Satpura Forests Become India’s Carbon Shield

मध्य भारत को सांस दे रहे ‘ऊंघते अनमने’ सतपुड़ा के घने जंगल

इसरो के अध्ययन में खुलासा हुआ है कि बैतूल के सतपुड़ा और सागौन वन देश के सबसे बड़े कार्बन सिंक बनकर जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।

By : स्वदेश डेस्क
मध्य भारत को सांस दे रहे ‘ऊंघते अनमने’ सतपुड़ा के घने जंगल

राजदेव पांडेय

बैतूल में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का अध्ययन, कार्बन सोखने में बड़ी भूमिका निभा रहे सागौन के जंगल 

मध्यप्रदेश में सतपुड़ा के ‘ऊंघते अनमने घने जंगलों’ को यूं ही मध्य भारत के फेफड़े और जैव विविधिता का प्रहरी नहीं कहा जाता है। जलवायु परिवर्तन के दौर में वातावरण में गर्मी बढ़ाने वाली कार्बन डाइऑक्साइड गैस को सोख (अवशोषित) कर पर्यावरणीय संतुलन बनाने में ये बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की तरफ से किए गए विशेष अध्ययन ने इसकी पुष्टि की है। इसरो की रिपोर्ट बताती है कि यह देश के सबसे बड़े कार्बन सोखने वाले जंगलों में से एक है। इस तरह सतपुड़ा के जंगल केवल हरियाली का खजाना नहीं, बल्कि मध्य भारत की सांसें हैं।

इसरो ने बैतूल जिले में स्थित सतपुड़ा के जंगलों में समूचे मध्य भारत में ग्रीनहाउस गैसों की निगरानी के लिए उच्च तकनीक से युक्त एक केंद्र स्थापित किया है। रिपोर्ट के अनुसार यहां दिन के समय नेट अमाउंट ऑफ कार्बन एक्सचेंज (एनईई) वैल्यू का अधिकतम मान -300 माइक्रोग्राम कार्बन प्रति वर्ग मीटर प्रति सेकेंड है। यह सर्दियों में देश में सर्वाधिक है। यहां ऋणात्मक चिन्ह का मतलब यह होता है कि कार्बन का बहुत अच्छी तरह से अवशोषण हो रहा है।

यहां के जंगलों में कार्बन का सर्वाधिक अवशोषण बरसात के बाद सर्दियों के महीनों में बेहतर तरीके से होता है। गर्मियों के शुष्क महीनों में पत्तियों के झड़ने के कारण कार्बन सोखने की क्षमता घटकर 24 माइक्रोग्राम कार्बन प्रति वर्ग मीटर प्रति सेकेंड हो जाती है। सर्दियों में यह क्षमता बढ़कर 25.92 माइक्रोग्राम कार्बन प्रति वर्ग मीटर प्रति सेकेंड तक पहुंच जाती है। इस तरह बैतूल के जंगल कार्बन सोखने के लिए सबसे बेहतरीन मिश्रित प्रजाति के वन हैं। सतपुड़ा के पहाड़ों में लगे मिश्रित पर्णपाती सागौन और अन्य पेड़ों की पत्तियों के जरिए व्यापक स्तर पर कार्बन अवशोषण होता है।

केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, इसरो ने भूमंडल-जीवमंडल अध्ययन कार्यक्रम के अंतर्गत भारत के विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों में ग्रीनहाउस गैसों के प्रवाह की दीर्घकालिक निगरानी के लिए कई सूक्ष्म मौसम विज्ञान प्रवाह टावर स्थापित किए हैं।

सागौन वनों की सबसे बड़ी खासियत

सागौन वन कार्बन के दीर्घकालिक भंडार माने जाते हैं, क्योंकि सागौन के पेड़ लंबे समय तक जीवित रहते हैं। उनकी लकड़ी में कार्बन लंबे समय तक सुरक्षित रहता है। इसकी वजह से कार्बन जल्दी वातावरण में वापस नहीं आता। सागौन का पेड़ 100 साल से अधिक समय तक कार्बन सोखने की क्षमता रखता है।

कार्बन अवशोषक (कार्बन सिंक) के रूप में भूमिका

ये जंगल कार्बन अवशोषक का काम करते हैं। अवशोषक का मतलब ऐसी प्राकृतिक या कृत्रिम प्रणाली से है, जो वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करती है। ये कार्बन को वातावरण से बाहर निकालकर संग्रहित करते हैं। इससे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में मदद मिलती है। पेड़-पौधे कार्बन अवशोषण की इस प्रक्रिया को प्रकाश संश्लेषण के जरिए करते हैं।

जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को रोकने में ढाल बने हमारे वन

पर्यावरणीय खतरों से बचा रहा सतपुड़ा

सतपुड़ा के जंगल ऑक्सीजन का बड़ा स्रोत हैं। कार्बन सोखने में ये जंगल बेहद प्रभावी हैं। हर तरह की पर्यावरणीय गतिविधियां संतुलित रहती हैं। ये जंगल हमें कई पर्यावरणीय खतरों से बचा रहे हैं।

- डॉ. महेश मेहता, पूर्व प्रोफेसर, वनस्पति शास्त्र, जयवंती हाक्सर कॉलेज, बैतूल।

 

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