भोपाल। मध्यप्रदेश में सत्ता के फैसले फिर राजनीतिक संदेश दे रहे हैं। 28 अप्रैल को सरकार ने विंध्य विकास प्राधिकरण में नई नियुक्तियां घोषित कीं। योजना, आर्थिक और सांख्यिकी विभाग के आदेश में तीन नाम सामने आए। इनमें अध्यक्ष से लेकर उपाध्यक्ष तक के पद शामिल हैं। आदेश तत्काल लागू कर दिया गया।
दिलचस्प यह है कि इस सूची में एक ऐसा चेहरा है, जिसे हाल के चुनाव में टिकट नहीं मिला था। अब उसी नेता को बड़ी जिम्मेदारी देकर नए सवाल खड़े हो गए हैं।
टिकट कटने के बाद क्यों बदली तस्वीर?
पंचूलाल प्रजापति को प्राधिकरण का अध्यक्ष बनाया गया है। वे रीवा जिले की मनगवां सीट से विधायक रह चुके हैं। 2023 चुनाव में पार्टी ने उनका टिकट काट दिया था। इसके बाद से वे सक्रिय जरूर थे, लेकिन बड़ी जिम्मेदारी से दूर दिख रहे थे। अब अचानक उनकी वापसी कई संकेत दे रही है। राजनीतिक जानकार इसे ‘समायोजन की राजनीति’ मान रहे हैं। यानी नाराजगी को पद देकर संतुलन बनाने की कोशिश।

दो उपाध्यक्ष बनाकर क्या साधा गया संतुलन?
इस बार एक नहीं, दो उपाध्यक्ष बनाए गए हैं। डॉ. अजय सिंह और संजय तीर्थानी को यह जिम्मेदारी मिली है। ऐसा कम ही होता है कि एक ही प्राधिकरण में दो उपाध्यक्ष हों। इससे साफ है कि क्षेत्रीय और गुटीय संतुलन को ध्यान में रखा गया है। पार्टी के अंदर अलग-अलग वर्गों को प्रतिनिधित्व देने का यह तरीका माना जा रहा है।
क्या विंध्य में बदलेंगे सियासी समीकरण?
विंध्य क्षेत्र हमेशा से चुनावी लिहाज से अहम रहा है। यहां छोटे बदलाव भी बड़े असर डालते हैं। नई नियुक्तियां सीधे तौर पर संगठन को मजबूती देने की रणनीति लगती हैं। खासकर उन नेताओं को सक्रिय रखने के लिए, जो चुनावी मैदान से बाहर हो गए। आने वाले समय में इसका असर स्थानीय राजनीति और संगठन की पकड़ पर दिख सकता है।
विकास बनाम राजनीति, जनता को क्या मिलेगा?
विंध्य विकास प्राधिकरण का मकसद क्षेत्रीय विकास को गति देना है। लेकिन जब नियुक्तियां सियासी नजरिए से होती हैं, तो सवाल उठते हैं। अगर नए पदाधिकारी सक्रिय रहते हैं, तो सड़क, पानी और रोजगार जैसे मुद्दों पर काम तेज हो सकता है। लेकिन अगर फोकस सिर्फ राजनीतिक संतुलन पर रहा, तो जनता को ज्यादा फर्क नहीं दिखेगा। लोग अब काम के आधार पर इन नियुक्तियों को परखेंगे, सिर्फ नामों से नहीं।