राजदेव पांडेय, भोपाल
वनों की कटाई और कांक्रीट के जंगल निगल रहे जैव विविधता
सातपुड़ा के वन प्रदेश रमणीक हैं। 60-70 कोस तक पर्वत श्रृंखलाएं फैली हैं। प्रातःकाल की शीतल वायु मंद-मंद बह रही थी। चांदनी के प्रकाश में वन प्रदेश सांसारिक सुखों की आशा की तरह स्पष्ट और रमणीय दिखते थे। सारा वन ऐसा महक रहा था, जैसे मनुष्य का अहंकार। पांच-छह कोस तक चले, वह सुवास बराबर छाई रही। इस पर हमें आश्चर्य हुआ। सभी वृक्ष फलों, फूलों और पत्तों से लदे थे। रक्तचंदन और मधुप आदि बड़े-बड़े वृक्षों का ऊंची पर्वत श्रेणियों पर ठाट-सा लगा था। कचनार के वृक्ष एकदम लाल हो गए थे।
यह सारा वृत्तांत विष्णुभट्ट गोडसे शास्त्री वरसईकर की मराठी पुस्तक 'माझा प्रवास' में वर्णित है। उनकी इस पुस्तक का हिंदी रूपांतरण 'आंखों देखा गदर' प्रतिष्ठित लेखक अमृतलाल नागर ने किया है। उसी पुस्तक से ये अंश लिए गए हैं। दरअसल, विष्णुभट्ट गोडसे शास्त्री ने यह यात्रा वृत्तांत तब लिखा, जब उन्होंने गरीबी और कर्ज से तंग आकर ग्वालियर की तत्कालीन रानी की तरफ से मथुरा में कराए गए एक महायज्ञ में दक्षिणा पाने के लिए लंबा सफर तय किया।
यह वह दौर था, जब 1857 की क्रांति का आगाज हो चुका था। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के उस दौर में अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने वन, पहाड़ और पेड़-पौधों पर खूब लिखा है। उनका तब का यात्रा वृत्तांत में दिया गया ब्यौरा 22 मई को विश्व जैव विविधता दिवस पर महत्वपूर्ण बन पड़ा है। यह देखते हुए कि इसके जरिए 170 साल में जैव विविधता में आए बदलाव को चिन्हित किया जा सकता है और समझा जा सकता है।
तब का परिदृश्य आज किसी जंगल में महसूस किया जा सकता है? बिल्कुल ऐसा सोचना भी किसी दिवास्वप्न से कम नहीं होगा। बात साफ है कि प्रदेश के सभी जंगलों में वृक्षों की प्रजातियों में कमी आई है। उनके घनत्व में भी कमी आई है। असल में जंगल घट रहे हैं। जानकर आश्चर्य होगा कि मध्यप्रदेश में सालाना 411 वर्ग किलोमीटर जंगल घट रहा है। कमोबेश उसी अनुपात में पेड़-पौधे और जीव-जंतु भी घट रहे हैं।
बेशक जंगलों के मामले में तुलनात्मक रूप से मध्यप्रदेश देश के दूसरे बड़े राज्यों में सबसे आगे है, लेकिन प्रदेश की जैव विविधता के सूखते संसार को बचाने के लिए गंभीर प्रयासों की जरूरत महसूस की जा रही है।
अजीब विरोधाभास
भोपाल ताल में घटी प्रवासी पक्षियों की संख्या और बढ़ी उनकी प्रजातियों की संख्या
भोज वेटलैंड में प्रवासी और स्थानीय पक्षियों की संख्या घटी है। पहले इनकी संख्या 50 हजार के आसपास थी। अब इनकी संख्या 35-40 हजार के बीच है। जाहिर है कि इनके आवास घटे हैं। मानव का हस्तक्षेप बढ़ा है। वेटलैंड के जलभराव क्षेत्र में खड़ी कांक्रीट की अट्टालिकाएं इस बात का प्रमाण हैं। कुल मिलाकर यहां की जैव विविधता पर विपरीत असर पड़ा है।
अब चौंकाने वाली बात सामने आई है। विशेषज्ञों का कहना है कि भोज वेटलैंड में बेशक पक्षियों की संख्या घटी है, लेकिन उनकी प्रजातियों की संख्या में अप्रत्याशित इजाफा हुआ है। 1990 के दशक तक इस बड़े तालाब में पक्षियों की 210 से 225 प्रजातियां हुआ करती थीं। अब इनकी संख्या 300 से अधिक है।
