मध्यप्रदेश में सियासी उथल-पुथल

राहुल गांधी के संभावित दौरे और जहरीली शराब कांड के बीच मध्यप्रदेश में बढ़ा सियासी दबाव

मध्यप्रदेश में बालाघाट और सागर की घटनाओं के बीच राहुल गांधी के संभावित दौरे ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। यह दौरा स्वास्थ्य, पोषण और प्रशासनिक जवाबदेही के सवालों को उठाता है।

By : नरेंद्र कुमार
राहुल गांधी के संभावित दौरे और जहरीली शराब कांड के बीच मध्यप्रदेश में बढ़ा सियासी दबाव

(अनुराग तागड़े)

भोपाल। मध्यप्रदेश की राजनीति में इस समय दो जिलों की घटनाएं सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनती दिखाई दे रही हैं। एक तरफ बालाघाट का आदिवासी अंचल है, जहां बच्चों की लगातार मौतों ने स्वास्थ्य व्यवस्था, पोषण, पेयजल और दूरदराज क्षेत्रों तक इलाज की पहुंच पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। दूसरी तरफ सागर है, जहां संदिग्ध जहरीली शराब से हुई मौतों ने आबकारी और पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली को कठघरे में ला दिया है। इन दोनों घटनाओं के बीच अब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बालाघाट और सागर पहुंचने की संभावनाओं ने प्रदेश की सियासत को और गर्म कर दिया है।

राहुल गांधी पहले ही दोनों घटनाओं पर सरकार को घेर चुके हैं। बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौतों को उन्होंने सरकार की "पूर्ण विफलता" बताते हुए तत्काल जांच, उपचार और राहत की मांग की थी। वहीं, सागर की घटना पर उन्होंने निष्पक्ष जांच और केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक कार्रवाई सीमित न रखने की बात कही है।

दो जिले, दो घटनाएं और एक बड़ा राजनीतिक सवाल

बालाघाट में बैहर-बिरसा क्षेत्र के आदिवासी बहुल गांवों में बच्चों के बीमार होने और मौतों का सिलसिला कई सप्ताह से चिंता का विषय बना हुआ है। हालांकि, मौतों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं। केंद्र और राज्य की स्वास्थ्य टीमों ने बड़े स्तर पर जांच शुरू की है। 32 हजार से अधिक लोगों की स्क्रीनिंग, 431 बच्चों का अस्पतालों में भर्ती होना और 14,637 बच्चों को अतिरिक्त MR वैक्सीन दिया जाना बताता है कि मामला साधारण मौसमी बीमारी तक सीमित नहीं है।

सरकारी जांच में फिलहाल किसी एक बीमारी को सभी मौतों का कारण नहीं माना गया है। मलेरिया, खसरा, सह-संक्रमण, कुपोषण, एनीमिया, डिहाइड्रेशन और श्वसन संबंधी जटिलताओं जैसे कई कारण सामने आए हैं। यही वजह है कि इस मामले में राजनीतिक आरोपों के साथ वैज्ञानिक जांच का इंतजार भी जरूरी है।लेकिन राजनीति का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कांग्रेस ने इसे आदिवासी अंचल की उपेक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की कमजोरी का प्रतीक बनाया है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार पहले ही प्रभावित गांवों का दौरा कर चुके हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी भी लगातार सरकार पर सवाल उठा रहे हैं।यानी, यदि राहुल गांधी बालाघाट पहुंचते हैं तो उनके सामने केवल बच्चों की मौतों का आंकड़ा नहीं होगा, बल्कि आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य, पोषण, पेयजल और सरकारी पहुंच का पूरा सवाल होगा।

