद 1975 में उन्होंने न्यूयॉर्क स्थित 'द होमियो इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिसिन' से होम्योपैथिक साइंस में डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की। वर्ष 1959 में उन्होंने गोरखपुर के बेनीगंज-रानीगोला स्थित 'संतोष होमियो सेवाश्रम' से अपने चिकित्सकीय सफर की शुरुआत की। उन्होंने अपने लंबे करियर में गरीबों और जरूरतमंदों के लिए हमेशा निःशुल्क चिकित्सा शिविर और औषधि वितरण को प्राथमिकता दी।
2016 में मिला 'यश भारती' सम्मान
चिकित्सा और समाज सेवा के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2016 (तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार के कार्यकाल में) उन्हें प्रदेश के प्रतिष्ठित 'यश भारती' सम्मान से सम्मानित किया था। वे 'होम्योपैथिक मेडिकल एसोसिएशन ऑफ इंडिया' की गोरखपुर इकाई के लगभग एक दशक तक अध्यक्ष रहे। इसके अलावा गोरखपुर जिला होम्योपैथिक एसोसिएशन, होम्योपैथिक लीग और कई अंतरराष्ट्रीय होम्योपैथिक संगठनों से भी सक्रिय रूप से जुड़े रहे।
भोजपुरी में स्वास्थ्य जागरूकता
डॉ. बनर्जी हिंदी, अंग्रेजी, बंगला और भोजपुरी के अलावा लैटिन भाषा के भी जानकार थे। उन्होंने आकाशवाणी गोरखपुर से भोजपुरी में स्वास्थ्य वार्ताओं के माध्यम से ग्रामीण अंचल तक स्वास्थ्य के प्रति अलख जगाई। दूरदर्शन और 'रश्मि विजन' चैनल पर उनके स्वास्थ्य कार्यक्रम 'हेल्थ Plus' के 101 एपिसोड प्रसारित हुए थे। विद्यार्थी जीवन में वे बेहतरीन खिलाड़ी रहे। 1951 से 1954 के दौरान वे सेंट एंड्रयूज कॉलेज की हॉकी टीम के कप्तान रहे। इसके अलावा अंग्रेजी, हिंदी और बंगला नाटकों में उनके अभिनय को भी खासी सराहना मिली थी। वे गोरखपुर की ऐतिहासिक दुर्गाबाड़ी बंगाली समिति के संरक्षक होने के साथ-साथ आर्यनगर रामलीला समिति और कई सांस्कृतिक संस्थाओं से गहराई से जुड़े रहे।
चिकित्सा और सेवा की विरासत संभाल रही नई पीढ़ी
डॉ. बनर्जी के परिवार में चिकित्सा और समाजसेवा की यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही है। उनके पुत्र डॉ. रूप कुमार बनर्जी और पौत्र डॉ. सौम्यो रतन बनर्जी व डॉ. अरुणिमा बनर्जी भी होम्योपैथी चिकित्सा और जनसेवा के इस कारवां को पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। लगभग सात दशकों की उनकी यह स्वर्णिम यात्रा गोरखपुर के सामाजिक और चिकित्सा इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय हमेशा बनी रहेगी।