पक्षियों की संख्या घटना और उनकी प्रजातियों की संख्या बढ़ना एक बड़ा विरोधाभास है।जैव विविधता संतुलित है या नहीं, इसकी पहचान पक्षियों की आवाजाही से की जा सकती है। जानकारों का कहना है कि पक्षियों की संख्या बढ़े तो मान लें कि वहां सब कुछ अनुकूल है। अगर घट रही है तो मान लेना होगा कि वहां के प्राकृतिक परिवेश में कुछ गड़बड़ है।दरअसल, पक्षियों का वनस्थितियों से अनूठा रिश्ता है। उनका रहवास और प्रजनन स्थल वनस्थितियों यानी पेड़-पौधों पर ही निर्भर है। भोपाल के भोजताल (बड़ा तालाब) वेटलैंड के जरिए इसे आसानी से समझा जा सकता है।प्रदेश में पक्षियों की 469 प्रजातियां हैं। इनमें 47 संकटग्रस्त हैं। प्रदेश में पेड़ों की 216 प्रजातियां हैं, जिनमें 38 विलुप्त होने की कगार पर हैं।मध्यप्रदेश को टाइगर स्टेट का गौरव प्राप्त है। यहां देश में सर्वाधिक 758 बाघ हैं। मध्यप्रदेश जनजातियों का भी घर है। यहां की जैव विविधता जनजातीय आबादी की आजीविका और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करती है। यह यहां की समृद्ध जैव विविधता का प्रमाण है।
पंछियों की संख्या जैव विविधता को आंकने का सबसे विश्वसनीय मापदंड
इस प्रकार राज्य के मध्य, पूर्वी और दक्षिणी भाग वनों से आच्छादित हैं और इनमें वनस्पतियों की विविधता अधिक है। वहीं प्रदेश के उत्तरी और पश्चिमी भाग वनों से रहित हैं।भारत में पाई जाने वाली पक्षी प्रजातियों में से लगभग 36 प्रतिशत इस राज्य में पाई जाती हैं। राज्य में दुर्लभ, लुप्तप्राय और संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण के लिए सागर, रीवा, उज्जैन, इंदौर, शाहडोल, देवास, बुरहानपुर और होशंगाबाद जिलों में जैव विविधता पार्क विकसित किए गए हैं। संकटग्रस्त पौधों के संरक्षण के लिए नर्सरियों का भी विकास किया गया है।जैव विविधता विरासत स्थल के रूप में सतना में नरो पहाड़ियां और छिंदवाड़ा में पातालकोट को चिन्हित किया गया है। मध्यप्रदेश में जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की विविधता सबसे अधिक है। मध्यप्रदेश की जैव विविधता में लगभग 5000 पौधों की प्रजातियां शामिल हैं।
अवैध खनन से कराह रही चंबल में जगी आस, लेकिन स्थिति स्वाभाविक नहीं
यूं तो चंबल नदी और उसके अभयारण्य में घड़ियालों, मगरमच्छों और कछुओं जैसे जलीय जीवों की संख्या बढ़ी है। जैव विविधता समृद्धि का यह शुभ संकेत है। हालांकि यह पूरी तरह स्वाभाविक नहीं है।इसके बावजूद चंबल क्षेत्र में ऑरिएंटल डार्टर (सांप पक्षी) की संख्या अब केवल दो से तीन रह गई है। 1990 तक इनकी संख्या सैकड़ों में थी। दो दशक पहले तक यह संख्या घटकर 18 रह गई थी। इसी तरह जलीय ऊदबिलाव 2006 के बाद इस इलाके में दिखाई नहीं दिया।हालांकि इंडियन स्किमर पक्षी की संख्या बढ़ रही है। वहीं बतख प्रजाति का प्रवासी पक्षी कॉमन मर्गेंसर अब मध्यप्रदेश में दिखाई नहीं देता। इसके अलावा अन्य कई प्रजातियां भी संकट में हैं।चंबल ही नहीं, अधिकतर नदियों के किनारे सबसे अधिक जैव विविधता प्रभावित हुई है। चंबल सहित नदियों के किनारों के अधिकतर पेड़ काटे जा चुके हैं। भयानक खनन हो रहा है। चंबल के बीहड़ों से बेर सहित फलदार वृक्षों की तमाम प्रजातियां लगभग खत्म हो चुकी हैं।80 के दशक तक इस इलाके में हिरण की कई प्रजातियां थीं। चंबल किनारे के गांव का नाम मृगपुरा वहां हिरणों की बड़ी संख्या की वजह से पड़ा होगा। विंध्य और बुंदेलखंड में भी जंगल और जलभराव क्षेत्र घटे हैं। इसकी वजह से जैव विविधता बुरी तरह प्रभावित हुई है।
एक्सपर्ट व्यू
ऋषिकेश शर्मा, जलीय पक्षी विज्ञानी, चंबल क्षेत्र
“चंबल क्षेत्र में जैव विविधता प्रभावित हुई है। इसके बाद भी ऑरिएंटल डार्टर नाम का पक्षी तेजी से कम हुआ है। इसके अलावा कई और जलीय पक्षी संकटग्रस्त हैं। इसके पीछे सबसे अहम वजह चंबल और नदियों के किनारे पेड़ों का समाप्त हो जाना है। दरअसल, अंडे देने और रहने दोनों की जगह खत्म हो गई है।”
डॉ. संगीता राजगिरि, संस्थापक सदस्य, भोपाल बर्ड
“भोपाल के भोज वेटलैंड में जैव विविधता बाधित हुई है। प्रवासी पक्षियों की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट आई है। हैरत की बात है कि प्रवासी पक्षियों की प्रजातियां बढ़ी हैं। वहीं शुभ संकेत यह है कि इंडियन स्किमर जैसे पक्षी भोजताल और उसके आसपास दिखाई दे रहे हैं।”