भगवान धन्वंतरि। हाथों में अमृत कलश। मुखमंडल पर दिव्य आभा। समूची मानवता के लिए आरोग्य का संदेश। भारतीय संस्कृति ने उन्हें देवत्व प्रदान किया। आयुर्वेद का आदि प्रवर्तक माना। स्वास्थ्य और दीर्घायु का अधिष्ठाता स्वीकार किया। कितना अद्भुत है हमारा सांस्कृतिक दर्शन! यहाँ स्वास्थ्य केवल शरीर का विषय नहीं, जीवन की साधना है। प्रकृति के साथ सामंजस्य है। आत्मा और शरीर के बीच संतुलन है। इसीलिए हमारे पूर्वजों ने कहा- 'पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख घर में माया।' भारतीय लोकजीवन की यह उक्ति किसी ग्रंथ के गंभीर दर्शन से कम नहीं। इसमें जीवन का सार है। सुख का क्रम है। समृद्धि की वास्तविक परिभाषा है। हमारी संस्कृति ने धन से पहले आरोग्य को महत्व दिया। भोग से पहले संयम को स्थान दिया। यही कारण है कि दीपावली के वैभव से पहले धन्वंतरि का स्मरण होता है। कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को उनका प्राकट्य उत्सव मनाया जाता है। यही धनतेरस है। अर्थात् लक्ष्मी के आगमन से पहले आरोग्य की आराधना। समृद्धि के उत्सव से पहले स्वस्थ जीवन की कामना। यह केवल पर्वों का क्रम नहीं, भारतीय चिंतन की गहराई है।
भारत में त्योहार अचानक नहीं आते। वे प्रकृति के साथ आते हैं। ऋतुओं के साथ आते हैं। मौसम बदलता है। आहार बदलता है। दिनचर्या बदलती है। प्रकृति अपना स्वरूप बदलती है। मनुष्य भी उसके अनुरूप स्वयं को ढालता है। वर्षा के बाद शरद। शरद के बाद शिशिर। फिर वसंत। प्रत्येक ऋतु का अपना स्वभाव, अपना भोजन और अपनी जीवनचर्या। कहीं तिल और गुड़। कहीं सत्तू और छाछ। कहीं मौसमी फल। कहीं विशेष पकवान। इन सबके पीछे केवल स्वाद नहीं, स्वास्थ्य की चिंता भी रही है। आयुर्वेद ने इसे ऋतुचर्या कहा। प्रकृति के साथ जीने की कला सिखाई। शरीर को मौसम के अनुकूल रखने का मार्ग बताया। हमारे ऋषि केवल आध्यात्मिक चिंतक नहीं थे। वे प्रकृति के सूक्ष्म पर्यवेक्षक भी थे। उन्होंने जीवन को टुकड़ों में नहीं देखा। शरीर, मन, समाज और प्रकृति को एक सूत्र में बाँधा। यही भारतीय संस्कृति की विराटता है। यहाँ पर्व भी जीवन का विज्ञान हैं। परंपराएँ भी अनुभव का संचय हैं। उत्सव भी सामाजिक समरसता के अवसर हैं।
धन्वंतरि इसी समग्र जीवनदर्शन के प्रतीक हैं। पौराणिक आख्यान में वे समुद्रमंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट होते हैं। अमृत का यह कलश केवल अमरत्व की कल्पना नहीं, स्वस्थ, संतुलित और दीर्घ जीवन की आकांक्षा का प्रतीक भी है।लेकिन समय बदला। जीवन बदला। बाजार बदला। प्राचीन भारत में दीपावली के अवसर पर हाट सजते थे। गाँवों और नगरों में उत्सव का वातावरण होता था। लोग अपनी आवश्यकताओं के अनुसार बर्तन खरीदते। आभूषण बनवाते। वस्त्र और घरेलू सामग्री जुटाते। कृषि आधारित समाज में यह आर्थिक गतिविधियों का भी महत्वपूर्ण अवसर था। आवश्यकता धीरे-धीरे परंपरा बनी। परंपरा से उत्सव जुड़ा। उत्सव से व्यापार।
और आज? धनतेरस खरीदारी का विशाल पर्व बन गया है। सोना, चाँदी, वाहन, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण। बाजार सजे हैं। विज्ञापनों की चमक है। उपभोग की होड़ है। खरीदारी में कोई दोष नहीं। समृद्धि की कामना भी अनुचित नहीं। भारतीय संस्कृति ने अर्थ को पुरुषार्थ माना है। किंतु अर्थ के साथ धर्म और संयम का संतुलन भी सिखाया है।
विडंबना यह है कि हम धनतेरस का धन तो याद रख पाए, लेकिन धन्वंतरि का आरोग्य भूलते गए। नए बर्तन खरीदते हैं, लेकिन उनमें पकने वाले भोजन की शुद्धता भूल जाते हैं। सोना खरीदते हैं, लेकिन स्वास्थ्य की अनमोल संपदा की उपेक्षा करते हैं। घर सजाते हैं, लेकिन शरीर और मन की देखभाल के लिए समय नहीं निकालते।
क्या यही हमारे मनीषियों की कल्पना थी? नहीं। उनकी दृष्टि में समृद्धि केवल तिजोरी में नहीं थी। स्वस्थ शरीर में थी। संतुलित मन में थी। सुखी परिवार में थी। प्रकृति के सान्निध्य में थी।धनतेरस हमें उसी मूल चेतना की ओर लौटने का अवसर देता है। आइए, इस धनतेरस पर धन्वंतरि को केवल पूजें नहीं, उनके आरोग्य संदेश को जीवन में उतारें। खानपान में संयम लाएँ। ऋतु के अनुरूप आहार अपनाएँ। स्वास्थ्य के प्रति सजग हों। अगली पीढ़ी को अपनी परंपराओं के पीछे छिपे जीवनमूल्यों से परिचित कराएँ।
सोना खरीदिए। चाँदी खरीदिए। घर में लक्ष्मी का स्वागत कीजिए। लेकिन उस सबसे बड़े धन को मत भूलिए, जिसे हमारे पूर्वजों ने पहला सुख कहा था। वह धन है- 'निरोगी काया'। यही धन्वंतरि का संदेश है। यही धनतेरस की आत्मा है। यही भारतीय संस्कृति का शाश्वत दर्शन है। क्योंकि भारत की संस्कृति में समृद्धि का अर्थ केवल धनवान होना नहीं, तन से स्वस्थ, मन से संतुष्ट और जीवन से आनंदित होना भी है।

केके उपाध्याय
(लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)