Balbir Punj: Tribute to a Thought Leader

स्मृति शेष...विचार के पुरोधा और ज्ञान के पुंज थे बलबीरजी

वरिष्ठ पत्रकार और विचारक बलबीर पुंज के निधन पर विशेष श्रद्धांजलि। उनके लेखन, वैचारिक योगदान और राष्ट्रवादी विमर्श में भूमिका को याद किया गया।

By : स्वदेश डेस्क
स्मृति शेष...विचार के पुरोधा और ज्ञान के पुंज थे बलबीरजी

पुरु शर्मा

बलबीर पुंज जी नहीं रहे, यह वाक्य ऐसी रिक्तता दे गया है जिसे शब्द शायद ही भर पाएँ। जेहन में उनके लिखे अनगिनत लेख तैर रहे हैं और आँखों के सामने उनकी सौम्य मुस्कान का सम्मोहन रह-रहकर उभर रहा है। वे सक्रियता और जीवंतता के पर्याय थे। उन्होंने सदैव वैचारिकी की लौ को अक्षुण्ण रखा। अभी तीन-चार दिन पहले ही उनका लेख पढ़द तब किसने जाना था कि राष्ट्रवाद का ये सशक्त स्वर यूँ मौन होकर विलीन हो जाएगा। उनसे मेरी उँगलियों पर गिनने लायक भी मुलाकातें नहीं हुई, बस एकाध बार किसी आयोजन की भीड़ में टकराने जैसी संक्षिप्त भेंट भर हुई, पर वे कभी अपरिचित नहीं लगे। उनका आशीष, उनकी वह स्नेहिल दृष्टि और संवाद में आत्मीय भाव ऐसा था कि वे पहली ही भेंट में हृदय के किसी कोने में अपना स्थान बना लेते थे।

यह उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी कि लुटियंस दिल्ली के प्रभावशाली गलियारों और राज्यसभा की गरिमामयी आसंदी पर बैठने के बाद भी, उनकी सादगी का स्तर ऐसा था कि मुझ जैसा एक सामान्य युवा भी उनसे बिना किसी झिझक के अपनी बात कह सकता था। उनतक पहुँचने के लिए किसी विशेष औपचारिकता की आवश्यकता नहीं लगती थी। वे भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे, राज्यसभा के सदस्य के रूप में उन्होंने अपनी प्रखर मेधा का परिचय दिया, और एक श्रेष्ठ स्तंभकार के रूप में दशकों तक समाज का मार्गदर्शन किया। उनके लेखों में दार्शनिकता की गहराई, विश्लेषण की प्रखरता और देशहित की सर्वोपरि चिंता एक साथ गुंथी होती थी।

उनकी स्मरण शक्ति अद्भुत थी। किसी भी विषय पर बाहे वह सांप्रदायिक हिंसा का इतिहास हो, संसदीय बहस की बारीकियाँ हों, या भारत-पाक विभाजन की त्रासदी का कोई अनछुआ पक्ष, वे ऐसे उद्धरण और तथ्य प्रस्तुत करते थे जिन्हें चुनौती देने का साहस विरोधी भी नहीं जुटा पाते थे। वे उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे जिसने राष्ट्रवादी विमर्श को बौद्धिक गरिमा दिलाई और मुख्यधारा में प्रतिष्ठित किया। एक ऐसे कालखंड में जब बौद्धिक जगत पर एक विशेष विचारधारा का एकाधिकार था और 'हिंदुत्व' या 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' जैसे शब्दों को अस्पृश्य माना जाता था, तब पुंज जी ने निर्भीकता से इन अवधारणाओं की तार्किक व्याख्या की। उन्होंने अपने लेखों में बार-बार यह स्थापित किया कि भारत की एकता का आधार भूगोल नहीं, संस्कृति है। वे अपने लेखन से विमर्श को एक नई दिशा देते थे। उनके लेखों में एक ऐसा प्रवाह था, जो पाठक को ऐसी विचार-यात्रा पर ले जाता था जहाँ हर मोड़ पर एक नया दृष्टिकोण और एक नई अनुभूति मिलती थी। अपनी विशिष्ट शैली और लालित्य के कारण, वे कठिन विषयों को भी बड़ी सहजता से समझाते कि पाठक उन्हें आसानी से आत्मसात कर लेता था।

'द मदरलैंड' से अपनी पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले पुंज जी ने अर्थशास्त्र और वाणिज्य जैसे शुष्क विषयों की पत्रकारिता करते हुए भी अपनी वैचारिक निष्ठा को कभी धुंधला नहीं पड़ने दिया। स्वाधीनता के बाद जिस तरह से भारतीय इतिहास के मूल स्वरूप के साथ विरूपण किया गया, उस पीड़ा को वे अपने हर संवाद और हर लेख में पूरी प्रामाणिकता के साथ व्यक्त करते थे। हाल के वर्षों में जब भारत के सांस्कृतिक इतिहास और प्रतीकों पर भ्रामक नैरेटिव गड़े जा रहे थे, तब नैरेटिव का मायाजाल' और 'ट्रिस्ट विद अयोध्या' जैसी उनकी पुस्तकें एक अकाट्य सत्य बनकर उभरी। उन्होंने वामपंथी इतिहासकारों और आयातित विमों को केवल नकारा ही नहीं, बल्कि अकादमिक और ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ पूरी तार्किकता से धराशायी किया। सक्रिय राजनीति में प्रवेश करने पर भी पुंज जी ने पत्रकार की वह निष्पक्ष और तीक्ष्ण दृष्टि कभी नहीं खोई, जो सत्य को सत्य कहने का साहस देती है। भाजपा की वैचारिक नींव को सुदृढ़ करने में उनका योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। एक दशक से अधिक समय तक भाजपा के 'बौद्धिक प्रकोष्ठ' के संयोजक के रूप में उन्होंने पार्टी को न केवल वैचारिक दिशा दी, अपितु शिक्षाविदों, विचारकों और बुद्धिजीवियों से एक सेतु का निर्माण किया।

आज बलबीर पुंज जी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन वे अपने पीछे एक ऐसी वैचारिक विरासत छोड़ गए हैं, जो अमर है। उनके हजारों लेख, वक्तव्यों, साक्षात्कारों और पुस्तकों में भारत के राष्ट्रबोध की समूची चेतना समाहित है। उनकी स्मृति को नमन करने का सबसे सार्थक तरीका यही होगा कि हम उस वैचारिक परंपरा को आगे बढ़ाएँ, जिसके वे सशक्त संवाहक थे। समय के प्रवाह में व्यक्तित्व भले ही विलीन हो जाते हैं, किंतु उनके द्वारा स्थापित मूल्य और विचार युगों तक समाज को आलोकित करते रहते हैं। पुंज जी भी उसी आलोक के रूप में हमारे बीच सदैव विद्यमान रहेंगे।





 

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