सागर में मौतों ने बदल दिया राजनीतिक तापमान

सागर की स्थिति इससे भी ज्यादा सीधे प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न खड़ा करती है।बंडा क्षेत्र के कई गांवों में संदिग्ध जहरीली शराब पीने के बाद बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़े। 8 सितंबर तक पुलिस ने 15 मौतों की पुष्टि की थी और करीब 40 लोगों के अस्पताल में भर्ती होने की जानकारी सामने आई थी। 14 आरोपियों की गिरफ्तारी और तीन आबकारी अधिकारियों तथा दो पुलिसकर्मियों के निलंबन की कार्रवाई भी हुई है।हालांकि, 9 सितंबर को मृतकों की संख्या को लेकर स्वयं सरकारी स्तर पर अलग-अलग आंकड़े सामने आए। सागर कलेक्टर ने 15 मौतों की पुष्टि की, जबकि मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल ने 19 मृतकों का उल्लेख किया। यह आंकड़ों का अंतर अपने आप में सरकार के लिए असहज करने वाला प्रश्न बन गया है।मामले की जांच में शराब में मेथनॉल की आशंका सामने आई है और पुलिस अवैध शराब के नेटवर्क की पड़ताल कर रही है। प्रशासन ने मजिस्ट्रियल जांच भी शुरू की है, जिसमें शराब के स्रोत, निर्माण, भंडारण, वितरण और विभागीय लापरवाही की जांच की जानी है।

यही वह बिंदु है, जहां मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं रह जाता। सवाल यह है कि यदि अवैध शराब का नेटवर्क सक्रिय था तो वह प्रशासन की निगाह से कैसे बचा? निगरानी व्यवस्था कहां विफल हुई? और कार्रवाई घटना के बाद ही क्यों हुई?

कांग्रेस ने जमीन तैयार कर दी

राहुल गांधी के संभावित दौरे की सबसे बड़ी राजनीतिक पृष्ठभूमि यह है कि कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व ने दोनों स्थानों पर पहले ही राजनीतिक और संगठनात्मक मौजूदगी दर्ज करा दी है।सागर में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी प्रभावित परिवारों से मिल चुके हैं, जबकि नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार भी पीड़ित परिवारों के बीच पहुंचे। कांग्रेस ने कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक सहित प्रशासनिक जिम्मेदारी पर सवाल उठाए हैं।बालाघाट में भी उमंग सिंघार पहले प्रभावित आदिवासी गांवों का दौरा कर चुके हैं। इस तरह, यदि राहुल गांधी वहां पहुंचते हैं तो यह अचानक किया गया राजनीतिक दौरा नहीं होगा, बल्कि प्रदेश कांग्रेस द्वारा पहले से तैयार किए गए मुद्दों का राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार होगा।यही वजह है कि कांग्रेस संगठन में राहुल गांधी के संभावित दौरे को केवल संवेदना यात्रा के रूप में नहीं देखा जा रहा। इसके जरिए स्वास्थ्य व्यवस्था, आदिवासी उपेक्षा, अवैध शराब, प्रशासनिक जवाबदेही और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को एक बड़े राजनीतिक नैरेटिव में जोड़ने की कोशिश हो सकती है।

मुख्यमंत्री के लिए भी सागर अहम

इधर, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव 6 से 9 सितंबर तक दुबई के निवेश दौरे पर हैं। दौरे का घोषित उद्देश्य मध्यप्रदेश में निवेश आकर्षित करना है।इसी बीच सागर की घटना सामने आई। मुख्यमंत्री ने दुबई रवाना होने से पहले ही अधिकारियों को मौके पर पहुंचकर जांच और कार्रवाई के निर्देश दिए थे। इसके बाद आबकारी विभाग के अधिकारियों पर कार्रवाई की गई।अब राजनीतिक हलकों में यह चर्चा है कि दुबई से लौटने के बाद मुख्यमंत्री सागर का रुख कर सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो उसका राजनीतिक महत्व सामान्य प्रशासनिक दौरे से कहीं अधिक होगा। क्योंकि एक तरफ सरकार निवेश और विकास की छवि प्रस्तुत कर रही होगी और दूसरी तरफ सागर की घटना सरकार से स्थानीय स्तर पर जवाब मांग रही होगी।

तबादलों की चर्चा क्यों महत्वपूर्ण है?

सागर की घटना के बीच प्रशासनिक फेरबदल भी चर्चा में है। मुख्यमंत्री के दुबई दौरे से ठीक पहले 11 वरिष्ठ IAS अधिकारियों के तबादले हुए और सागर संभाग का आयुक्त बदला गया। नेहा मारव्या सिंह की जगह दिलीप कुमार को सागर संभाग का नया आयुक्त बनाया गया।इसके अलावा, जहरीली शराब मामले में आबकारी विभाग के अधिकारियों पर निलंबन और अन्य कार्रवाई हो चुकी है। इसलिए अब स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठ रहा है कि क्या प्रशासनिक जिम्मेदारी और आगे तक जाएगी?

