Gwalior Water Future Under Threat

कभी ग्वालियर को जिंदा रखता था बांधों का नेटवर्क, अब अतिक्रमण से सूख रहा जल भविष्य 

ग्वालियर की नदियों और बांधों पर बना ऐतिहासिक जल तंत्र अब अतिक्रमण और उपेक्षा से संकट में है। भूजल स्तर गिरने और जल संकट की चेतावनी ने चिंता बढ़ा दी है।

By : स्वदेश डेस्क
कभी ग्वालियर को जिंदा रखता था बांधों का नेटवर्क, अब अतिक्रमण से सूख रहा जल भविष्य 

कभी ग्वालियर की पहचान उसकी समृद्ध जल संरचना से होती थी। यहां की नदियों पर बने बांध, पिकअप वियर और नहरों का जाल न सिर्फ सिंचाई और पेयजल का आधार था, बल्कि भू-रिचार्ज का सबसे मजबूत माध्यम भी था। 100 साल पहले तैयार की गई यह इंजीनियरिंग इतनी सटीक थी कि बाढ़ का पानी भी संपत्ति बन जाता था। लेकिन आज हालात उलट है-नदियां नालों में बदल रही हैं, बांध उपेक्षित हैं और अतिक्रमण जल भविष्य को निगल रहा है।

पुरानी इंजीनियरिंग की दूरदर्शिता

ग्वालियर के पुराने इंजीनियरों ने नदियों के जल प्रवाह को समझकर बांधों और नहरों का ऐसा नेटवर्क तैयार किया था, जिससे अतिरिक्त वर्षा जल को संरक्षित कर लिया जाता था। इससे न केवल बाढ़ नियंत्रण होता था, बल्कि यही पानी सालभर सिंचाई और पेयजल के रूप में उपयोग होता था। यह प्रणाली आज भी कारगर है, लेकिन उसकी अनदेखी हो रही है।

भू-रिचार्ज का मजबूत आधार

नदियों पर बने बांधों में जमा पानी धीरे-धीरे जमीन में रिसकर भूजल स्तर को बढ़ाता है। इसका सीधा लाभ कुओं, बावड़ियों और तालाबों को मिलता है, जो सालभर पानी से भरे रहते हैं। हाल ही में अच्छी बारिश के बाद मामा का बांध, वीरपुर और हनुमान बांध के आसपास जलस्तर में तेजी से वृद्धि इसका प्रमाण है।

भू-रिचार्ज का विज्ञान और चेतावनी

इन सभी नदियों पर बने बांधों में जमा पानी जमीन में रिसकर भूजल स्तर बढ़ाता है। इसी वजह से कुएं, बावड़िया और तालाब सालभर भरे रहते थे। हाल ही में अच्छी बारिश के बाद मामा का बाथ, वीरपुर और हनुमान बांध के आसपास जलस्तर में बढ़ोत्तरी इसका प्रमाण है, लेकिन यदि अतिक्रमण और उपेक्षा जारी रही, तो यही मजबूत व्यवस्था ग्वालियर को जल संकट की ओर धकेल देगी। ग्वालियर की नदिया और उन पर बनी जल संरचनाएं केवल इतिहास नहीं, बल्कि भविष्य की जरूरत हैं। यदि इन्हें बचाने के लिए सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में पानी के लिए संघर्ष तय है।

जानें कौनसी नदी पर कौनसा बांध है और पूरा सिस्टम

पार्वती नदी : बांधों की मजबूत श्रृंखला

पार्वती नदी ग्वालियर की प्रमुख जलधारा है, जिस पर जल प्रबंधन की मजबूत व्यवस्था बनाई गई थी।

  • अपर ककैटो डेम (52 एमसीएम क्षमता)  सिंचाई का प्रमुख स्रोत

  • ककैटो डेम (82 एमसीएम)  अतिरिक्त जल का संचयन

  • हरसी बांध (50 एमसीएम, भितरवार) नहरों के जरिए खेतों तक पानी

  • मोहनी पिकअप वियर (नरवर, सिंध नदी पर)

  • मणीखेड़ा पिकअप वियर (शिवपुरी, सिंध नदी पर)

यह पूरी श्रृंखला बाढ़ नियंत्रण और सिंचाई का मजबूत आधार रही है।

सांक नदी : शहर की प्यास बुझाने वाली लाइफ लाइन

सांक नदी पर बनी संरचनाएं ग्वालियर शहर के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

  • सांक पिकअप वियर (राई गांव, घाटीगांव)

  • तिघरा बांध- ग्वालियर का मुख्य पेयजल स्रोत

  • नून पिकअप वियर (पनिहार)

पहले यह संरचनाएं सिंचाई का भी बड़ा साधन थीं, लेकिन अब इनका उपयोग मुख्य रूप से पेयजल तक सीमित हो गया है।

महुअर नदी : सिंचाई की धुरी

महुअर नदी पर बनी जल संरचनाएं ग्रामीण क्षेत्रों के लिए जीवनरेखा मानी जाती हैं।

  • पेहसारी डेम (सेहसारी क्षेत्र)

  • यहां से निकली नहर सांक नदी से जुड़ती है।

यह पूरी प्रणाली खेतों तक पानी पहुंचाने का महत्वपूर्ण जरिया रही है।

स्वर्णरेखा नदी : भू-रिचार्ज की रीढ़, अब संकट में

कभी शहर के जलस्तर को बनाए रखने वाली स्वर्णरेखा नदी पर कई बांध बने हुए हैं.

  • रामपुर बांध (रायपुर क्षेत्र)

  • मामा का बांध

  • वीरपुर बांध (गिरवाई)

  • हनुमान बांध

  • जलालपुर बांध

  • सुरौरा बांध

ये सभी भू-रिचार्ज के प्रमुख स्रोत रहे हैं, लेकिन आज यह नदी कई हिस्सों में नाले में तब्दील हो चुकी है।

मुरार (बैसली) नदी : अस्तित्व की लड़ाई

मुरार नदी, जिसे बैसली भी कहा जाता है, अब अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है।

  • जड़ेरुआ बांध

  • बहादुरपुर पिकअप वियर

शहर के भीतर यह नदी अतिक्रमण और प्रदूषण की वजह से नाले में बदल चुकी है।

 

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