Bashir Badr Shayari and Life Journey

“कितनी सच्चाई से जिंदगी ने मुझसे कह दिया, तू नहीं मेरे तो कोई दूसरा हो जाएगा”

मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र की शायरी, संघर्ष, संवेदनाओं और भोपाल से जुड़े जीवन सफर पर विशेष लेख। उनके यादगार शेर आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं।

By : स्वदेश डेस्क
“कितनी सच्चाई से जिंदगी ने मुझसे कह दिया, तू नहीं मेरे तो कोई दूसरा हो जाएगा”

अनुराग उपाध्याय, भोपाल

डॉ. बशीर बद्र : शायरी, सादगी और संवेदनाओं का अद्भुत संसार

दुनिया में सबसे आसान शब्दों में सबसे कठिन शेर कहने वाले मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र पिछले कई वर्षों से बीमारी के चलते खामोश थे, लेकिन उनके शेर आज भी लोगों के दिलों में शोर मचाते हुए सुकून पहुंचा रहे हैं। डॉ. बद्र के शेर बारिश की पहली बूंदों जैसा अहसास कराते रहे हैं।

“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।”

डॉ. बद्र ने जब यह शेर कहा था, तब शायद उन्हें भी नहीं मालूम था कि उनकी जिंदगी की शाम भोपाल के परी बाजार की गलियों में गुजरेगी। वर्ष 1960 के दशक में ही इस शेर की तासीर ऐसी थी कि महान अभिनेत्री मीना कुमारी इसे अपने हाथों पर लिखकर रखा करती थीं। आज भी देश के किसी भी हाईवे पर खड़े हो जाइए, हर 20वें ट्रक के पीछे यह शेर लिखा मिल जाएगा। यही उनकी शायरी की सबसे बड़ी ताकत थी आम से लेकर खास तक, हर दिल में जगह बनाना।

मेरठ दंगों का दर्द और भोपाल का सफर

1980 के दशक में मेरा परिचय डॉ. बशीर बद्र से हुआ। वर्ष 1987 के मेरठ दंगों में उनका घर जला दिया गया था। नर्म मिजाज शायर इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाए और मेरठ छोड़कर भोपाल आ बसे। उस दौर में उन्होंने लिखा-

“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।”

और फिर

“बड़े शौक से मेरा घर जला, कोई आंच तुझ पे न आएगी,
ये जुबां किसी ने खरीद ली, ये कलम किसी की गुलाम है।”

इसी दौर में उनकी मित्रता अटल बिहारी वाजपेयी से गहरी हुई। दोनों साहित्य और संवेदनाओं के धरातल पर एक-दूसरे के बेहद करीब थे। डॉ. बद्र अक्सर कहा करते थे “तुम ग्वालियर वाले और अटल जी भी, मेरी इच्छा है कि अटल जी देश के प्रधानमंत्री बनें।” बाद में ऐसा हुआ भी।

राजनीति से दूरी, मगर देश की आत्मा से गहरा जुड़ाव

डॉ. बशीर बद्र राजनीति से पर्याप्त दूरी रखते थे, लेकिन भारत की संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक संवेदनाओं को पूरी गहराई से जीते थे। उनकी शायरी बोझिल नहीं थी, उसमें ताजगी और जीवन का अनुभव था। भारत विभाजन से लेकर शिमला समझौते और कारगिल युद्ध तक, उन्होंने हर दौर को अपनी नजर से देखा और शब्द दिए।

“दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।”

उनकी शायरी में दर्द भी था और मरहम भी। संघर्ष भी था और समाधान भी। उनके शेर सवाल कम और जवाब ज्यादा लगते थे।

‘स्वदेश’ को दिया था विशेष साक्षात्कार

वर्ष 1987 में जब डॉ. बशीर बद्र ग्वालियर आए थे, तब उन्होंने ‘स्वदेश’ को एक विशेष साक्षात्कार दिया था। उस बातचीत में उन्होंने हिंदी-उर्दू साहित्य से लेकर देश-दुनिया के कई विषयों पर खुलकर अपने विचार रखे थे।

उनकी शायरी सिर्फ मोहब्बत का जुनून नहीं, बल्कि रिश्तों और जीवन की गहराई भी बयान करती थी।

“कुछ तो मजबूरियां रही होंगी,
यूँ कोई बेवफा नहीं होता।”

“मेरी हंसी से उदासी के फूल खिलते हैं,
मैं सबके साथ हूँ, लेकिन जुदा सा लगता हूँ।”

“जब मैं सो जाऊँ तो पलकों पर अपने होंठ रख देना,
यकीं आ जाएगा कि पलकों तले भी दिल धड़कता है।”

अपने ही शेर पढ़कर जीता गोल्ड मेडल

डॉ. बशीर बद्र की शख्सियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब वे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से एमए कर रहे थे, तब उन्हें पाठ्यक्रम में अपने ही शेर पढ़ने पड़े। अपने ही लिखे शेरों को पढ़कर उन्होंने गोल्ड मेडल हासिल किया।

उनकी रचनाएं सिर्फ खूबसूरत एहसासों से नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों और सीख से भी भरी हुई हैं।

“यूँ ही बे-सबब न फिरा करो, कोई शाम घर में रहा करो,
वो गजल की सच्ची किताब है, उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो।”

“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो।”

आखिरी दिनों में भी शेर याद रहे

मुशायरों के बेताज बादशाह डॉ. बशीर बद्र पिछले डेढ़ वर्ष से डिमेंशिया से पीड़ित थे। वे बहुत कुछ भूल चुके थे, लेकिन अपने शेर उन्हें हमेशा याद रहते थे। उनकी पत्नी डॉ. राहत बद्र जब उन्हें उनके ही शेर सुनाती थीं, तो उनकी आंखें चमक उठती थीं। आज बशीर साहब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज की मिठास और उनकी शायरी आने वाली पीढ़ियों तक साहित्य प्रेमियों के दिलों में मिश्री घोलती रहेगी और समय-समय पर सचेत भी करती रहेगी।

“कितनी सच्चाई से जिंदगी ने मुझसे कह दिया,
तू नहीं मेरे तो कोई दूसरा हो जाएगा।”

“शोहरत की बुलंदी भी पलभर का तमाशा है,
जिस डाल पर बैठे हो, वो टूट भी सकती है।”

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