कलेक्टर और एसपी पर कार्रवाई होगी या नहीं?

क्या केवल निलंबन तक मामला सीमित रहेगा या जिम्मेदारी की पूरी श्रृंखला तय होगी?क्या शराब के नेटवर्क के साथ संभावित प्रशासनिक संरक्षण की भी जांच होगी?इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों की राजनीति तय कर सकते हैं।राहुल गांधी आए तो मुद्दा केवल सागर या बालाघाट नहीं रहेगा राहुल गांधी के लिए मध्यप्रदेश का यह दौरा राजनीतिक रूप से कई स्तरों पर महत्वपूर्ण हो सकता है। हाल ही में उनका इंदौर का प्रस्तावित कार्यक्रम अनुमति विवाद के कारण आगे खिसक चुका है और अब कांग्रेस ने उसे 19 सितंबर के लिए पुनर्निर्धारित किया है।ऐसे में बालाघाट और सागर की घटनाएं उन्हें सरकार के खिलाफ एक अलग राजनीतिक मंच दे सकती हैं।बालाघाट में सवाल होगा कि आदिवासी बच्चों की मौतों के पीछे बीमारी के साथ क्या बुनियादी सुविधाओं की कमी भी जिम्मेदार है?सागर में सवाल होगा कि जहरीली शराब गांवों तक पहुंची कैसे और प्रशासन को इसकी भनक क्यों नहीं लगी? और इन दोनों सवालों के बीच तीसरा बड़ा सवाल होगा क्या सरकार घटना के बाद कार्रवाई कर रही है या ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए व्यवस्था पहले से मजबूत है?

सरकार के सामने दोहरी चुनौती

मोहन यादव सरकार के सामने चुनौती सिर्फ विपक्ष के आरोपों का जवाब देने की नहीं है। उसे यह भी साबित करना होगा कि प्रशासनिक कार्रवाई निष्पक्ष है और किसी भी स्तर पर जिम्मेदारी से बचने की गुंजाइश नहीं होगी।सागर में सरकार ने निलंबन, गिरफ्तारी और जांच जैसे कदम उठाए हैं। बालाघाट में केंद्र और राज्य की स्वास्थ्य टीमें बड़े स्तर पर काम कर रही हैं। इसलिए सरकार के पास यह कहने के लिए ठोस कार्रवाई भी है कि उसने मामलों को नजरअंदाज नहीं किया।लेकिन राजनीति में कार्रवाई से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है विश्वास। सागर में मौतों के आंकड़ों को लेकर सामने आया अंतर और बालाघाट में मौतों के कारणों को लेकर जारी असमंजस विपक्ष को लगातार सवाल पूछने का अवसर दे रहा है।

अब निगाहें दो यात्राओं पर

फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राहुल गांधी के बालाघाट और सागर दौरे की आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है। लेकिन कांग्रेस की तैयारियां और दोनों घटनाओं पर राहुल गांधी की सार्वजनिक टिप्पणियां यह संकेत जरूर देती हैं कि मध्यप्रदेश का यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में उठ सकता है।दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री की दुबई यात्रा से लौटने के बाद उनकी अगली राजनीतिक और प्रशासनिक सक्रियता पर भी नजर रहेगी।बालाघाट में बच्चों की मौतें और सागर में जहरीली शराब से हुई जनहानि, दोनों घटनाएं अलग हैं, लेकिन दोनों ने एक ही सवाल सामने ला दिया है: सरकार की व्यवस्था आम आदमी तक संकट आने से पहले कितनी पहुंचती है?यही सवाल अब मध्यप्रदेश की राजनीति का केंद्र बनता दिखाई दे रहा है। और यदि राहुल गांधी वास्तव में बालाघाट और सागर पहुंचते हैं तो यह सवाल विधानसभा या प्रेस कॉन्फ्रेंस से निकलकर सीधे जमीन पर खड़े उन परिवारों के बीच पहुंच जाएगा, जिनके लिए राजनीति से पहले सवाल है—जवाबदेही आखिर किसकी है?

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